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बेगुनाह की जेल डायरी: जज ने कहा तुम बेगुनाह हो...मैं चीख पड़ा- हुजूर फांसी दो!

दिल्ली पुलिस ने पटियाला कोर्ट में ले जाकर खड़ा कर दिया. खतरनाक आतंकवादी बनाकर. मेरे सिर फर्जी आरोप मढ़ा गया कि, 21 मई 1996 को लाजपत नगर सेंट्रल मार्केट में हुए भीषण बम धमाके की साजिश में मैं शामिल था

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Feb 25, 2018 12:31 PM IST

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बेगुनाह की जेल डायरी: जज ने कहा तुम बेगुनाह हो...मैं चीख पड़ा- हुजूर फांसी दो!

गाहे-ब-गाहे कहा-सुना तो यही जाता रहा है कि, 100 गुनाहगार छूट जाएं, मगर एक बेगुनाह को सजा न मिले. मगर मैं यहां इस कहावत से एकदम उलट, एक ऐसे शख्स की दिल-ओ-दिमाग को झकझोरने वाली सच्ची घटना का जिक्र करने जा रहा हूं. जो, बेदाग-बेगुनाह होने के बावजूद बदकिस्मती से दिल्ली पुलिस के 'बौने-हाथों' के पैने पंजों में जा फंसा. जिसे दिल्ली पुलिस ने 17 साल की उम्र में ही जेल के सीखचों में कैद करवा दिया.

14 साल से ज्यादा वक्त जेल की सलाखों के भीतर गुजारने के बाद 'बेगुनाह' साबित हुआ. जेल से निकल कर घर पहुंचा तो, सईद मकबूल शाह बूढ़ा हो चुका था. घर पहुंचा तो, इंतजार में एक अदद देहरी पर गुमसुम तन्हा बैठी मिली पहचानी-पहचानी सी बूढ़ी विधवा औरत...जो मकबूल की मां थी और घर के पीछे वाले बाग में मिली बड़ी बहन और अब्बा की कब्र. जो बेगुनाह भाई और बेटे को जेल की सलाखों में देखने का सदमा बरदाश्त नहीं कर सके थे.

दिल्ली देखने की ख्वाहिश ने कहीं का नहीं छोड़ा

सन् 1996 का अप्रैल-मई का महीना रहा होगा. तारीख अब याद नहीं है. 10वीं के बोर्ड इम्तिहान दे चुका था. एग्जाम्स के बाद खाली था. सोचा श्रीनगर (कश्मीर घाटी) से कुछ दिन दिल्ली में रह रहे बड़े भाई सईद दिलाबर के पास रह आऊं. दिलाबर भाई का दिल्ली में कारोबार था. दिल्ली घूमने-देखने की ललक लेकर वहां पहुंच गया. जंगपुरा एक्स्टेंशन में रह रहा था.

वो जून की रात थी. करीब 2 बजे मकान की कुंडी बजी. दरवाजा खोला तो 6-7 गुंडे धड़धड़ाते हुए कमरे में घुस आए. सबने मुझे दबोच लिया. कई भद्दी गालियों के साथ धमकी दी गई कि, मुंह खोला तो गोलियों से भून डालेंगे. कुछ गुंडे बाहर रह गए. ज्यादातर के पास इंग्लिश हथियार थे. कुछ ही देर में कमरे का एक एक कागज बटोरकर वे मुझे गाड़ियों में डालकर कहीं ले गए. थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि वे सब गुंडे नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस वाले थे. और मैं जंगपुरा थाने के अंदर.

कई दिनों तक गैर-कानूनी हिरासत में लिए जंगपुरा से निजामुद्दीन और वहां से लोधी कालोनी (दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल) लेकर दिल्ली पुलिस इधर-उधर धक्के खिलाती रही. 17 जून, 1996 को कानूनन गिरफ्तार दिखाकर दिल्ली की पटियाला कोर्ट में जज के सामने ले जाकर पुलिस ने खड़ा कर दिया. खतरनाक आतंकवादी बनाकर. मेरे सिर फर्जी आरोप मढ़ा गया कि, 21 मई, 1996 को लाजपत नगर सेंट्रल मार्केट में हुए भीषण बम धमाके की साजिश में मैं शामिल था.

