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कैसे आया दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इतना बड़ा बदलाव?

अतिशी मारलेना को पद से हटाने की खबर मिलने के बाद हमारे मन में यह सवाल चक्कर काट रहा है कि क्या चीजें अब बदल जायेंगी? क्या शिक्षकों में अब पूरा जोशो-खरोश आ गया है और क्या समाज से उन्हें जरूरी सम्मान हासिल होने लगा है?

Preeti Prasad Updated On: Apr 24, 2018 08:48 AM IST

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कैसे आया दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इतना बड़ा बदलाव?

साल 2014 के जनवरी महीने की बात है. तब आह्वान ट्रस्ट ने उत्तर दिल्ली के पांच सर्वोदय विद्यालयों में काम करना शुरु किया. मकसद था प्री-प्राइमरी और प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों को इस किस्म से मदद पहुंचाना कि वे स्कूल के बच्चों के लिए सबसे बेहतर मार्गदर्शक साबित हों. हम जिन जीवन-मूल्यों को भावी पीढ़ी में देखना चाहते हैं, उन मूल्यों का साकार रूप बनकर इन शिक्षकों को दिखाना था. इसका मतलब था कि हमें उनके साथ कुछ इस तरह काम करना है कि वे सबसे पहले तो बेहतर शिक्षक बनकर उभरें और इसके लिए अगर उन्हें कुछ सिखाना था तो वह सीखना रटने-रटाने के तरीके से नहीं हो सकता था. तरीका यही था कि शिक्षकों को गतिविधियों में भागीदारी के जरिए सिखाया जाए.

साल 2014 की जनवरी में स्कूल में घुसने के साथ हमने पहला काम तो एक बुनियादी सर्वे का किया ताकि यह पता चल सके कि दरअसल जो काम हमने हाथ में लिया है, वह अपने रंग-और मिजाज में कैसा है. आह्वान और उसके रिसर्च पार्टनर आंबेडकर यूनिवर्सिटी (दिल्ली) ने क्लासरूम का जायजा लिया, छात्रों की अंग्रेजी, हिन्दी और गणित की काबिलियत की जांच की और लाइब्रेरी ऑडिट भी हुआ.

स्कूलों को समझने में ही वक्त लगा

स्कूल एक-दूसरे से एकदम ही अलग-अलग थे. कुछ स्कूल पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में कायम थे तो कुछ आधुनिक जान पड़ते इलाकों में जिनके आस-पास मंझोली या फिर निचली आमदनी वाले लोगों के रिहाइशी अपार्टमेंट बने हुए थे. कुछ स्कूलों की इमारत एकदम पुरानी और गिरी-ढही सी हालत में थी तो कुछ स्कूलों की इमारत एकदम ही नई. कुछ स्कूलों में हर क्लास में तकरीबन 60 बच्चे थे और पूरे क्लासरुम में तिल रखने भर की भी जगह नहीं दिखती थी जबकि कुछ स्कूल ऐसे भी थे जहां हर क्लास में बमुश्किल 15 बच्चों का नामांकन था. क्लासरूम की साज-सज्जा में इतना बेरुखापन कि उनमें कहीं भी खोजो तो बच्चों की बनाई रचना नदारद. क्लासरूम की फर्नीचर अपनी शक्लो-सूरत में एकदम ही लद्धड़- लकड़ी और लोहे के बने हुए बेंच. कुछ बेचों के कोने से लोहे की पत्तियां बड़े खतरनाक तरीके से निकली हुई थीं जबकि कुछ बेंच बच्चों के हिसाब से एकदम ही बड़े थे जबकि हमें उन्हीं बच्चों के बीच काम करना था.

हमने काम शुरू किया तो समझ में आया कि बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं और उनमें किसी चीज को सीखने की कितनी ज्यादा ललक है. विशेष जरूरत वाले बच्चों का खास ख्याल रखना इन बच्चों के स्वभाव में ही था. लेकिन ये बच्चे यों ही सुस्त बैठे रहते थे या फिर कोई ऊबाऊ काम में लगे होते थे जैसे कि शिक्षक जो कुछ बोल रहा हो उसे दोहराना और ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखा हुआ हो तो उसे किसी मशीन की तरह अपनी कॉपी पर उतारना. तीसरी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते इन बच्चों के दिमाग के दरवाजे एकदम ही बंद हो जाते थे. जो बच्चे ज्यादा तेज थे वे उधम मचाने वाले बच्चों में तब्दील हो जाते थे.

