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टाटा और मिस्त्री के बीच असली लड़ाई अभी बाकी है

इमरजेंसी जनरल मीटिंग का इंतजार करना होगा, जहां असली लड़ाई लड़ी जानी है.

Updated On: Dec 03, 2016 11:39 AM IST

Shantanu Guha Ray

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टाटा और मिस्त्री के बीच असली लड़ाई अभी बाकी है

टाटा संस से साइरस मिस्त्री की विदाई के पीछे पिछले साल भर में हुई तीन घटनाओं का बड़ा रोल रहा. इन्हीं की वजह से मिस्त्री को बेइज्जत करके टाटा संस से हटाया गया. अब साइरस मिस्त्री और रतन टाटा के बीच हाल के दिनों की सबसे बड़ी कारपोरेट लड़ाई छिड़ गई है.

इस झगड़े की पहली वजह है साइरस मिस्त्री की आयरलैंड की नागरिकता. बॉम्बे हाउस के सूत्रों के मुताबिक, रतन टाटा ने कई बार मिस्त्री को वहां की नागरिकता छोड़ने की सलाह दी. लेकिन मिस्त्री ने ऐसा नहीं किया. रतन टाटा का मानना है कि ग्रुप के कारोबार का अगुवा एक ऐसे शख्स को होना चाहिये जो भारतीय हो. यही वजह है कि 2012 में टाटा संस का चेयरमैन चुनते वक्त अमेरिकी इन्वेस्टमेंट बैंकर जॉन थेन की इस पद के लिए दावेदारी खारिज हो गई थी.

फिर टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा को पता चला कि टाटा ग्रुप ने शापूरजी पैलनजी ग्रुप को 2926.35 करोड़ रुपयों का भुगतान किया है. ये टाटा ग्रुप की तमाम कंपनियों जैसे इंडियन होटल्स, टाटा मोटर्स, टाटा हाउसिंग, रोटरक्राफ्ट लिमिटेड और टाटा एडवांस सिस्टम जैसी कंपनियों में काम करने के एवज में दिया गया. ये सीधे-सीधे 'कॉनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' का मामला है. क्योंकि शापूरजी पैलनजी कंपनी की टाटा संस में हिस्सेदारी है. ऐसे में उसे अपनी ही कंपनी में काम के एवज में पैसे दिये जाने से हितों के टकराव का मामला बनता है. शापूरजी पैलनजी कंपनी साइरस मिस्त्री के परिवार की है. ऐसे में टाटा ग्रुप के ठेके उसे नहीं मिलने चाहिये थे.

टाटा ट्रस्ट को कमजोर किया

मिस्त्री और टाटा के बीच टकराव की तीसरी वजह रही, साइरस मिस्त्री के बनाये ग्रुप एक्जीक्यूटिव काउंसिल का टाटा संस बोर्ड के काम-काज में दखल. जीईसी को मिस्त्री ने टाटा ग्रुप के पांच सीईओ के कामकाज की निगरानी सौंप दी थी. ये काम टाटा संस के बोर्ड का है.

टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की हिस्सेदारी 66 फीसद है. रतन टाटा इस ट्रस्ट की अगुवाई करते हैं. ऐतिहासिक रूप से ट्रस्ट के चेयरमैन और टाटा संस के बोर्ड का चेयरमैन एक ही शख्स होता था. इसके अपवाद साइरस मिस्त्री बने थे.

ग्रुप एक्जीक्यूटिव काउंसिल के गठन से साफ है कि ये एक नई संस्था खड़ी की जा रही थी, जो टाटा ट्रस्ट को कमजोर बना देती और उसके ऊपर हावी हो सकती थी.

टाटा ग्रुप की कंपनियों को कहा जा रहा था कि जो लोगों की भलाई के काम वो करते हैं, इसके लिए वो अपनी अलग संस्थायें बनायें, जो टाटा ट्रस्ट के दायरे से अलग हों. ये टाटा ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र में सीधा दखल और उसे चुनौती थी. ट्रस्ट ही टाटा फुटबॉल एकेडमी जैसी संस्थायें चलाता है.

ग्रुप एक्जीक्यूटिव काउंसिल सीधे टाटा संस के चेयरमैन के प्रति जवाबदेह बनाई गई थी. इससे चेयरमैन के तौर पर साइरस मिस्त्री को असीमित अधिकार हासिल हो गये थे. ग्रुप की हर कंपनी में साइरस मिस्त्री ने खुद को ही नामित कर लिया था. यानी वो अकेले शख्स थे जिनके पास कंपनियों के कामकाज और उनसे जुड़ी जानकारी होती थी.

