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कठुआ की वह लड़की जो हमें सिखा गई कि एक-दूसरे के दुख का सहभागी कैसे बनना है

निर्भया केस के बाद यह दूसरा प्रमुख मौका है, जब पूरे देश को किसी घटना पर अफसोस है. प्रधानमंत्री से लेकर सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और देश का आम नागरिक तक दुखी है कि जम्मू-कश्मीर के कठुआ की उस चरवाहा बच्ची के साथ गलत किया गया

Dilip C Mandal Dilip C Mandal Updated On: Apr 28, 2018 12:53 PM IST

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कठुआ की वह लड़की जो हमें सिखा गई कि एक-दूसरे के दुख का सहभागी कैसे बनना है

राष्ट्र जीवन में ऐसे मौके कम आते हैं जब पूरा देश एक आवाज में बोलता है. इससे भी कम वे मौके होते हैं, जब पूरा देश किसी एक घटना पर खुश होता है या शोक मनाता है. खुश होना आसान है. कहते भी हैं कि सुख के सब साथी, दुख में न कोई. क्रिकेट मैच जीत जाने या भारत का एक उपग्रह के आसमान में सफलतापूर्वक उड़ जाने पर भी पूरा देश खुश हो लेता है. साथ दुखी होना ज्यादा बड़ी बात है. मुश्किल बात है.

निर्भया केस के बाद यह दूसरा प्रमुख मौका है, जब पूरे देश को किसी घटना पर अफसोस है. प्रधानमंत्री से लेकर सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और देश का आम नागरिक तक दुखी है कि जम्मू-कश्मीर के कठुआ की उस चरवाहा बच्ची के साथ गलत किया गया. देश के लगभग हर शहर में कठुआ की उस बच्ची के लिए शोक सभाएं, जुलूस और कैंडल मार्च निकाले गए. शोक के इन आयोजनों में महिलाओं की अच्छी हिस्सेदारी रही. सोशल मीडिया में यह घटना लंबे समय तक छाई रही.

अपराधियों को निर्दोष बताने के लिए सड़कों पर उतरे कार्यकर्ता

अपवाद के तौर पर, खासकर जम्मू इलाके में कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस अपराध में पकड़े गए लोगों को निर्दोष बताते हुए जुलूस निकाले. लेकिन उन्होंने भी बच्ची के साथ जो हुआ, उसे सही नहीं ठहराया. प्रधानमंत्री के घटना पर अफसोस जताने के बाद राज्य के उन दो मंत्रियों ने इस्तीफा भी दे दिया, जो अभियुक्तों के बचाव में निकाले गए जुलूस में शामिल हुए थे.

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सबसे बड़ी बात यह है कि इस एक घटना का असर इतना बड़ा हुआ कि भारत में बलात्कार का कानून बदल गया और अब 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार का आरोप सिद्ध होने पर मृत्यु दंड का प्रावधान होगा. यह बहस और है कि किसी भी अपराध के लिए मौत की सजा होनी चाहिए या नहीं. (मेरा निजी मत है कि भारत को भी इस मामले में यूरोप और दुनिया के ज्यादातर देशों से सीखते हुए मौत की सजा खत्म कर देनी चाहिए. बहरहाल यह एक और विषय है.)

कठुआ का मामला निर्भया के साथ हुई घटना से कई मामलों में अलग है. निर्भया वाली घटना दिल्ली में हुई थी, जहां की खबरों के नेशनल बन जाने के मौके यूं भी ज्यादा होते हैं. टीवी स्टूडियो में इस घटना के जुड़े पात्रों और वकीलों को लाना आसान होता है. दिल्ली में ऐसे संगठन हैं जो इन मामलों में सचेत हस्तक्षेप करने की स्थिति में होते हैं. इसके अलावा यहां दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू और जामिया मिल्लिया समेत कई शिक्षा केंद्र हैं, जहां एक जीवंत छात्र आंदोलन है.

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निर्भया की घटना के बाद पहली बार सड़क पर ये स्टूडेंट्स ही आए. जम्मू दिल्ली से दूर है और कठुआ तो जम्मू से भी दूर है. राष्ट्र की मुख्यधारा की कल्पना में यह इलाका कम ही आता है. लड़की की सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि के लिहाज से भी कठुआ की लड़की के लिए पूरे देश का एकजुट होना एक दुर्लभ मामला है. लड़की जम्मू-कश्मीर के गुर्जर बकरेवाल समुदाय की थी, जो अपने राज्य में भी एक अल्पसंख्यक बिरादरी है. आर्थिक रूप से भी लड़की गरीब परिवार की थी और घोड़ा चराने जंगल में गई थी.

