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तमिलनाडु: स्टरलाइट प्लांट को लेकर पहले भी हो चुका है विवाद, जानिए पूरा मामला

स्थानीय लोगों और पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा करने वाले समूहों का कहना है कि इस प्लांट की वजह से ग्राउंड वॉटर और वायु प्रदूषित हो रहा है

Updated On: May 23, 2018 10:57 AM IST

FP Staff

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तमिलनाडु: स्टरलाइट प्लांट को लेकर पहले भी हो चुका है विवाद, जानिए पूरा मामला

तूतीकोरिन के कॉपर प्लांट में मंगलवार को हुई पुलिस फायरिंग में 11 लोगों की जान चली गई. लेकिन यह पहली बार नहीं हुआ है जब यह कंपनी किसी गलत कारणों से सुर्खियों में आई हो . स्टरलाइट कॉपर वेदांता लिमिटेड का एक भाग है जो कि वेदांता रिसोर्सेज़ की एक सहायक कंपनी है.

1997 में शुरू हुई यह कंपनी तूतीकोरिन में कॉपर का खनन करती है. प्लांट की यूनिट में एक स्मेल्टर, एक रिफायनरी, एक फास्फोरस एसिड प्लांट, एक कॉपर रॉड प्लांट और तीन कैप्टिव पावर प्लांट शामिल हैं. स्थानीय लोगों और पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा करने वाले समूहों का कहना है कि इस प्लांट की वजह से ग्राउंड वॉटर और वायु प्रदूषित हो रहा है.

क्या है पूरा मामला

दरअसल ये सारा विरोध मार्च में शुरू हुआ, जब कंपनी ने कहा कि वो अपना उत्पादन 4 लाख टन से बढ़ाकर 8 लाख टन प्रति वर्ष करेगी. इसके बाद 29 मार्च को मेंटेनेस के लिए प्लांट को 15 दिनों के लिए बंद कर दिया गया. लेकिन फिर प्लांट 6 जून तक बंद रहा क्योंकि तमिलनाडु प्रदूषण बोर्ड ने पर्यावरण के नियमों का अनुपालन न करने के कारण इसे दुबारा शुरू किए जाने की अनुमति नहीं दी थी.

हालिया विरोध प्रदर्शनों के चलते पीसीबी (प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ने कंपनी के 25 साल पुराने लाइसेंस को रिन्यू करने से मना कर दिया है. गौरतलब है कि कंपनी के लाइसेंस की समय सीमा इसी साल समाप्त हो रही है. पीसीबी ने लाइसेंस रिन्यू न करने के पीछे 6 कारण बताए हैं जिसमें से एक कारण ये भी बताया गया है कि कंपनी पर्यावरणीय मानकों को पूरा नहीं करती है.

बंद होने की कगार पर खड़ी कंपनी स्टरलाइट ने इसके विरोध में अपील की लेकिन उसे खारिज कर दिया गया. इस समय कंपनी 'तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपीलेट अथॉरिटी' लाइसेंस को रिन्यू किए जाने का केस लड़ रही है.

दागदार इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जा रहा हो. 90 के दशक से ही स्थानीय लोग कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे हैं. जब से कंपनी ने काम शुरू किया तभी से इस पर कानूनी का पालन न किए जाने को लेकर सवाल उठते रहे हैं. कंपनी की स्थापना से लेकर ही पर्यावरण मंत्रालय ने इससे पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने की मांग की थी क्योंकि कंपनी ने कहा था कि वो रोज़ 1200 टन कॉपर का उत्पादन करेगी. कंपनी की स्थापना के समय किसी तरह का कोई पब्लिक कंसल्टेशन नहीं किया गया जबकि इन्वायरमेंटल इंपैक्ट एसेसमेंट नोटीफिकेशन, 2006 के अनुसार कॉपर स्मेल्टर प्लांट लगाने से पहले पब्लिक हियरिंग ज़रूरी है.

10 मई 2016 को मद्रास हाईकोर्ट ने प्लांट को क्लियरेंस देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था. मंत्रालय ने कंपनी के आवेदन को खारिज करने के पीछे इसकी लोकेशन को बताया था. प्लांट, मन्नार की खाड़ी में स्थित चार द्वीपों में से एक द्वीप से 25 किलोमीटर दूर है. यह क्षेत्र समुद्री पर्यावरण के मद्देनज़र काफी संवेदनशील है. और इस क्षेत्र में प्लांट की स्थापना पर्यावरणीय नियमों के खिलाफ है.

कानूनी रुकावटें

2005 में नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट दाखिल की थी जिसमें कहा गया था कि इस एरिया के ग्राउंड वॉटर में प्लांट के आसपास लेड, कॉपर, कैडमियम, क्लोराइड, फ्लोराइड व आर्सेनिक की मानक से अधिक मात्रा पाई गई थी.

2013 में कुछ स्थानीय लोगों द्वारा गले में समस्या, उल्टी व सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की गई जिसके बाद राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के आदेश पर प्लांट को बंद कर दिया गया था. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के चलते कंपनी पर 100 करोड़ का फाइन लगा दिया था.

लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्लांट को चालू करने का आदेश दे दिया. सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि हालांकि ये तूतीकोरिन में पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर रहा है लेकिन कंपनी की वजह से काफी रोज़गार के साथ साथ राज्य के लिए राजस्व भी पैदा हो रहा है.

लंदन की वेदांता रिसोर्सेज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के आरोप झेल रही है. वेदांता और इसकी सहायक कंपनी कोंकोला कॉपर माइंस पर ब्रिटिश कोर्ट में केस चल रहा है. ज़ाम्बिया के एक गांव वालों ने उन पर आरोप लगाया है कि कंपनी द्वारा खनन किए जाने की वजह से वहां का पानी प्रदूषित हो रहा है और हज़ारों स्थानीय लोगों की आजीविका खत्म हो रही है.

(न्यूज 18 के लिए राखी बोस की रिपोर्ट)

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