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जब मौत को आंखों से सामने नाचते देखा

गैर-कानूनी हिरासत के दौरान एक रात ऐसी भी आई जब, पूरी गुंडई पर उतरे दिल्ली पुलिस वालों ने सिर के पीछे पिस्टल सटा दी. धमकी दी कि, मुंह खोला तो खोपड़ी उड़ा दी जाएगी. सामने हरे रंग के दो बड़े कागज रख दिए. इस हिदायत के साथ कि जो, हम (दिल्ली पुलिस) बोलें वह लिखते जाओ.

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अपनी पर उतरी दिल्ली पुलिस ने 17 जून, 1996 को पहली बार पुलिस लॉकअप दिखा दिया. 17 साल के एक उस युवक को जिसे थाने-पुलिस के नाम से पसीना आता था. अभी दसवीं जमात का इम्तिहान भर ही दे पाया था. दिल्ली पुलिस की थर्ड बटालियन के जवानों ने धक्के देते हुए जेल-वैन से उतारकर पटियाला हाउस के बदबूदार लॉकअप में बंद कर दिया. उस वक्त माथे से पसीना चू रहा था. बदन पसीने से तर-ब-तर था. डर के मारे हाल-बेहाल इस कदर की पांव कांप रहे थे.

खुदगर्ज पुलिस दिलासा दे रही थी छोटे केस में जेल जा रहे हो

ब-जरिए आउट-ऑफ-टर्न हासिल करने की तमन्ना पाले पुलिस वालों ने मेरे सिर एक खतरनाक बम ब्लास्ट लिखा दिया. उनमें से कुछ पुलिस वाले मुझे समझा रहे थे कि, घबराओ मत. छोटे-मोटे इल्जाम में जेल जा रहे हो. मुंह बंद रखो. आज नहीं तो कल जल्दी ही छूट जाओगे. यह सुनते ही मुझे विश्वास हो गया कि, मैं वाकई बे-गुनाह हूं. यह बात कहीं न कहीं इन जालिम पुलिस वालों को भी खटक रही है. मैं दिल्ली पुलिस की वैन से उतरते ही बच्चे की तरह बिलख कर रोने लगा.

शाम तकरीबन साढ़े 6 बजे जेल पहुंचा. सभी कैदियों की भीड़ के साथ जेल वैन से उतरा. लाइन में जेल की देहरी की ओर बढ़ने लगा. दिमाग की सोचने-समझने की ताकत खत्म हो चुकी थी. बदन बेजान था. पांव जेल की देहरी की ओर बढ़ तो रहे थे, मगर बढ़ते हुए महसूस नहीं हो रहे थे. चूंकि नाबालिग था. लिहाजा उस रात जेल नंबर-5 के मुंडाखाना में ला जाया गया. फिर वहां से दूसरे जेल वार्ड में ‘चक्कर’ पर.

पहली रात जेल में खाने को 5 रोटियां और पानी भरी दाल परोसी गई. आत्मा मर चुकी थी. बदन बे-जान था. हाथों में रोटियां भी लोहे के बर्तन सी भारी महसूस हो रहीं थीं. मुंह तक निवाला गया मगर हाथ से रोटी छूट कर थाली में खुद-ब-खुद गिर गई. जैसे ही खयाल आया कि अरे यह रोटी तो तिहाड़ जेल की है न कि घर की. उसके बाद 3 दिन तलक भूखा रहा.