वर्कशॉप से आया टीचरों में जोश

साल 2014 के गर्मियों के दिन बहुत व्यस्त गुजरे. पांच स्कूलों के सरकारी शिक्षकों के साथ हमने एक बड़ा रोचक वर्कशॉप किया. ये शिक्षक बड़े उत्साह के साथ अपने स्कूल पहुंचे और बच्चों को गतिविधियों और अनुभवों के सहारे सिखाने लगे. वर्कशॉप के बाद शिक्षक समझ चुके थे कि समझ बनाते हुए सीखना क्यों जरूरी है और बच्चों के लिए किसी चीज का सीखना क्यों मजेदार होना चाहिए. हमने गर्मी के पूरे दिन तैयारियों में बिताए कि जुलाई में स्कूल फिर से खुलें तो हम शिक्षकों की मदद कर सकें.

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लेकिन 2014 की जुलाई दिल तोड़ने वाला साबित हुई. आलम ये था कि हमारे सरकारी स्कूलों के आधे से अधिक शिक्षक गेस्ट टीचर के रुप में थे. दिल्ली में प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों की 2010 से बहाली नहीं हुई थी. गेस्ट टीचर्स के अनुबंध (कांट्रैक्ट) हर साल 10 महीने के लिए फिर से नए कर दिए जाते थे. गर्मी के छुट्टी के दो महीनों के लिए इन्हें वेतन नहीं मिलता था. बहरहाल, गेस्ट टीचर सितंबर महीने के आखिर के हफ्ते से पहले अपनी नौकरी जॉइन करने के लिए नहीं आते थे. कुछ क्लासेज में छात्र- शिक्षक अनुपात 125:1 का था ( शिक्षा का अधिकार कानून में प्राथमिक स्तर की कक्षाओं में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 का रखा गया है.). शिक्षकों को कॉरीडोर में पहरुओं की भूमिका में रखा गया था ताकि बच्चे एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा ना करें. बच्चों की शिक्षा के पहले तीन अहम महीनों में सीखने-पढ़ाने के नाम पर कुछ भी ना हो सका.

साल 2014 के सितंबर के आखिर में लगा कि हम अपना काम फिर से शुरू कर सकते हैं. सभी शिक्षक काम पर चले आऎ थे. इनमें से ज्यादातर वैसे तो ना थे जैसा कि हमने गर्मियों की छुट्टियों में अपने प्रशिक्षण के जरिए तैयार किया था लेकिन इतना जरूर था कि हर क्लासरुम को एक टीचर मिल गया था. फिर स्कूल को एक भारी संकट ने घेर लिया- सफाई कर्मचारियों ने काम पर आने से इनकार कर दिया. सफाई कर्मचारियों के ना आने से स्कूल परिसर में बड़ी दुर्गंध रहने लगी और आह्वान की टीम के हम सब लोगों को जो विशेष सुविधाओं के बीच पले-पढ़े हैं, ऐसे माहौल में काम करने में परेशानी होने लगी. बच्चे मौज-मजे (या फिर कह लें विकल्पहीनता की हालत में) के भाव में स्कूल आते, इधर-उधर घूमते-टहलते. किस्मत अच्छी थी जो ये बच्चे इंफेक्शन (संक्रमण) से बचे रहे या फिर इन बच्चों से किसी और को इंफेक्शन नहीं लगा.

मैंने आह्वान में 2013 में काम करना शुरू किया. उस वक्त तक ब्रॉडकॉस्ट मीडिया में मेरे 15 साल गुजर चुके थे. दिल्ली के सरकारी स्कूलों की शिक्षा या फिर किसी अन्य बात के बारे में मेरी जो भी जानकारी थी वह सिर्फ मीडिया के सहारे बनी थी.

आह्वान के ट्रस्टीज् (न्यासियों) ने मुझे एक किताब दी. इसका नाम था टीचर्स इन कन्वरसेशन. साल 2011-12 में आह्वान और आंबेडकर यूनिवर्सिटी (दिल्ली) ने एक शोध किया था. किताब उसी शोध पर आधारित थी और किताब में वही बातें लिखी थीं जो मैंने सुन रखा था यानी यह कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों में काम को लेकर उत्साह का अभाव है, वे सम्मान पाने की उम्मीद में समाज और व्यवस्था की तरफ बड़े ललक से देख रहे हैं. शिक्षक पढ़ाई का बस एक ही तरीका जानते हैं कि किताब की लिखी बातों को बच्चों को रटवा दो. पूरी शिक्षा-व्यवस्था की बनावट ऐसी है कि उसमें शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार होता है- उन्हें जनगणना के आंकड़े एकत्र करने के काम में लगाया जाता, इलेक्शन ड्यूटी पर भेजा जाता है, बेमानी-मतलब के प्रशासनिक कामों में उलझाकर रखा जाता है आदि.

