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SC/ST आंदोलन: प्रदर्शन कर रहे ज्यादातर युवाओं को पता ही नहीं कि वो क्यों लड़ रहे हैं

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटीशन दाखिल करने का ऐलान कर ही दिया था. फिर ऐसे क्या हालात बन गए थे कि आंदोलन हिंसक हो गया?

Mahendra Saini Updated On: Apr 03, 2018 01:55 PM IST

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SC/ST आंदोलन: प्रदर्शन कर रहे ज्यादातर युवाओं को पता ही नहीं कि वो क्यों लड़ रहे हैं

SC/ST एक्ट में संशोधन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बुलाए गए भारत बंद के दौरान व्यापक स्तर पर तनाव देखा गया है. सबसे ज्यादा हिंसा मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में देखी गई है. राजस्थान भी इससे अछूता नहीं रहा है. राजस्थान में अनुसूचित जाति और जनजाति की करीब 31% जनसंख्या है यानी 2 करोड़ से ज्यादा. जाहिर है इतनी बड़ी आबादी का कुछ हिस्सा भी सड़कों पर उग्र हो जाए तो कानून व्यवस्था को संभाल पाना कितना मुश्किल हो सकता है.

प्रदर्शनकारियों ने सड़क से लेकर रेल पटरियों तक हर जगह को जाम कर दिया. जयपुर में लोग ट्रेनों के सामने खड़े हो गए. खैरथल में पटरियां उखाड़ दी गई. अलवर में थाने को आग लगा दी गई तो जोधपुर-बाड़मेर में दुकानों में तोड़फोड़ की गई. सीकर जिले के कई कस्बों में गाड़ियों को आग लगा दी गई. पुलिस को कई शहरों में लाठीचार्ज करना पड़ा

अजमेर में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के जवानों को पीट दिया. नीम का थाना में 5 गाड़ियों को जला दिया गया. बंद समर्थकों के पथराव में ASP घायल हो गए. सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलती देख सीकर में इंटरनेट को शटडाउन करना पड़ा. गंगापुर सिटी में तो तनाव इस कदर बढ़ा कि कर्फ्यू की नौबत आ गई. भरतपुर में चलती रेलों पर पत्थर फेंके गए. एसी डिब्बों के कई शीशे टूट गए. कोर्ट के फैसले के खिलाफ हिंसक आंदोलन हैरान तो करता ही है, उससे भी बड़ी हैरानी इसपर है कि अधिकतर आंदोलनकारी वास्तविकता को समझे बिना ही हिंसक हो उठे.

आंदोलन कर रहे अधिकतर युवा मुद्दे से अनजान

अपने अधिकारों के लिए लड़ना सबसे अच्छी बात है. आखिर देश की आजादी के नायकों ने यही किया और सिखाया. लेकिन प्रदर्शन कर रहे अधिकतर लोगों को इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि वे ऐसा आखिर कर क्यों रहे हैं. जयपुर के पास कोटपुतली में मैंने खुद रैली में शामिल कई युवाओं से बात की. इनमें से अधिकतर लोग बीजेपी, नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे.

मैंने उनसे जानना चाहा कि वे इस रैली में क्यों आए हैं. आपको हैरानी होगी कि अधिकतर लोगों ने जवाब दिया- मोदी सरकार ने SC/ST वर्ग का आरक्षण खत्म कर दिया, इसलिए वे अपने आरक्षण को बचाने आए हैं. मैं अचंभित रह गया कि ये कैसे सैनिक हैं जो लड़ाई में कूद चुके हैं, जबरन बाजार बंद करा रहे हैं, कानून व्यवस्था के सामने मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. और इन्हें मालूम ही नहीं कि ये सब आखिर वे कर क्यों रहे हैं.

अपना माथा पीट लेने की हद तो अभी बाकी थी. जब मैंने युवाओं के एक समूह को वास्तविक मुद्दा समझाने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट में कुछ संशोधन के निर्देश दिए हैं. तब पढ़े-लिखे से लग रहे युवाओं के इस समूह ने कहा- हां तो सुप्रीम कोर्ट भी तो सरकार का ही अंग है और ये वही करता है जो प्रधानमंत्री कहते हैं. अब मोदी को हटाकर हम 'बहुजन' प्रधानमंत्री बनाएंगे जो सुप्रीम कोर्ट को समाज हित में 'कंट्रोल' करेगा. आप समझ सकते हैं, इसके आगे मैंने उन्हें मुद्दा समझाने का 'रिस्क' नहीं लिया.

आंदोलन में हिंसा की जरूरत कहां थी?

मैं फिर कहता हूं कि अपने अधिकार की मांग रखना कोई अपराध नहीं है. लेकिन मेरा मानना है कि इसके लिए दूसरों को नुकसान करना बिल्कुल ठीक नहीं है. ये कोई राजनीतिक निर्णय नहीं था. ये सुप्रीम कोर्ट का फैसला था. मुख्यत: फैसला भी लोकसेवकों के संदर्भ में था. लेकिन इसको समझे बिना ही विरोध के सुर बुलंद कर दिए गए. न्यायालय के फैसले से असहमति जताने और सुधार की मांग का रास्ता सड़कों से होकर नहीं गुजरता है.

