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तंदूर हत्याकांड: सुशील शर्मा हुआ रिहा, जानिए इस मामले की पूरी टाइम लाइन

विवाहेत्तर संबंध के शक में सुशील शर्मा ने 2 जुलाई 1995 को पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या कर दी थी

Updated On: Dec 21, 2018 04:28 PM IST

FP Staff

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तंदूर हत्याकांड: सुशील शर्मा हुआ रिहा, जानिए इस मामले की पूरी टाइम लाइन

दिल्ली हाईकोर्ट ने 1995 के तंदूर हत्याकांड के दोषी सुशील शर्मा को रिहा करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने शर्मा को तुरंत प्रभाव से रिहा करने का ऑर्डर दिया है. इस केस का दोषी सुशील पिछले 23 सालों से तिहाड़ जेल में बंद है. पिछले कुछ वक्त से उसके रिहाई की याचिका कोर्ट के पास लंबित थी, जिसपर आज फैसला आया है.

पूर्व में कांग्रेस नेता रहा सुशील शर्मा ने 1995 में अपनी पत्नी नैना साहनी की हत्या कर दी थी. हत्या करने के बाद शव को कई टुकड़ों में काट दिया और फिर उसे एक मशहूर रेस्रां के तंदूर में जलाने की कोशिश की. लेकिन पुलिस को कुछ संदिग्ध जलने की सूचना मिली और रेस्रां के मैनेजर केशव कुमार को पुलिस ने मौके से गिरफ्तार कर लिया. हालांकि सुशील शर्मा भागने में कामयाब रहा.

इस मामले में कब, क्या हुआ?

- सुशील शर्मा युवा कांग्रेस का नेता था. उसकी शादी नैना साहनी से हुई थी. नैना भी कांग्रेस में ही काम करती थी. शादी के कुछ साल बाद सुशील को शक हुआ कि उसकी पत्नी का किसी से विवाहेत्तर संबंध है. 2 जुलाई 1995 को उसने नैना को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया.

- पत्नी की हत्या करने के बाद शर्मा फरार हो गया. 10 जुलाई 1995 को पुलिस ने उसे बेंगलुरु से गिरफ्तार किया.

- 12 जुलाई 1995 को दिल्ली की एक अदालत ने शर्मा को 10 दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया.

- 27 जुलाई 1995 को दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल किया.

- 31 अगस्त 1995 को सत्र न्यायालय में मामले का ट्रायल शुरू हुआ.

- 9 मई 1996 को ट्रायल कोर्ट ने शर्मा के खिलाफ धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया.

- जनवरी 1999 में कोर्ट ने इस मामले में इविडेंस रिकॉर्ड किया.

- 27 सितंबर 1999 को इस मामले की प्रतिदिन सुनवाई शुरू हुई.

- 17 अप्रैल 2001 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को वीके जैन और जीपी थरेजा की कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया.

- 23 सितंबर 2003 को ट्रायल कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुरक्षित रख लिया.

- 3 नवंबर 2003 को कोर्ट ने शर्मा को दोषी करार दिया.

- 7 नवंबर 2003 को कोर्ट ने सुशील शर्मा को फांसी की सजा सुनाई और रेस्रां के मैनेजर केशव कुमार को 7 साल की सश्रम करावास की सजा सुनाई.

- दिसंबर 2003 में शर्मा ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ चुनौती देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाई.

- अगस्त 2006 में हाईकोर्ट ने मामले की प्रतिदिन सुनवाई शुरू की.

- 17 जनवरी 2007 में हाईकोर्ट ने अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया.

- 19 फरवरी 2007 को दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सजा-ए-मौत के फैसले को बरकरार रखा.

- 7 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले को देखने के बाद पता चलता है कि दोषी ने अकेले ही इस वीभत्स घटना को अंजाम दिया है. जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह समाज के खिलाफ अपराध नहीं है, लेकिन यह आरोपी द्वारा अपनी पत्नी के साथ तनावपूर्ण व्यक्तिगत संबंधों के कारण किया गया अपराध है.

शीर्ष अदालत ने इसी को ध्यान में रखकर फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया.

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