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लेकिन इन तमाम चीजों के बाद आइए एक नजर इन बातों पर डालते हैं...

जुलाई 2015- स्कूल खुलने के पहले ही दिन से सभी शिक्षक अपने काम पर आ गये. इनमें से ज्यादातर शिक्षक वही हैं जिन्होंने इन बच्चों को बीते अप्रैल महीने में पढ़ाया था. बच्चों के लिए शिक्षक की यह निरंतरता बहुत मायने रखती है.

अक्तूबर 2015- शिक्षकों को जनगणना के आंकड़े एकत्र करने के लिए जाना था. इसका मतलब था कि अब वे कम से कम एक महीने तक स्कूल नहीं आयेंगे. हम उस महीने का अपना वर्कशॉप कैंसिल (निरस्त) करने ही वाले थे कि खबर मिली कि शिक्षकों से जनगणना का काम लेना रोक दिया गया है. व्यवस्था ने क्लासरूम को कहीं ज्यादा अहमियत दी है.

जनवरी 2016- आह्वान ने शिक्षा निदेशक से भेंट की. हमारी टीम के काम (हमारे एकेडमिक हेड सरदार पटेल विद्यालय के प्री-प्राइमरी के सीनियर टीचर थे. सरदार पटेल विद्यालय दिल्ली के अग्रणी स्कूलों में शामिल है) को देखकर शिक्षा निदेशक ने तुरंत ही हमें एससीईआरटी की एक समिति के अध्यक्ष से जोड़ दिया. एससीईआरटी की यह समिति प्री-प्राइमरी के लिए पाठ्यक्रम तैयार कर रही थी. हमने इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया. सरकारी स्कूलों में प्री-प्राइमरी अबतक एक साल के लिए होती आयी थी. इस दौरान चार साल की उम्र के बच्चों को किंडरगार्डेन में रखा जाता था. लेकिन समिति की सिफारिश पर अप्रैल 2017 से प्री-प्राइमरी की अवधि दो साल के लिए कर दी गई.

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आज जिन 450 सरकारी स्कूलों में प्री-प्राइमरी है उनमें से 300 में नर्सरी की भी कक्षा चलती है. इन दोनों ही कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम बीते अप्रैल से लागू हुआ है. आह्वान को इस बात के लिए बढ़ावा मिला कि वह नये बने पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण दे और स्कूलों के किसी समूह को स्कूली कामकाज के दौरान ज्यादा करीब से मदद पहुंचाये, यह देखे कि क्लासरूम में नया पाठ्यक्रम ठीक तरह से चल पा रहा है या नहीं.

प्री-प्राइमरी की कक्षाओं के लिए चीजों की खरीद के लिए हर स्कूल को फंड दिया गया. इन चीजों में चटख रंगीन और बच्चों के इस्तेमाल के लायक फर्नीचर की खरीद भी शामिल है. आह्वान ने यह विचार सामने रखा कि क्लासरूम को कुछ यों सजाया-बनाया जाय कि वह बच्चों को आकर्षक और सुभीते वाला लगे.

आह्वान के कामकाज वाले इलाके के एक सरकार स्कूल का किंडरगार्टेन क्लासरुम

हर बच्चे को पाठ्यक्रम से जुड़ी फुलवारी नाम की एक वर्कबुक दी गई. इसमें खेल, म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंटस्, क्रेयोन्स, कलरपेपर जैसी वो तमाम चीजे हैं जिनकी बच्चों को जरूरत होती है. अब हर सरकारी स्कूल में ‘दीदी’ रखी गई हैं जो बच्चों को टॉयलेट के इस्तेमाल में मदद करती हैं.

जहां तक हमारी जानकारी है, भारत के सिर्फ पांच राज्यों में पहले से निर्धारित पाठ्यक्रम चलता है. बाकी राज्यों में समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) के फ्रेमवर्क या फिर एनसीईआरटी के सुझावपरक दिशानिर्देश के मुताबिक पाठ्यक्रम चलाया जाता है. सीखना पूरे जीवन भर चलता है और इसके लिए पक्की बुनियाद बच्चे के शुरुआती सालों में पड़ जाती है. यह बात एकदम जानी-समझी है लेकिन इस चीज को बाकी जरूरतों के बीच अहमियत देने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरुरत है.

आह्वान जिन पहलकदमियों का साक्षी बना उनमें से कुछ यों हैं:

स्कूलों में इस्टेट मैनेजर रखे गये ताकि शिक्षकों को प्रशासनिक कामों में वक्त जाया नहीं करना पड़े. सफाई कर्मचारियों की जरुरतों का ये इंस्टेट मैनेजर खास ख्याल रखते हैं.

