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तमिलनाडु: राज्यपाल के गाल थपथपाने को तूल देना असल मामलों को कमजोर करना है

तमिलनाडु के राज्यपाल की ये हरकत कतई गैरजरूरी थी लेकिन इसे जरूरत से ज्यादा बड़ा बनाना भी गलत है

Updated On: Apr 18, 2018 05:50 PM IST

Bikram Vohra

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तमिलनाडु: राज्यपाल के गाल थपथपाने को तूल देना असल मामलों को कमजोर करना है

मैं आठ साल का था और मुझे पंडित जवाहर लाल नेहरू को अंबाला कैंट के स्कूल में फूल देने के लिए चुना गया. मैं भूल नहीं सकता कि जब मेरा नाम बुलाया गया तो मैं कितना उत्साहित था. मगर मैंने गड़बड़ की और गुलदस्ता जमीन पर गिरा दिया. मेरी सबसे अच्छी यादों में से ये है कि भारत के प्रधानमंत्री झुके और उन्होंने जमीन से गुलाब के फूल उठाने में मेरी मदद की. उन्होंने मेरे बालों को सहलाया, गाल थपथपाए. न मुझे इससे शॉक लगा, न इससे मुझे डर लगा. उस समय इस तरह की सहृदयता बहुत सामान्य बात थी. अंकल-आंटियों का गले लगाना, चूमना, बाल बिगाड़ना और गाल सहलाना बहुत सामान्य बात है.

कहीं न कहीं समय के साथ हमने ये मासूमियत खो दी है. अब हर कोई शक के दायरे में है. हर सामान्य से सामान्य हरकत को भी 'गंदा' बनाकर पेश किया जा सकता है. तमिलनाडु के गवर्नर बनवारीलाल पुरोहित ने एक महिला पत्रकार के गाल थपथपाए. इस बात का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता. ये हरकत कतई अनप्रोफेशनल और गैरजरूरी थी. शायद आज के समय पंडित नेहरू मेरे गाल सहलाते तो मैं भी उनकी इस हरकत पर उनके पीडोफाइल(बच्चों का शोषण करने वाला) होने का शक जाहिर करता.

गाल सहलाने पर अगर आप नाराज़ होना चाहें तो हो सकते हैं. लेकिन इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर उसे बढ़ाना सही नहीं है. हर किसी को पता होता है कि गलत तरीके से छूना क्या होता है. महिलाएं और बच्चों को जब भी गलत तरीके से छुआ जाता है उन्हें पता चल जाता है, वो असहज हो जाते हैं. उन्हें सुरक्षित और संवेदनशील महसूस करना ही चाहिए. बसों में छुआ जाना, बाज़ारों में धक्का-मुक्की जैसी हरकतें आदमी अक्सर औरतों के साथ करते हैं. इन सारी हरकतों का पुरजोर विरोध होना ही चाहिए.

लेकिन ये सारे विरोध कमजोर पड़ते हैं जब छोटी सी बात को बड़ी घटनाओं में बदलने की कोशिश की जाती है. राज्यपाल की इस घटना को किसी भी तरह से बच्ची के साथ बलात्कार के बराबर नहीं रखा जा सकता है. लक्ष्मी सुब्रमण्यन ने कोई पुलित्ज़र पुरस्कार नहीं जीता है. उनके सामने उनके पिता से बड़ा व्यक्ति था जिनसे भीड़ के सामने उनके गाल थपथपाए.

ये गैरजरूरी हरकत थी. लेकिन इसके बाद भी क्या ये नेशनल हेडलाइन बनाने लायक बात है? ये क्या ये सही में देश में चल रही घटनाओं के बीच की कड़ी है? हम इस मुद्दे में लड़की की निजता को भी शर्मिंदा कर रहे हैं. क्योंकि वो पत्रकार गलत कारणों से चर्चाओं में है और ये सही बात नहीं है.

हमारे जैसे बहादुर और हिम्मतवाले पत्रकार अपनी लड़ाई खुद चुनते हैं. ये 'अपराध' काफी कम आंका जाता अगर कोई 'ताकतवर' मुख्यमंत्री ये काम करता. क्योंकी ऐसे नेता वापस पलटवार कर सकते हैं. अपेक्षाकृत कमजोर राज्यपालों को निशाना बनाकर अपना साहस और लड़ने की हिम्मत दिखाना बहुत आम बात है.

राज्यपाल मंत्रियों से आसान निशाना होते हैं. मंत्रियों के पास जनाधाधर होता है, उनके समर्थकों का गैंग होता है. और अक्सर लोग इससे नहीं उलझना चाहते है. 'कड़े सवाल पूछने' की बात कहना ये कहने का दूसरा तरीका है कि बद्तमीजी भरे तरीके से सवाल पूछे गए. 78 साल के राज्यपाल इस हमले को आसानी से नर्म कर सकते थे.

अगर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, प्रेसिडेंट पुतिन या पीएम मोदी ने ऐसा किया होता तो भी क्या लोगों की ऐसी होती? क्या यौन हिंसा जैसे आरोप लगते या फिर लोग इस बात पर हंसकर उसे एक प्यार भरा कदम बता देते. याद रखिए यहां डोनाल्ड ट्रंप का नाम छोड़ दिया गया है.

ये निश्चित है कि इन्हीं गवर्नर के राज में टीचर सेक्स स्कैंडल की बात कही जा रही है. जहां वीआईपी और छात्राओं को कॉलेज में गलत तरह से जोड़ने की बात कही गई है. छात्राओं से जुड़ी ये घटना लंबे समय तक चर्चा में रहेगी. लेकिन इसे राज्यपाल पर दबाव बनाने के लिए साथ जोड़ा जा रहा है. जब तक राज्यपाल के खिलाफ टीचर सीधे सेक्सुअल फेवर मांगने का आरोप नहीं लगाती है उन्हें बेनिफिट ऑफ डाउट मिलना चाहिए. राज्यपाल का कहना है कि वो राजभवन में अपने स्टाफ से हर समय घिरे रहते हैं. अगर राजभवन में लड़कियां आतीं तो चाय वाले तक को पता होता. सच क्या है, जल्द सामने आएगा. तब तक धैर्य रखने की जरूरत है.

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