वेलस्पन सौदा भी विवाद की वजह

RATAN TATA

सूत्रों के मुताबिक, रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच तनातनी की और भी वजहें थीं. खास तौर से वेलस्पन कंपनी को लेकर. नवंबर 2015 में टाटा पावर ने वेलस्पन को खरीदने की बातचीत शुरू की. इस दौरान साइरस मिस्त्री कई बार वेलस्पन के अधिकारियों से मिले. 22 अप्रैल 2016 को मिस्त्री ने वेलस्पन के साथ समझौते की शर्तों पर दस्तखत किए. मगर उन्होंने ये जानकारी टाटा संस के बोर्ड को 22 मई तक नहीं दी. इससे पहले मार्च में टाटा पावर से जुड़ी प्रेजेंटेशन में मिस्त्री ने वेलस्पन के साथ हो रही बातचीत का जिक्र नहीं किया.

मई 2016 में भेजे गए मेल में टाटा के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को इसकी जानकारी तो दी गई, मगर इसके बारे में उनकी इजाजत नहीं मांगी गई. 13 मई 2016 को भेजे गए मेल में साइरस मिस्त्री ने लिखा कि टाटा पावर कंपनी, वेलस्पन को खरीदने की कोशिश में है. एक डायरेक्टर विजय सिंह ने इसे सही कदम बताया. लेकिन उन्होंने ये भी साफ किया कि उनका ये मेल बोर्ड की रजामंदी नहीं.

टाटा पावर ने तीस फीसद प्रीमियम देनदारों को दिया. इसकी पहली किस्त शापूरजी पैलनजी को दी गई, जिस कंपनी से साइरस मिस्त्री सीधे जुड़े हैं. निदेशक के कमीशन बाद में दिये गए. क्योंकि गैर कार्यकारी निदेशकों को कोई तनख्वाह नहीं मिलती. बल्कि उन्हें कमीशन मिलता है.

साइरस मिस्त्री को हटाने की कार्रवाई करीब एक महीने चली. बोर्ड के हर निदेशक ने मिस्त्री को ये समझाने की कोशिश की कि उनका इस पद से हटना क्यों जरूरी है. ये बैठक कृष्ण कुमार के घर पर हुई. जिसमें मिस्त्री को बताया गया कि वो 130 साल पुरानी कंपनी की परंपरा से खिलवाड़ कर रहे हैं.

नहीं किया बोर्ड का सम्मान

अगस्त 2016 में जब विवाद गहराने लगा, तो मिस्त्री ने एक पन्ने का एक नोट अपने काम का ब्यौरा देते हुए बोर्ड की बैठक में पढ़ा मगर उसे बोर्ड के सदस्यों से साझा नहीं किया. न ही इसे बैठक के कागजात में शामिल किया गया. ये बात निदेशकों को अच्छी नहीं लगी.

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टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा को लगा कि साइरस मिस्त्री बोर्ड का सम्मान नहीं कर रहे हैं. उन्हें अपनी जिम्मेदारियां ठीक से निभानी चाहिए. रतन टाटा ने अपनी बात उस वक्त भी दोहराई जब पद से हटाये जाने के फौरन बाद साइरस मिस्त्री ने एक चिट्ठी जारी की. जिसमें उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की थी.

ऐतिहासिक रूप से टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के प्रमुख हमेशा एक ही शख्स रहे हैं. लेकिन साइरस मिस्त्री के लिए नियमों में भी बदलाव किया गया था.

साइरस मिस्त्री टाटा संस के बोर्ड में 2006 से ही थे. 2010 में उन्होंने बोर्ड के सदस्यों के बीच कुछ सुझाव रखे थे कि कैसे कंपनी को चलाया जाना चाहिए. इसी आधार पर 2011 में उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया था. 2012 में वो टाटा संस के चेयरमैन बने.

इसीलिए जब साइरस मिस्त्री ने कहा कि उन्हें बहुत सी बातें नहीं पता थीं, तो उस पर सवाल उठने लाजिमी हैं.

एक मामला शिवशंकरन की नकदी का भी है. टाटा संस के चेयरमैन के दफ्तर से ही इस मामले को टाटा इन्वेस्टमेंट बोर्ड को सौंपने की सिफारिश हुई थी. साइरस मिस्त्री ने कहा था कि वो इस मामले में रतन टाटा की राय के साथ जायेंगे.