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हमारे स्कूली में अब मेगा पीटीएम (शिक्षकों-अभिभावकों की साझी बैठक) होता है. अमूमन ये माना जाता है कि बच्चों के अभिभावक हर बात को लेकर चिल्ल-पों मचाते हैं लेकिन अब अभिभावकों की शिकायतें शिक्षक सुनने लगे हैं, शिकायतों का समाधान करते हैं. शिक्षा विभाग ने पीटीएम के लिए दिशा-निर्देश भेजे हैं- हमने जिन स्कूलों का दौरा किया वहां इन दिशा-निर्देशों का पालन होता दिखा. हमने देखा कि अभिभावकों के समूह को कुछ जिम्मेदारियां दी गई हैं. उनसे कहा गया है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के काम में अपनी भागीदारी के लिए वे रास्ते सुझायें, चाहें उनकी खुद की शैक्षिक पृष्ठभूमि कोई भी हो. हमने सुना कि शिक्षक हर बच्चे की प्रगति के बारे में उसके अभिभावकों को बताते हैं और अभिभावकों को इस बात का साफ पता होता है कि उनका बच्चा कहां तक पहुंचा है.

छह स्कूलों के समूह के लिए मेंटर टीचर की बहाली हुई है. हमने इनके लिए एक चलताऊ किस्म का वर्कशॉप किया जिसमें बताया गया कि शिक्षकों को रचनात्मक तरीके से कैसे फीडबैक दिया जाय. हमें जागरुकता का स्तर देखकर अचरज भरी खुशी हुई. उन लोगों ने विषय से जुड़े जरूरी सवाल पूछे और वे वर्कशॉप के विषय में पूरी तरह डूबे हुए थे. जाहिर है, इन शिक्षकों का प्रशिक्षण बेहतर हुआ है.

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साल 2016 से छठी कक्षा के छात्रों के लिए समर प्रोग्राम शुरु हुआ. कुछ गेस्ट टीचर को इस समर प्रोग्राम के लिए रखा गया था. हमने इन गेस्ट टीचर के लिए एक प्रशिक्षण-कार्यक्रम चलाया. पाठ्यक्रम खेल-खेल में चीजों को सीखने पर केंद्रित था.

साल 2014 के हमारे बेसलाइन सर्वे से पता चलता है कि ग्रेड-4 के लगभग 60 फीसद बच्चे बड़ी बुनियादी चीजें जैसे अपना नाम तक लिखने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं. ऐसे बच्चों की मदद के लिए 2016-17 में चुनौती और 2018 में बुनियाद नाम की परियोजनाएं चलीं. कुछ स्कूल के प्रिंसिपल ने हमसे कहा कि पाठ ना पढ़ पाने वाले बच्चों की मदद करें. ऐसे में हमारे काम का दायरा बढ़ गया. हमारा ज्यादा ध्यान प्री-प्राइमरी के बच्चों पर था लेकिन जहां जरूरत थी वहां हमने माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों के बीच भी काम किया. हमें लगा कि अगर हमने इस मौके में भागीदारी नहीं की तो एक बड़े बदलाव में शिरकत करने से महरुम रह जायेंगे! जो पद्धति हमने छोटे बच्चों के लिए अपनायी थी वैसी पद्धति हमने इन बच्चों के लिए अपनायी क्योंकि इन ज्यादातर बच्चों को हासिल शऊर और हुनर ग्रेड-1 या 2 के स्तर का था. खूब सारी कहानियां सुनाना, किताबें पढ़वाना, अक्षरों की ध्वनियां बताना, नाटकों, वीडियो आदि के जरिए बताना- ये सारे तरीके अपनाकर बच्चों को पढ़ने में मदद पहुंचाने की कोशिश हुई.

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साल 2014 के हमारे बेसलाइन सर्वे का एक हिस्सा लाइब्रेरी ऑडिट से भी जुड़ा था. ऑडिट में हमने पाया कि स्कूल की लाइब्रेरी में कहानियों की किताबें एकदम से नहीं हैं. स्कूलों में लाइब्रेरी थी लेकिन किताबों को दराजों में बंद करके रखा गया था ताकि बच्चे इन किताबों को कहीं नुकसान ना पहुंचा दें! पूरे स्कूल के लिए कोई एक लाइब्रेरी नहीं बल्कि हमारे कई स्कूलों में हर क्लासरूम की अपनी-अपनी लाइब्रेरी है. इन लाइब्रेरीज में बच्चों को छूने, देखने, पढ़ने और मन करे तो फाड़ने के लिए भी खूब मनोरंजक किताबें रखी गई हैं!