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आज भी याद है जेल की वो थप्पड़ वाली रात

जेल में पहली रात पहुंचा. पुराने कैदी समझे नया है. कुछ दादा टाइप कैदी बोले बैरक का बाथरुम साफ करो. इतना सुनना था कि, बे-जान और भूखे-प्यासे बदन में न मालूम कहां से जान आ गई. उन कैदियों में से एक के गाल पर इतना तगड़ा थप्पड़ जड़ा कि, उसकी गूंज बाकी 50-60 कैदियों के कानों में भी गूंज गई. उसके बाद उन कैदियों के लिए मैं ‘खतरनाक’ बन गया. फिर कभी किसी ने किसी ऐसे-वैसे काम का फरमान नहीं सुनाया.

वो पहली पूरी रात रोकर और जाग कर काटी. सुबह साढ़े 5 बजे जेल स्टाफ ने बैरक का ताला खोला. पूछा रात को सोए नहीं. मैने उनसे पूछा- ‘जनाब कैसे अजीब सवालात कर रहे हो...पढ़ने-लिखने की उम्र में जेल आए किसी बे-गुनाह इंसान की आंखों में भी भला नींद आ सकती है.’

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करीब 2 महीने बाद घर वालों को पता चला कि मुझे दिल्ली पुलिस ने फर्जी आतंकवादी बनाकर तिहाड़ जेल में ठूंस दिया है. उन सबके होश-फाख्ता हो गए. जेल में घर वाले मिलने आए तो, मालूम हुआ कि दिल्ली पुलिस वालों ने अपने फर्जी ‘गुडवर्क’ के लिए बड़े भाई दिलाबर और निसार को भी गैर-कानूनी हिरासत में कई दिन तक रखा था. जब मैं तिहाड़ जेल पहुंच गया तब उन्हें छोड़ दिया गया.

खबर मिलने पर बड़ी बहन और अब्बा (पिता) जैसे-तैसे डरे-सहमे कश्मीर से दिल्ली पहुंचे. तिहाड़ जेल में मुझसे मिलने आए. अलग अलग वक्त में. मिलाई-घर के सींखचों से बहार खड़े अब्बा और बहन मुझे देखकर पूरे मिलाई के वक्त में बस बिलखते ही रहे. और बिना कोई बात किए वे लोग वापिस चए गए.

बद्दुआएं नहीं बख्शेंगीं फरेबी पुलिस वालों को

बकौल सईद मकबूल शाह- ‘बेकसूर बेटे और भाई को बेकसूर होते हुए भी जेल में डालकर आतंकवादी बना दिए जाने का सदमा अब्बा और बड़ी बहन बर्दाश्त नहीं कर सके. बड़ी बहन 2 छोटे बच्चों को छोड़कर उन्हीं दिनों ब्रेन-हेमरेज से मर गईं. और कमोबेश ब्रेन हेमरेज से ही अब्बा ने भी दम तोड़ दिया. उनकी अकाल मौतें और आहें-बद्दुआएं जरुर मक्कार और उन जालिम पुलिस वालों को डसेंगी जिन्होंने मुझे झूठे तरीके से आतंकवादी बनाने की नाकाम कोशिशें कीं थी.’

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जब मैं जज के सामने चिल्ला पड़ा मुझे रिहाई नहीं फांसी चाहिए

अब तक मुझे जेल में गुनाहगार साबित होकर सजा के इंतजार में 14 साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका था. 8 अप्रैल, 2010 जुमेरात को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. गर्ग की अदालत में मेरे गुनाहगार या बे-गुनाही पर मुहर लगनी थी. उस दिन अदालत में पसीने से तर-ब-तर पुलिस वाले थे मैं नहीं. क्योंकि पुलिस जानती थी कि उसने मुझे फर्जी फंसाया है. मैं जानता था कि, मैं बेगुनाह हूं.

जज ने फैसला सुनाते हुए कहा, तुम्हें बा-इज्जत बरी किया जाता है. तुम बेगुनाह हो. दिल्ली पुलिस तुम्हें गुनाहगार साबित कर पाने में नाकाम रही है. इतना सुनते ही मैं चीख पड़ा. और हाथ जोड़कर मैंने अदालत से कहा...जज साहब मैं रिहाई नहीं चाहता. मुझे फांसी पर लटकवा दो. बेगुनाही साबित होने में ही 14 साल जब जेल में काट लिए, तो अब जिंदा रहकर या जेल से बाहर निकल कर भी भला जिंदगी कैसे बसर करुंगा?