दिसंबर 2012 में रतन टाटा ने टाटा संस का पद छोड़ दिया. उससे पहले टाटा ग्रुप ने एयर एशिया के साथ डील कर ली थी. इसे बोर्ड की सहमति मिल चुकी थी. इससे जुड़ा कर्ज कंपनी ने चुका दिया था. साफ है कि ये बात साइरस मिस्त्री को भी मालूम रही होगी. और अगर नहीं पता थी तो उन्होंने पहले क्यों नहीं सवाल उठाया.

मिस्त्री सवालों के घेरे में

साइरस मिस्त्री के कामकाज पर कई और सवाल उठे थे. जैसे कि उन्होंने अमेरिका की याल यूनिवर्सिटी को लाखों डालर दिये थे. इसी दौरान मिस्त्री के बेटे ने याल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था.

24 अक्टूबर 2016 को टाटा संस के बोर्ड की बैठक से पहले, साइरस मिस्त्री को चार बार पद छोड़ने को कहा गया था. उसी सुबह रतन टाटा और नितिन नोहरिया ने साइरस मिस्त्री के कमरे में जाकर उन्हें पद छोड़ने को कहा था. ये बात बोर्ड की बैठक से 15 मिनट पहले की है. दोनों ने मिस्त्री को बताया था कि बोर्ड की बैठक में वो उन्हें हटाने का प्रस्ताव पेश करने पाले हैं. उन्होंने ये भी बताया कि टाटा संस से साइरस का कॉनट्रैक्ट मार्च 2017 में वैसे भी खत्म होने वाला है. लेकिन साइरस मिस्त्री ने पद छोड़ने से मना कर दिया. उसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया.

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उसके बाद से दोनों ही पक्षों के बीच ज़ुबानी जंग चल रही है. एक दूसरे पर आरोप लगाये जा रहे हैं. रतन टाटा ने तो खुलकर अपने खेमे के दोस्तों का इजहार नहीं किया है. मगर साइरस मिस्त्री ये भी कर चुके हैं. जैसे कि नुस्ली वाडिया ने तो रतन टाटा को खुलकर धमकी दी है. उन्होंने अपना अफ्रीका का दौरा भी रद्द कर दिया है.

रतन टाटा और साइरस मिस्त्री दोनों ने झगड़े की शुरुआत के बाद से दिल्ली दरबार का चक्कर लगाया है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कई मंत्रियों से भी मुलाकात की है. कमोबेश सबकी सहानुभूति रतन टाटा के साथ है. अफसर और मंत्री हैरान हैं कि साइरस मिस्त्री उस शख्स की शिकायत कर रहे हैं जिसने उन्हें देश और दुनिया की तमाम शख्सीयतों से परिचित कराया.

साफ है कि सरकार, टाटा जैसे बड़े ग्रुप को कोई झटका नहीं देना चाहती, जिसका भारत के जीडीपी में 4 फीसद का योगदान हो. टाटा समूह ने भारत को बाकी दुनिया से जोड़ा है. आज ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जिस कंपनी की कार में चलते हैं वो एक भारतीय की है. ये देश के लिए गौरव की बात है. बीजेपी के एक नेता ने कहा कि ऐसे बड़े कारोबारी समूह तिमाही नतीजों के आधार पर नहीं, दूर दृष्टि से चलाये जाते हैं.

टाटा को कुछ हौसला जमशेदपुर की टाटा मोटर्स यूनियन से मिला है. यूनियन की 10-11 नवंबर को हुई बैठक में खुलकर टाटा के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया गया.

एक वित्तीय संस्थान के सम्मानित बैंकर ने कहा कि टाटा समूह के झगड़े में वो रतन टाटा के खिलाफ नहीं जायेंगे. बहुत खराब हालात हुए तो, वोटिंग की सूरत में वो खुद को बैठक से अलग कर लेंगे. अच्छे हालात में वो टाटा संस को वोट देंगे.

देश के सबसे बड़े बैंकों में से एक, जिसकी टाटा संस में अच्छी खासी भागीदारी है, उसने टाटा संस के शेयर होल्डरों के एक तबके को इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वो वोटिंग की सूरत में टाटा संस के बोर्ड का समर्थन करें, जिसने साइरस मिस्त्री को पद से हटाया.

अब इस मामले में क्या होगा, इसके लिए हमें टाटा ग्रुप की कंपनियों की इमरजेंसी जनरल मीटिंग का इंतजार करना होगा, जहां असली लड़ाई लड़ी जानी है.

 

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