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दवाओं की कीमत में घपलेबाजी: कैंसर रोधी इंजेक्शन की कीमत कहीं 15 हजार तो कहीं 800 रुपए

किताब में रक्त कैंसर से पीड़ित शालिनी पाहवा का जिक्र किया गया है जिनका गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में उपचार चल रहा है

Updated On: Aug 22, 2018 07:47 PM IST

Bhasha

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दवाओं की कीमत में घपलेबाजी: कैंसर रोधी इंजेक्शन की कीमत कहीं 15 हजार तो कहीं 800 रुपए

दवाओं की कीमत में भारी घपलेबाजी होती है. उदाहरण के तौर पर रक्त कैंसर के उपचार से संबंधित एक इंजेक्शन की कीमत कहीं 15 हजार रुपए से अधिक है तो कहीं यह महज 800 रुपए में मिल जाता है.

हाल में आई एक नई किताब में दवाओं की कीमत से संबंधित घपलेबाजी का खुलासा किया गया है. किताब में रक्त कैंसर से पीड़ित शालिनी पाहवा का जिक्र किया गया है जिनका गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में उपचार चल रहा है.

‘हीलर्स ऑर प्रीडेटर्स’ नाम की इस किताब में कहा गया है कि कैंसर के उपचार में काम आने वाले इंजेक्शन ‘नोवार्टिस जोमेटा’ की कीमत गुड़गांव के संबंधित अस्पताल में 15,200 रुपए प्रति शॉट है. हैरानी वाला तथ्य यह है कि यही इंजेक्शन अलग ब्रांड नाम से दिल्ली के एक अस्पताल में महज 800 रुपए में उपलब्ध है.

यह किताब 41 लेखों का संग्रह है जिसे भारत के दो शीर्ष डॉक्टरों-संजय नगराल और समिरान नंदी तथा पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव केशव देसिराजू ने संपादित किया है. किताब देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार की कहानी बयां करती है.

पाहवा के मामले से संबंधित लेख ‘ए कंज्यूमर्स व्यू (एक उपभोक्ता का दृष्टिकोण)’ में कहा गया है कि दवा क्षेत्र से जुड़े एक व्यक्ति के अनुसार जोमेटा स्टॉकिस्टों को 13 हजार रुपये में बेचा जाता है. इस पर अस्पताल 2,200 रुपये का अपना मुनाफा कमाता है.

यही इंजेक्शन दिल्ली के एक अस्पताल में दूसरे ब्रांड नाम से महज 800 रुपये में उपलब्ध है. शालिनी ने कहा कि उन्होंने सस्ते विकल्प पर जाने का फैसला किया.

किताब में दूसरे लेख ‘हॉस्पिटल प्रैक्टिसेज एंड हेल्थकेयर करप्शन (अस्पताल चिकित्सा एवं स्वास्थ्य चर्या भ्रष्टाचार)’ में कहा गया है कि गंभीर जीवाणु संक्रमण के उपचार में काम आने वाली एंटीबायोटिक दवा अस्पतालों में 300 से लेकर 700 रुपए प्रतिग्राम में बेची जाती है, जबकि मरीजों को यह दवा लगभग 2,900 रुपये के एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) पर बेची जाती है.

दवा की खुराक एक हफ्ते या 15 दिन तक एक से दो ग्राम दिन में तीन बार लेनी होती है. इस तरह इसकी औसत कीमत 87 हजार रुपये से लेकर 1,75,000 रुपये तक हो जाती है. किताब में दावा किया गया है कि इस तरह दवा पर लगभग 500 प्रतिशत तक का मुनाफा कमाया जाता है.

इसमें कहा गया है, ‘अस्पताल अपने यहां भर्ती मरीजों पर जोर डालते हैं कि उपचार में काम आने वाली हर चीज अस्पताल की फार्मेसी से ही खरीदी जाए.’ किताब में वरिष्ठ डॉक्टरों, नौकरशाहों, पत्रकारों और समाज विज्ञानियों ने लेख लिखे हैं.

राष्ट्रीय भेषज मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एन पी पी ए) के अनुसार पिछले साल गुड़गांव के एक प्रसिद्ध अस्पताल ने डेंगू के एक मरीज से दवाओं पर 1,700 प्रतिशत का मुनाफा कमाया. बाद में इस मरीज की मौत हो गई थी.

किताब दवा कंपनियों और चिकित्सा उपकरण बनाने वाली कंपनियों तथा चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों के बीच गठजोड़ के बारे में भी बात करती है.

इसके अनुसार रोग निदान केंद्र एम आर आई और सी टी स्कैन के लिए मरीजों को रेफर करने वाले डॉक्टरों को परीक्षण मूल्य का 30 से 50 प्रतिशत हिस्सा पहुंचाते हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने 656 पन्नों की इस किताब की प्रस्तावना लिखी है.

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