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होना तो ये चाहिए था कि अपनी मांगों के समर्थन में व्यापक सहमति बनाई जाती. दूसरे समुदायों के बीच जाकर उन्हें अपने साथ जोड़ा जाता. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. यही वजह रही कि राजस्थान के कई शहरों में इसने वर्ग संघर्ष का रूप ले लिया. सीकर के अजीतगढ़ में आंदोलनकारियों और व्यापारियों के बीच पत्थरबाजी हुई. व्यापारियों ने आक्रोश रैली निकाली और प्रशासन को कोर्ट के फैसले के समर्थन में ज्ञापन भी दिया.

Bharat Bandh

वैसे भी केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटीशन दाखिल करने का ऐलान कर ही दिया था. फिर ऐसे क्या हालात बन गए थे कि आंदोलन हिंसक हो गया? अगर ये राजनीतिक फैसला होता तो उस सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध समझ में आने वाली बात थी. अन्य दूसरे समाजों या जातीय समूहों से लड़ना भी समझ से परे है.

क्या ये देश में अस्थिरता फैलाने की साजिश है?

2014 के बाद से देश में ध्रुवीकरण के कई ध्रुव देखने को मिल रहे हैं. हिंदू-मुस्लिमों के बीच धार्मिक ध्रुवीकरण, बीजेपी बनाम पूरे विपक्ष के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण, सवर्णों और दलितों के बीच सामाजिक ध्रुवीकरण. इस ध्रुवीकरण में किसी एक को दोषी या किसी एक को पाक-साफ नहीं कहा जा सकता. सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष में ध्रुवीकरण की कोशिशों में लगे हैं.

ऐसा लगता है जैसे बुद्ध के देश में उनके ही उपदेशों को भुला दिया गया है. महात्मा बुद्ध मध्यममार्ग को श्रेष्ठ मानते थे. इसे वीणा के तारों के उदाहरण से समझाया गया है यानी वीणा को न तार बिल्कुल कसने से ठीक से बजाया जा सकता है और न ही बिल्कुल ढीले छोड़ देने से. लेकिन मौजूदा दौर में हो ये रहा है कि हम दोनों पक्षों के अंतिम छोर पर खड़े होकर सोचने लगे हैं. या तो इधर या उधर, बीच का स्थान तो जैसे गायब ही हो गया है. इसका सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि मुख्यधारा में वापस लौटने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है.

वंचित वर्गों के अधिकार के नाम पर किए गए इस आंदोलन के साथ भी ऐसा ही हुआ. आंदोलन के हिंसक रूप ले लेने के पीछे बीजेपी ने विपक्ष खासकर कांग्रेस, बीएसपी और लेफ्ट पार्टियों की साजिश करार दिया है. राजस्थान के कैबिनेट मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने कहा कि कानून की व्याख्या करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को है. लेकिन इसकी आड़ में सामाजिक संघर्ष के हालात पैदा कर विपक्ष ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं.

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70 साल बाद भी दमित क्यों हैं दलित?

आज़ादी के बाद से ही हमने देखा है कि गरीबी हटाने का नारा देकर सत्ता सुख भोगा जाता है लेकिन गरीबी दूर नहीं हो पाती. वंचितों की अपवंचना दूर करने के नाम पर सत्ता हासिल की जाती है लेकिन वंचना बनी रहती है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सामाजिक कल्याण के नारे सिर्फ जुमलाबाजी है? आखिर क्यों संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बावजूद राज्य पूरी तरह से लोक कल्याणकारी नहीं बन पाया है? सवाल ये भी है कि गुजरात से लेकर कर्नाटक तक आखिर क्यों दलित आंदोलनों में एकाएक उफान आ गया है?

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दरअसल, मोदी-शाह युग से पहले तक बीजेपी सवर्ण पार्टी की ही पहचान रखती थी. लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव से लेकर पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक देखा गया कि बीजेपी का आधार दलित वर्गों में भी तेजी से बढ़ा है. यूपी में अनुसूचित जातियों में गैर जाटव वोट हासिल कर बीजेपी ने मायावती को तगड़ा झटका दिया. बीएसपी से पहले ये वर्ग कांग्रेस का वोटबैंक हुआ करते थे. ऐसा लगता है अब जमीन खिसकती देख समाजों की राजनीति करने वालों से लेकर समाजवादियों तक सब एकजुट होने लगे हैं.

लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आज़ादी के 70 साल बाद भी तमाम संवैधानिक प्रावधान और दलित कल्याण की दर्जनों योजनाओं के बावजूद निचले पायदानों तक इसका फायदा क्यों नहीं पहुंच पाया. इतने वर्षों में अधिकतर कांग्रेस का, करीब 10 साल बीजेपी/एनडीए का और कुछ वक्त 'समाजवादियों' का भी शासन रहा. पर आज भी बड़ा तबका गरीब और वंचित ही बना हुआ है तो इसमें दोषी कौन है?

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