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वो बिस्मिल के साथ फांसी पर झूले थे, नाम था रोशन...उनके गांव में अब भी 'अंधेरा' है

उत्तर प्रदेश की शहीद नगरी नाम से पहचाने जाने वाले शाहजंहापुर शहर से 60 किलोमीटर दूर नहर के किनारे एक गांव है और नाम है नवादा दरोबस्त. इसी गांव में पैदा हुए थे ठाकुर रोशन सिंह.

Sudhanshu Gaur Updated On: Jun 30, 2018 09:34 AM IST

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वो बिस्मिल के साथ फांसी पर झूले थे, नाम था रोशन...उनके गांव में अब भी 'अंधेरा' है

शहीदों के चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा.

जब स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस आता है तो ये लाइनें हमें कहीं न कहीं पढ़ने को या सुनने को मिल जाती हैं. कुछ समय के लिए ये हम पर असर डालती हैं और फिर बात आई-गई हो जाती है. इन अमर पंक्तियों को लिखने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे रामप्रसाद बिस्मिल. बिस्मिल को काकोरी कांड में फांसी की सजा दे दी गई थी. बिस्मिल के साथ फांसी का फंदा उनके दोस्त ठाकुर रोशन सिंह ने भी चूमा था. लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल की उपरोक्त लाइनों के साथ कैसा अन्याय होगा ये बात आप उनके दोस्त ठाकुर रोशन सिंह के गांव में घूमकर पता लगा सकते हैं.

उत्तर प्रदेश की शहीद नगरी नाम से पहचाने जाने वाले शाहजंहापुर शहर से 60 किलोमीटर दूर एक नहर के किनारे एक गांव है. नाम है नवादा दरोबस्त. इसी गांव में पैदा हुए थे ठाकुर रोशन सिंह. 22 जनवरी को ठाकुर रोशन सिंह की जन्मतिथि पर उत्सव का आयोजन किया जाता है. इसी दिन पिछले 16 सालों से गांव में एक किसान मेले का आयोजन किया जाता है. जिसके लिए हर वर्ष लगभग 12 लाख रुपए सरकार की तरफ से जिला प्रशासन को दिए जाते हैं, लेकिन गांव वाले बताते हैं कि इन 12 लाख रुपए में से मात्र एक-डेढ़ लाख रुपए तक ही खर्च किए जाते हैं और बाकी पैसों का कोई हिसाब नहीं दिया जाता है.

कैसी है गांव की स्थिति

ना तो गांव तक पहुंचने के लिए कोई अच्छी सड़क है और ना ही गांव तक पहुंचाने का लिए कोई सवारी. हालांकि गांव में पहुंचने पर एक ठीक-ठाक औसत दर्जे की सड़क है. ग्रामीण विकास नाम से ही अनजान हैं. गांव में ना ही कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है और ना ही कोई अन्य कोई स्वास्थ्य सुविधा मौजूद है.

उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की ड्रीम योजना 108 एम्बुलेंस सेवा गांव में आती ही नहीं है. जिसके कारण लोगों को पास के जिले के गांव में जाकर 108 एम्बुलेंस बुलानी पड़ती है. गांव में लगभग 25 से 30 बच्चे ऐसे हैं जिनके इस असुविधा के कारण अन्य गांवों के पते पर जन्म प्रमाण पत्र बने हुए हैं.

गांव तक पहुंचाने वाली सड़क के हालात

गांव तक पहुंचाने वाली सड़क की हालत

गांव में शिक्षा के नाम पर एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तो है लेकिन पिछले 4 वर्षो से साइंस और मैथ के टीचर नहीं हैं. सवाल पूछे जाने पर कि गांव के छात्र दसवीं के बोर्ड के इम्तिहान कैसे पास करते हैं तो एक छात्र बताता है कि एक टीचर से गांव के सभी बच्चे कोचिंग पढ़ते हैं.

गांव के पास में एक नहर है. जिस पर एक पक्का पुल बनवाने का सपना 31 सालों पहले वहां के स्थानीय सांसद के द्वारा देखा गया था. वो सपना चुनावों के समय वहां की जनता को आज भी दिखाया जाता है. हालांकि उन्हीं सांसद के पुत्र द्वारा विधायक रहते हुए गांव की शुरुआत में एक स्वागत द्वार का निर्माण करवा दिया गया है.

पूर्व विधायक राजेश यादव के द्वारा बनवाया गया स्वागत द्वार

पूर्व विधायक राजेश यादव के द्वारा बनवाया गया स्वागत द्वार

अचंभे की बात तो यह है कि यह गांव 3 साल पहले पहले यहां की सांसद और केंद्रीय मंत्री कृष्णा राज द्वारा सांसद आदर्श ग्राम योजना में गोद लिया गया था, लेकिन फिर भी गांव में विकास कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आता है. विकास के नाम पर 2 साल से एक ओवरहेड टैंक बन रहा है और एक बैंक की शाखा शुरू हुई है, लेकिन ग्रामीणों के द्वारा अधिक रकम की निकासी पर हाथ खड़े कर दिए जाते हैं. नोटेबंदी के समय बैंक में अघोषित आपातकाल लग गया था.

पानी का निर्माणधीन ओवरहेड टैंक

पानी का निर्माणधीन ओवरहेड टैंक

गांव वालों से बातचीत करने पर मालूम हुआ कि कृष्णाराज सांसद बनने के बाद केवल एक बार ही गांव में आई हैं. गांव के एक बुजुर्ग कहते हैं कि यहां सिर्फ चुनावी मौसम में ही नेताओं के दर्शन होते हैं. और अब लोकसभा चुनाव आने वाले हैं और वोट लेने के लिए नेताओं के दर्शन जरूर होंगे. वो सवालिया अंदाज में कहते हैं कि शायद एक आदर्श और शहीद के गांव में इतना विकास ही होता है.

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