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कसाब के खिलाफ बयान देने वाली सबसे छोटी गवाह, जिसे लोग, अब भी 'कसाब की बेटी' कहकर पुकारते हैं

मुंबई हमले के बाद चार साल तक देविका को किसी भी स्कूल में एडमिशन नहीं मिली. अभी 11वीं की छात्रा देविका का सपना आईपीएस अफसर बनकर आतंकियों को सबक सिखाना है

Updated On: Nov 22, 2018 05:11 PM IST

FP Staff

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कसाब के खिलाफ बयान देने वाली सबसे छोटी गवाह, जिसे लोग, अब भी 'कसाब की बेटी' कहकर पुकारते हैं

26 नवंबर 2008, वो दिन जब सरहद पार से आए आतंकियों ने मुंबई को दहला दिया था, देश पर सबसे बड़े आतंकी हमले को अब 10 साल पूरे हो रहे हैं, एक जिंदाजिल शहर को आतंकियों ने कुछ ऐसे जख्म भी दिए हैं जो जीवन भर नहीं भरने वाले, इस हमले में मुंबई पुलिस ने अपने कई जांबाज अधिकारियों को गंवा दिया तो वहीं आतंकियों ने बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुला दिया.

मायानगरी पर हुए इस हमले में 164 लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे. हमले में शामिल 10 दहशतगर्दों में एक अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया था. मुंबई पुलिस के कांस्टेबल तुकाराम ओंबले ने अपनी जिंदगी दांव पर लगाते हुए कसाब को पकड़ा था. पाकिस्तानी नागरिक कसाब को 21 नवंबर 2012 को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. कसाब को फांसी तक पहुंचाने में देविका रोटावन की गवाही सबसे अहम साबित हुई थी. देविका की उम्र उस वक्त महज नौ साल थी. 10 साल बाद अब देविका की जुबानी सबसे बड़े हमले और उसके बाद जिंदगी में आए बदलाव की कहानी.

'मुंबई पर हुए आतंकी हमले को 10 साल बीत गए, लेकिन हमारी जिंदगी मानो ठहर सी गई है. रहने के लिए घर मिलना भी मुश्किल हो गया था. लोगों को बम धमाके या आतंकी हमला होने का डर सताता है. जहां भी रहती हूं, वहां मुझे कसाब की बेटी पुकारा जाता है. यहां आने पर आप किसी से भी पूछिए 26/11 वाली लड़की कहां रहती है, तो वो आपको कसाब की बेटी यहां रहती है बोलकर लेकर आएंगे.'

26/11 की उस काली रात में देविका को छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनस पर पैरों में गोली लगी थी. मुंबई आतंकी हमले की वह सबसे छोटी गवाह थी, जिसने कोर्ट में अजमल कसाब को पहचाना था.

'26/11 का वो दिन मैं और मेरे परिजन कभी भूल नहीं सकते. मैं अपने पिता और भाई के साथ पुणे जाने के लिए बांद्रा से सीएसटी स्टेशन पहुंचे थे. प्लेटफॉर्म नंबर 12 पर हम सभी एक्सप्रेस ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. मेरा भाई टॉयलेट के लिए गया, तभी अचानक फायरिंग शुरू हो गई.

फायरिंग करते हुए वह मुस्कुरा रहा था, उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी 

'गोलियों के शोर के बीच चारों तरफ से चीख पुकार सुनाई दे रही थी. पापा ने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों भी बाकी लोगों की तरह जान बचाकर भागने लगे. तभी मुझे अहसास हुआ कि पैर में कुछ आकर लगा और तेजी से दर्द होने लगा. मैं जमीन पर गिर गई. लोगों के रोने, चीखने की आवाज के बीच मुझे अंधाधुंध फायरिंग करने वाला शख्स नजर आ रहा था. वह मुस्कुरा रहा था और उसके चेहरे पर बिलकुल भी शिकन नजर नहीं आ रही थी. वह अजमल कसाब था.'

मुंबई हमले के बाद चार साल तक देविका को किसी भी स्कूल में एडमिशन नहीं मिली. अभी 11वीं की छात्रा देविका का सपना आईपीएस अफसर बनकर आतंकियों को सबक सिखाना है.

'मेरे पैर में गोली लगी थी. दर्द से कराहते हुए कुछ ही देर में मैं बेहोश हो गई. उस वक्त मैं सिर्फ नौ साल की थी. जब मुझे होश आया, तब मैं कामा अस्पताल में थी. पप्पा और भाई को देखकर मैं फूट-फूटकर रोने लगी. मेरे पैरे में भयानक दर्द हो रहा था. ऐसा लग रहा था कि किसी ने उस पर पत्थर रख दिया हो. कामा अस्पताल में महीने भर तक मेरा इलाज चला और फिर मुझे जेजे अस्पताल मे शिफ्ट किया गया, जहां मेरे कई ऑपरेशन हुए.'

देविका के पिता का ड्रायफ्रूट का बिजनेस था. 26/11 के बाद इस परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. पिता के साथ लोगों ने हमले के डर से पहले कारोबार करना कम कर दिया और बाद में पूरी तरह से बंद कर दिया. इस वजह से उनका कारोबार पूरी तरह ठप हो गया.