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14 साल जेल की सलाखों में रहने के बाद बेकसूर साबित हो जाना अब मेरी जिंदगी के लिए कोई मायने नहीं रखता. जिस कानून ने मुझे बेगुनाह साबित करने में 14 साल का लंबा वक्त खा लिया हो, भला वो कैसा कानून. इतने वक्त में तो उम्र कैद ही पूरी हो जाती है. क्या मतलब है उस कानून का, जिसने ब्रेन हेमरेज से मरने वाली मेरी बहन और बाप के मरने तक पर जमानत देना भी मुनासिब नहीं समझा.

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याद आते हैं जेल के कैदी पंडित रोमेश शर्मा और शेर सिंह राणा

तिहाड़ और दिल्ली की रोहिणी जेल में साथ कैद रहे प्रेमिका कुंजुम बुद्धिराजा की हत्या में बंद पंडित रोमेश शर्मा, चंबल की पूर्व दस्यु सुंदरी फूलन देवी की हत्या के आरोपी शेर सिंह राणा, आतंकवादी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर, साइको किलर चंद्रकांत झा, टी-सीरीज कंपनी मालिक गुलशन कुमार का भाई किशन कुमार, संसद पर हमले का मास्टर माइंड और फांसी पर लटकाया जा चुका अफजल गुरु आज भी मकबूल को याद आते हैं. बकौल मकबूल, आतंकवादी वीरेंद्र पाल सिंह भुल्लर ने ही मुझे 20 अंतर्देशीय (नीली चिट्ठी) मंगाकर जेल में दिए थे.

जिंदगी का सुनहरा समय बेगुनाह होने के बाद भी जेल की सलाखों में काटने वाले सईद मकबूल शाह, जेल के जिक्र से उतना परेशां नहीं है, जितना दिल्ली पुलिस के क्रूर चेहरे से. उनके मुताबिक जेल और वहां की जिंदगी से ज्यादा खौफनाक है दिल्ली पुलिस. जो अपने कंधे के तमगे बढ़ाने के लिए किसी भी मासूम और बेगुनाह की जिंदगी को तबाह करने में गुरेज नहीं करती.

जेल से बाहर की ज़िंदगी नरक से भी बदतर

दिल्ली की रोहिणी जेल से बाहर निकला तो सोच रहा था कि, अब किधर जाऊं? घर पहुंचा तो आस पास के लोगों ने किनारा कर लिया. 2010 में सीपीआई (एम) की सांसद बृंदा करात ने राज्य सभा में मामला उठाया. रिजल्ट आज तक ‘जीरो’ रहा.

ऐसी कोई देहरी नहीं जिस पर, नाक न रगड़ी हो. जेल के ठप्पे ने मगर हजार रुपए की नौकरी नसीब नहीं होने दी. जेल की जिंदगी पर किताब लिखी रखी है. पब्लिशर और पैसा यहां भी आड़े आ गया.

जेल से छूटकर घर पहुंचा. तो भीड़ में खड़ी मां जूना को ही नहीं पहचान सका. पहले अब्बा की मौत और उसके 15 महीने बाद ही 24 साल की बड़ी बहन की ब्रेन हेमरेज से हुई मौतों ने अम्मी को वक्त से पहले बूढ़ा कर दिया. सब दांत निकल चुके थे उनके.

28 मई, 2015 को शादी हो चुकी है. एक बेटा है. बीबी पोस्ट ग्रेजुएट हैं. बावजूद इस सबके जिंदगी नरक है. अदालत ने बा-इज्जत बेकसूर साबित कर दिया है. इसके बाद भी फरेबी दिल्ली पुलिस के ‘झूठ’ के दाग हैं कि, पीछा छोड़ने को राजी नहीं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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