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तमिलनाडु के किसानों का विरोध वापस लेना 'गांधीगीरी' की हार है?

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक इतिहास के सबसे तबाह करने वाले सूखे का सामना कर रहे हैं

Updated On: Apr 25, 2017 01:37 PM IST

T S Sudhir

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तमिलनाडु के किसानों का विरोध वापस लेना 'गांधीगीरी' की हार है?

महात्मा गांधी असफल हो चुके हैं. तमिलनाडु के किसानों का जंतर-मंतर पर अपने 100 दिन के विरोध प्रदर्शन को बंद किया जाना इसी बात का प्रमाण है. यकीन मानकर चलिए गांधीगीरी अब काम की नहीं रह गई है. अगर आगे आपको इसकी जरूरत पड़ती है तो कोई फायदा नहीं होने वाला.

पिछले छह हफ्तों से तमिलनाडु के सौ से ज्यादा किसान खुद की लाज को लंगोटी से छिपाकर अपने सम्मान के अहसास से समझौता करते हुए एक नजारा बन गए थे.

उन्होंने अपने पेशाब को पीने की कोशिश की, प्रधानमंत्री के घर के सामने नग्न प्रदर्शन किया...अपने साथ अपने उन प्रियजनों की खोपड़ी ले आए जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर के बाद या तो आत्महत्या कर ली थी या जिनकी मौत हो गयी थी.

इन लोगों ने सड़क पर खाना खाया, जिंदा चूहों और मरे हुए सांपों को अपने मुंह में डाला. मीडिया का ध्यान को खींचने के लिए विरोध के कंपा देने वाले मंजर पेश किए. लेकिन उनके अहिंसक प्रदर्शन से कुछ भी हासिल नहीं हो पाया.

तमिलनाडु के किसानों ने अपने उन साथियों की खोपड़ियां दिखाई जिन्होंने आत्महत्या कर ली है. यह विंध्य के लोगों का उत्तर में रहने वाले लोगों के लिए जबरदस्त प्रतिक्रिया की आवाज हो सकती है लेकिन नई दिल्ली ने तमिलनाडु से मुंह मोड़ लिया. जैसे कह रहे हों, 'मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है.'

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खेती और सूखे जैसे गंभीर मुद्दों पर किसी को भी जादुई समाधान की उम्मीद नहीं थी. लेकिन जब देश के लोगों की ओर से चुनी गई उम्मीदों की सरकार भी तमिल किसानों तक अपनी बाहें नहीं फैला सकती है और न ही उनकी पीठ सहला सकती है तो उन्हें कम से कम इतना तो भरोसा दे ही सकती है कि हाँ, हमें आपकी परवाह है और हम जरूर कुछ करेंगे.

मगर ऐसा नहीं हो पाया. ऐसा कर सरकार अपनी गंभीर और उदार छवि लोगों तक पहुंचाने में विफल रही है. किसान 'मन' को महसूस करना चाहते थे लेकिन वे अपने टूटे हुए मन से ऐसे चेन्नई वापस हो गए कि वे किसी भी तरह की 'मन की बात' सुन ही नहीं पाए.

New Delhi: Tamil farmers dressed up in tattered clothes to act like insane people during their agitation demanding loan waiver and compensation for crop failure, at Jantar Mantar in New Delhi on Wednesday. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI4_19_2017_000118B)

दिल्ली के जंतर-मंतर पर फटेहाल हाल में प्रदर्शन करते हुए तमिलनाडु के किसान

चेन्नई में क्यों नहीं? 

सवाल है कि आखिर दिल्ली में आंदोलन करने वाले किसानों ने चेन्नई में यह आंदोलन क्यों नहीं किया?

इस सवाल का जवाब सिर्फ यही है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि पिछले कई महीनों से तमिलनाडु के अलग-अलग जिलों में उनके विरोध प्रदर्शन का नतीजा कुछ भी नहीं हुआ. क्या तमिलनाडु के बाहर कोई भी उन लोगों को जान पाया जो जीवित चूहों को मुंह से पकड़े हुए हैं?

वे सरकारी बैंकों से ऋण माफी चाहते थे वे चाहते थे कि केंद्र तमिलनाडु और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के लिए एक महत्वपूर्ण सूखा राहत पैकेज दे जो कि मौसम के हिसाब से खराब सालों में भी उन्हें नदी के पानी का अच्छा-खासा हिस्सा उपलब्ध करवा सके.