साल 2016 में कुछ लोग कैंब्रिज गये जिनमें हमारे स्कूलों की एक प्रिंसिपल भी शामिल थीं. प्रिंसिपल कैंब्रिज से पूरे जोशो-खरोश के साथ लौटीं, उनके दिमाग में खूब सारे विचार चल रहे थे. जब शिक्षक जोश और जज्बा दिखाते हैं तो टीम के बाकी लोग उसके पीछे-पीछे चलते हैं. यही वजह रही जो क्लासरूम तो पर्याप्त संख्या में मौजूद ना थे तब भी प्रिंसिपल ने प्ले कार्नर की जगह निकाल ही ली और अलग-अलग गतिविधियों के लिए कॉरिडोर में कुछ स्पेस निकाले.

स्कूल के प्रिंसिपल के पास अमूमन इतना वक्त नहीं होता कि वे कुछ समय प्री-प्राइमरी सेक्शन में भी गुजार सकें. अकादमिक रुप से देखें तो प्रिंसिपल का ध्यान ग्रेड 10 और 12 पर रहता है. पिछले साल सभी स्कूलों में प्री-प्राइमरी इंचार्ज रखे गये. हर स्कूल में टीचर डेवलपमेंट को-ऑर्डिनेटर्स रखे गये हैं. ये शिक्षक के पेशेवर विकास की जरूरतों का ख्याल रखते हैं. इससे डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग (डाएट,यह शिक्षकों को सेवा से पहले तथा सेवाकालीन प्रशिक्षण मुहैया कराता है) को शिक्षकों की जरूरतों के हिसाब से प्रशिक्षण-कार्यक्रम तैयार करने में मदद मिलेगी. बीते दो सालों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या दोगुनी हो गई है. शिक्षकों के लिहाज से यह बहुत अच्छा है क्योंकि शिक्षक-समुदाय को ताउम्र सीखना होता है.

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निजी तौर पर मैंने महसूस किया कि सत्ता के गलियारों में लोग अपनी जिम्मेवारी महसूस कर रहे हैं! समान सोच-समझ वाले लोगों के साथ, चाहे वे गैर-सरकारी संगठनों के ही क्यों ना हों, हेल-मेल में गर्मजोशी दिखायी दे रही है. अब हमलोग एनजीओ-वाला भर नहीं है- हमें व्यवस्था के बाहर का नहीं समझा जाता. हमें व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है.

बुधवार के दिन आम आदमी पार्टी के नौ पदाधिकारियों को नौकरी से हटाने के आदेश वाली एक चिट्ठी मिली. केंद्र सरकार की एक एडवायजरी में कहा गया कि ये पद अब निरस्त हो गये हैं. जिन नौ पदाधिकारियों को यह चिट्ठी मिली हैं उनमें एक हैं अतिशी मारलेना. अतिशी दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को शिक्षा के मसले पर सलाह-मशविरा देती रही हैं. हालांकि हमारा काम शिक्षा विभाग के प्रशासनिक खंड के नेटवर्क के जरिए होता है लेकिन हमलोगों ने कई बार अतिशी मरलेना से बातचीत की थी. विभाग के साथियों ने कहा था कि इन सारी पहलकदमियों के पीछे अतिशी मरलेना का ही दिमाग और मेहनत है. वे हमलोगों के लिए हर अवसर पर मौजूद रहती थीं- वो वॉट्सऐप के जरिए और ईमेल के मार्फत हमें जवाब देती थीं और जब हम उनसे समय मांगते थे तो वो कभी-कभार हमसे कॉफीशॉप में भेंट करती थीं.

उन्हें पद से हटाने की खबर मिलने के बाद हमारे मन में यह सवाल चक्कर काट रहा है कि क्या चीजें अब बदल जायेंगी? और अगर ऐसा होता है तो क्या वह जरूरी है? क्या शिक्षकों में अब पूरा जोशो-खरोश आ गया है और क्या समाज से उन्हें जरूरी सम्मान हासिल होने लगा है? ना, यह सब तो अभी नहीं हुआ. लेकिन क्लासरूम में बदलाव साफ महसूस किया जा सकता है. बेशक, व्यवस्था से जुड़े बदलाव रातों-रात नहीं हो जाते, ऐसे बदलावों के लिए निरंतरता जरूरी है. शासन चाहे जिस पार्टी का हो लेकिन क्या इस काम में निरंतरता जरुरी नहीं है?

(लेखिका आह्वान ट्रस्ट ऑफ एजुकेशन की डायरेक्टर और एक पूर्व मीडियाकर्मी हैं. वो किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ीं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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