'जेजे अस्पताल में इलाज के दौरान मेरा भाई मेरे साथ था. इस दौरान मेरे जख्मों पर वह मरहम-पट्टी करता था. उसने बड़े मन से अस्पताल में भर्ती बाकी लोगों का भी इलाज किया, लेकिन भाई से एक गलती हो गई. उसने डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ की तरह हाथों में दस्ताने नहीं पहने. इस वजह से उसे इंफेक्शन हो गया. गले में गठान हो गई. हम गरीब लोग. हमें पहले तो कुछ समझ में नहीं आया, फिर बाद में उसका इलाज शुरू हुआ. उसके पीठ की हड्डी बाहर निकल गई. मेरे कारण भाई को हमेशा की तकलीफ हो गई. मुझे गोली नहीं लगती तो बाकी लोगों की तरह मेरा भाई में आज सामान्य जिंदगी बिता रहा होता.'

जेजे अस्पताल में इलाज के बाद देविका की सेहत में काफी सुधार हुआ. कई ऑपरेशन के बाद उसकी शारीरिक दिक्कतें दूर हुई तो पूरा परिवार राजस्थान चला गया. फिर एक दिन मुंबई पुलिस के फोन के बाद उसकी जिंदगी में बदलाव आया.

उसे देखते ही मुझे बहुत गुस्सा आया, लगा कि बैसाखी फेंककर मार दूं

'पप्पा से पूछा कि देविका गवाही देगी कि उसने कसाब को देखा था? पप्पा और मैंने तय किया, जिस कसाब ने इतने लोगों की जान ली है उसे सजा मिलनी चाहिए. हम सभी लौटकर मुंबई आ गए. मैं उस वक्त नौ साल की थी. मेरे पैर के घाव भी पूरी तरह से भरे नहीं थे. बैसाखी की मदद से मैं कोर्ट में जाती थी. कोर्ट में जज के पास ही कसाब बैठा हुआ था. मैंने देखते ही उसे पहचान लिया. उसे देखते ही मुझे बहुत गुस्सा आया. मुझे लगा कि उसे बैसाखी फेंककर मार दूं, लेकिन मैं वैसा कर नहीं सकती थी.'

कोर्ट में देविका को शपथ दिलाई गई. न्यायधीश ने मुझसे पूछा कि तुम्हें शपथ का अर्थ पता है? 'मैंने कोर्ट में कहा, यदि मैं सच बोल रही हूं, तो भगवान मेरा साथ देंगे या फिर मुझे वह शिक्षा देंगे. मेरे पप्पा और मुझे इस बात का गर्व है कि देश के लिए हम कुछ कर सके.'

मुंबई हमले के गवाह के रूप में नाम सामने आने के बाद देविका, उसके भाई और पिता से रिश्तेदारों ने दूरी बना ली. वो घर पर नहीं बुलाते थे. वो कहते थे कि आतंकियों के खिलाफ गवाही दी है. वो भी हमें मार देंगे. देविका बताती है कि उस वक्त बहुत बुरा लगता था. ऐसा क्या गुनाह किया है, जिसकी सजा हमें मिल रही है. यदि हम रिश्तेदार के यहां किसी कार्यक्रमें जाते थे, तो उन्हें बाहर ही ठहरना पड़ता था.

हम देश के लिए लड़े और लड़ते रहेंगे

देविका को बीच में टीबी हो गया था. उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्वीट किया था और आर्थिक परिस्थिति का हवाला दिया. ट्वीट का जवाब नहीं आया लेकिन इसके बाद दिल्ली से एक अधिकारी का फोन आया और उसने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इसकी जानकारी देने के लिए कहा था.

'हमने मुख्यमंत्री को इस बारे में जानकारी दी. मुझसे जुड़ी हर जानकारी उनके साथ शेयर की गई. मेरे पिता को कई बार मंत्रालय के चक्कर काटने पड़े. आखिरकार आर्थिक मदद मिली. इसमें डेढ़ साल का वक्त चला गया. मुख्यमंत्री से मिली मदद की वजह से मेरा इलाज हो सका. मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करना है. उनसे मुलाकात कर काफी कुछ बताना है.'

देविका बड़ी होकर आईपीएस अधिकारी बनना चाहती है और आतंकवादियों को मारना चाहती है. मुंबई पर हमले की साजिश रचने वाले मास्टरमाइंड को सबक सिखाना है. 'दस साल बीत गए. वक्त कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. फिर भी पीछे पलटकर देखूं तो लगता है कि वह दिन अभी भी वैसा है. वो सारे जख्म आज भी ताजे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे अनुभव आए. हम अच्छे अनुभव को दिल में लेकर जिंदगी का सामना कर रहे है.

हम तीनों एक-दूसरे के लिए सबकुछ है. मैं लोगों से कहना चाहूंगी कि भले ही लोगों ने हमारे साथ कैसा भी बर्ताव किया हो. हम देश के लिए लड़े और लड़ते रहेंगे.'

(न्यूज़ 18 के  लिए सचिन साल्वे की रिपोर्ट)

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