ये मुद्दे केंद्र सरकार की ओर से हल करने के मुद्दे हैं न कि चेन्नई सरकार के मुद्दे हैं. राजनीतिक आग बुझाने में लगे सत्ताधारी एआईएडीएमके पार्टी के साथ फोर्ट सेंट जॉर्ज का मामला पहले से ही सुर्खियों में है.

ऐसा नहीं है कि आंदोलनकारी सत्ताधारी लोगों के मन में अपनी जगह नहीं बना पाए. उन अव्यवहारिक आलोचकों और प्रतिष्ठानों के समर्थकों ने एक कोशिश जरूर की थी जिन्होंने सूखे कावेरी डेल्टा की तरफ अपने कदम नहीं बढ़ाए थे.

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प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के इरादे से किसान नेता को एक समृद्ध व्यक्ति के रूप में इस तरह चित्रित किया गया था मानों कोई भी किसान पैसे पाने के योग्य न हो.

राष्ट्र-विरोधी करार देकर उन्हें कमतर करते हुए कलंकित किया गया. हैरत की बात नहीं है कि एक ही जनजाति पर विचार करते हुए पूर्व बीजेपी सांसद तरुण विजय ने कहा था कि उत्तर भारतीयों ने 'काले' दक्षिण भारतीयों के साथ एक ही देश में रहते हुए किसी भी तरह का पक्षपात नहीं किया है.

लेकिन, यह सिर्फ किसानों के बारे में नहीं है. यह उन लोगों के बारे में है जो सत्ता में रहते हुए किस तरह का जवाब देते हैं. शायद यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों में हर किसी के कानों में एक ऐसी आवाज आती रही है जो कि लुटियन दिल्ली के कार्यों के साथ निराशा की भावना व्यक्त करती है.

New Delhi: Congress Vice President Rahul Gandhi meeting woth the Tamil farmers who are agitating for loan waiver and compensation for their crop failure at Jantar Mantar in New Delhi on Friday. PTI Photo by Vijay Verma (PTI3_31_2017_000107B)

ये किसान सरकार से अपनी फसल खराब हो जाने पर मुआवजे की मांग कर रहे थे

अपमान का दंश

जनवरी में जल्लीकट्टू विरोध के जरिए चेन्नई 'हमसे ऊपर भारत' जैसी भावना से अपमानित किए जाने के साथ उबल रहा था. मरीना तट पर ज्यादातर विरोध करने वालों ने यह महसूस किया कि दिल्ली दक्षिण भारत को नहीं समझ सकती है और तमिलनाडु को तो बिल्कुल नहीं समझ सकती है.

शनिवार को तमिलनाडु विधानसभा के विपक्ष के नेता एम के स्टालिन ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर गैर-हिन्दी भाषी नागरिकों पर हिन्दी थोपे जाने का आरोप लगाया. हालांकि, राज्य में किसी हिन्दी विरोधी आंदोलन की सुगबुगाहट उस तरह की नहीं है जैसी कि 1960 के दशक में हुई थी.

लेकिन स्टालिन जिस मुद्दे को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं उसे धीरे-धीरे दूसरे गैर-हिन्दी भाषियों की तरह तमिल में भी छोटे स्तर पर ही मगर महसूस किया जा रहा है.

ऐसा नहीं कि किसी नई भाषा की तरफ झुकाव कोई गलत बात है लेकिन स्टालिन उन तमाम बिंदुओं को मिलाने की कोशिश कर रहे हैं जो गैर-हिंदी भाषियों को भी खलती है और वह है हिंदी को संपर्क भाषा बनाया जाना.

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स्कूल से लेकर संसद तक और यहां तक कि राजमार्गों पर भी हिन्दी दिखने लगी है- जबकि पिछले 140 सालों में तमिलनाडु में पड़े सबसे भयानक सूखे को लेकर किसी भी तरह की सहानुभूति जाहिर नहीं की जा रही है. असल में यह दिल्ली सल्तनत की ओर से दिखाये जा रहे वर्चस्व का प्रतीक है.

और ऐसा नहीं कि ये महसूस करने वाले अकेले स्टालिन हैं. अभिनेता से राजनेता बने पवन कल्याण कुछ समय से उत्तर-दक्षिण विभाजन पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते रहे हैं.

