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सेक्स वर्कर्स को भी 'न' कहने का अधिकार, कोई उनसे जबरदस्ती नहीं कर सकता: SC

कोर्ट ने कहा कि वो इस प्रोफेशन में हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी उनसे जबरदस्ती कर सकता है

Updated On: Nov 02, 2018 01:58 PM IST

FP Staff

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सेक्स वर्कर्स को भी 'न' कहने का अधिकार, कोई उनसे जबरदस्ती नहीं कर सकता: SC
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सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा है कि सेक्स वर्करों को भी अपनी सर्विस देने से न कहने का अधिकार है. कोर्ट ने ये भी कहा कि वो इस प्रोफेशन में हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी उनसे जबरदस्ती कर सकता है.

कोर्ट ने ये टिप्पणी मंगलवार को तब दिया था, जब वो 1997 में दिल्ली में हुए एक गैंगरेप केस की सुनवाई कर रहा था. न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने इस मामले के दोषियों को बची हुई सजा भुगतने के लिए सरेंडर करने के लिए चार हफ्तों का वक्त दिया है.

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके उलट फैसला दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस मामले के चारों दोषियों को निचली अदालत की ओर से दी गई 10 साल की सजा को बरकरार रखने का आदेश दिया है.

कोर्ट ने कहा कि 'अगर मान भी लिया जाए कि महिला इस प्रोफेशन में और आसानी से उपलब्ध है, फिर भी उसके पास किसी को भी यौन संबंध से इनकार करने का अधिकार है.'

जस्टिस आर भानुमती और इंदिरा बैनर्जी की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के इस फैसले में कई पेचीदगियां हैं, जिसमें उसने दोषियों को इस आधार पर रिहा कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने उस महिला के खिलाफ बुरा चरित्र होने और वेश्यावृत्ति में लिप्त होने की शिकायत दर्ज कराई थी. कोर्ट के इस आदेश में कहा गया था कि इन चारों दोषियों को गलत फंसाया गया था.

हाईकोर्ट ने उस वक्त उन तीन पुलिसवालों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवाने का आदेश दिया था, कि उन्होंने चार लोगों पर गलत तरीके से कार्रवाई की.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने ये सही कहा था कि अगर महिला के चरित्र पर सवाल उठते हैं, तो भी इसका मतलब ये नहीं कि कोई उसकी सहमति के बिना उससे संबंध बना सकता है या उसका रेप कर सकता है.

बेंच ने ये भी कहा कि ये कानून का बहुत स्पष्ट सिद्धांत है कि अपना केस सामने रख रही पीड़िता की अकेली गवाही भी, अगर सही पाई जाती है, तो आरोपियों को दोषी करार दिया जा सकता है.

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