ऐसी विपरीत परिस्थिति के बावजूद, कठुआ में एक गरीब चरवाहा लड़की के साथ जो हुआ उसने देश के सामूहिक विवेक को अंदर से झकझोर दिया.

ऐसा होना इस बात का संकेत है कि भारत एक राष्ट्र बन रहा है. संविधान सभा में भारतीय राष्ट्र की संकल्पना पर विचार करते हुए ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारत को एक बनता हुआ राष्ट्र यानी नेशन इन द मेकिंग कहा. संविधान सभा के आखिरी भाषण में उन्होंने इस बारे में विस्तार से बात की है कि भारत एक बनता हुआ राष्ट्र क्यों हैं और उसे एक राष्ट्र बनने के लिए क्या करना होगा.

राष्ट्र होने के लिए साझा सुख, साझा दुख और साझा सपने होने चाहिए

बाबा साहेब ने राष्ट्र की अपनी परिभाषा फ्रांसिसी इतिहासकार अर्न्स्ट रेनान से ली है. अर्न्स्ट रेनान ने अपने प्रमुख आलेख ह्वाट इज ए नेशन यानी एक राष्ट्र क्या है में यह कहा है कि धर्म, भाषा, नस्ल, भूगोल या एक समान स्वार्थ होने भर से लोगों का कोई समूह राष्ट्र नहीं बन जाता. रेनान के लिए राष्ट्र एक आध्यात्मिक विचार है जो इस साझा एहसास से पैदा होता है कि हमने साथ मिलकर अच्छा किया है और आगे भी मिलकर ही यह कहेंगे. राष्ट्र इसलिए है क्योंकि लोग मानते हैं कि वे राष्ट्र के हैं. रेनान इसे डेली रेफरेंडम यानी हर दिन होने वाला जनमत संग्रह मानते हैं. उनके हिसाब से राष्ट्र होने के लिए साझा सुख, साझा दुख और साझा सपने होने चाहिए.

इन तीन चीजों में वे साझा दुख को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं. बाबा साहेब ने भी समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात करते हुए बंधुत्व पर सबसे ज्यादा जोर दिया है. आपसी बंधुत्व के बिना राष्ट्र की कोई कल्पना पूरी नहीं हो सकती. बंधुत्व की भावना को कानून के जरिए लाया भी नहीं जा सकता. भारत जैसे सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी वाले देश में बंधुत्व का होना कितना मुश्किल है, इसकी ओर इशारा करते हुए बाबा साहेब कहते हैं कि- ‘अगर हमने सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी को दूर नहीं किया तो वंचित लोग उस संवैधानिक ढांचे को नष्ट कर देंगे, जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.’

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न्यायपालिक ने आरक्षण के खिलाफ फैसला सुनाया था

भारत में सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी अपनी जगह कायम है. बल्कि आर्थिक गैरबराबरी तो स्पष्ट रूप से बढ़ रही है. सामाजिक गैरबराबरी को संविधान और कानून के जरिए कम करने की कोशिशें हुई हैं, लेकिन इन प्रयासों को सीमित सफलता ही मिली है. ऐसे प्रयासों का विरोध भी एक सतत प्रक्रिया है. भारत के संविधान में पहला संशोधन ही इसलिए करना पड़ा क्योंकि न्यायपालिका ने तमिलनाडु में दिए जा रहे आरक्षण के खिलाफ फैसला सुनाया था.

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ऐसे समय में अगर पूरा देश एक चरवाहा लड़की के मौत के बाद उसके परिवार के दुख में शरीक है, तो इसे एक बनते हुए राष्ट्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण घटना के तौर पर दर्ज किया जाएगा. जम्मू-कश्मीर को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के अब तक के तमाम प्रयासों पर यह बात भारी पड़ती है कि पूरा देश वहां की एक लड़की के पक्ष में खड़ा हुआ. हमें एक ऐसे समय की कल्पना करनी चाहिए जब हरियाणा के भगाना में जब अनुसूचित जाति की लड़कियों के साथ अन्याय हो तो उसके विरोध में तमाम जातियों के लोग सामने आएं.

मुसलमानों को तकलीफ हो तो हिंदु और हिंदुओं को तकलीफ हो तो मुसलमान साथ आएं. महिलाओं की तकलीफ सिर्फ महिलाओं की तकलीफ बन कर न रह जाए. आदिवासियों की जमीन छीनी जाए तो उसका विरोध गैर-आदिवासी भी करें. ऐसा नहीं है कि यह सब बिल्कुल नहीं हो रहा है. लेकिन जितना हो रहा है, वह कम है. यह बार-बार होना चाहिए. इतनी बार कि इस बात पर नजर जाना बंद हो जाए कि किसके दुख में कौन रो रहा है.

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