वह एनडीए सरकार के जरिए आंध्र प्रदेश को विशेष श्रेणी का दर्जा देने के अपने वादे पर मुकरते चले जाने को लेकर परेशान थे और इसे वो दिल्ली की मानसिकता करार देते हैं.

tamilnadu farmers

इन किसानों ने सरकार से कर्ज माफी की मांग की थी

दिल्ली का मतलब भारत नहीं

पवन कल्याण ने कभी ट्वीट किया था, 'भारत की एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय पार्टियों-बीजेपी, कांग्रेस को अपनी यूपी, बिहार तथा दिल्ली केंद्रित राजनीति से बाज आना चाहिए. उन्होंने फिर ट्वीट किया, 'सिर्फ दिल्ली का मतलब ही भारत नहीं होता.'

परोक्ष रूप से उनका सुझाव था कि दक्षिण भारत को लेकर दिल्ली की अज्ञानता और उसका अहंकार उन लोगों को पीड़ा पहुंचाते हैं जो विन्ध पर्वत के निचले हिस्से में रहते हैं. उन्हें ये भी लगता है कि अपने किसी पूर्व सहयोगी को लेकर बीजेपी भला ऐसी प्रतिक्रिया कैसे दे सकती है.

पार्टी प्रवक्ता ने कल्याण को ट्वीटर टाइगर कहते हुए खारिज कर दिया लेकिन वो ये भूल गए कि उनके नेता खुद सोशल मीडिया पर जोर देते हैं. कम से कम जो लोग आंध्रप्रदेश से हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि 'बढ़ते अपमान' का मतलब होता क्या है?

साढ़े तीन दशक पहले एनटी रामाराव तेलुगू आत्मगौरवम् के मुद्दे पर ही सत्तारूढ़ हुए थे. ऐसा तब हुआ था जब तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी ने हैदराबाद हवाई अड्डे पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी अन्जैया का अपमान किया था.

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यह तमिल गौरव और आत्मसम्मान को लेकर उसी तरह की बयानबाजी है जिसे एक बार फिर हवा दी जा रही है. अगर इसे सावधानी और गंभीरता के साथ नहीं लिया गया तो यह भारत नाम के ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है.

हिंदी की अंधपरस्ती के रूप में आजकल जो दिख रहा है उसके जवाब में कल्याण ने रविवार को ट्वीट किया, 'अगर केन्द्र हमारे जैसे किसी देश में उप-राष्ट्रीयता का सम्मान नहीं करता है जो अपनी सांस्कृतिक, भाषायी और नस्लीय विविधता के रूप में जाना जाता है तो इसका मतलब यह होगा कि वो अलगाववादी आंदोलनों के लिए एक ऊर्वर जमीन तैयार कर रहे हैं.'

सच तो ये है कि जो कोई भी आगे अपना विरोध प्रदर्शन करना चाहता है वो जंतर-मंतर वाले ढांचे में नहीं नजर डालेगा. वो सोचेगा कि क्यों नहीं 2016 के उस जाट आंदोलन की नकल करें जिसमें रेल की पटरियां उखाड़ दी गई थीं और जिसमें रेलवे को 100 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा था?

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लगभग सौ दिनों तक दिल्ली में प्रदर्शन करने के बाद ये किसान अब तमिलनाडु वापिस लौट गए

किसानों को लेकर उदासीनता

किसानों को लेकर बरती जा रही उदासीनता को नजरअंदाज करते हुए नई दिल्ली ने यह बात जता दी है कि सिर्फ उबाल और विघटन की राजनीति ही ध्यान आकर्षित करने में सफल हो सकती है.

तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक इतिहास के सबसे तबाह करने वाले सूखे का सामना कर रहे हैं. केन्द्र को क्या और किसानों की आत्महत्या का इंतजार है? या फिर हालात इतने बुरे हो जाएं कि उन्हें वहां पानी से भरी ट्रेनें भेजनी पड़े जैसा कि पिछले साल उन्होंने महाराष्ट्र में भेजीं थीं?

क्या ऐसा इसलिए तो नहीं है कि तमिलनाडु के पास अब अपनी आवाज सुनाने वाला कोई राजनीतिक माद्दा नहीं है जो कभी जयललिता में हुआ करता था?

पिछले सप्ताह किसानों ने जब दिल्ली में नग्न प्रदर्शन किया था तब उनके और तमिलनाडु के लिए यह शर्मनाक नहीं था बल्कि यह हृदयहीन भारत के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात थी.

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