S M L

राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 10 जरूरी बातें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और ये संविधान के आर्टिकल 21 के तहत आता है

FP Staff Updated On: Aug 24, 2017 03:35 PM IST

0
राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 10 जरूरी बातें

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राइट टू प्राइवेसी पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे भारत के नागरिकों का मूलभूत अधिकार बताया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह संविधान की धारा 21 (राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी) का अभिन्न अंग है. यह फैसला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने सुनाया. इस फैसले का हमारी जिंदगी पर बड़ा असर पड़ने वाला है. इस खबर में हम बता रहे हैं निजता के अधिकार से जुड़ी सात महत्वपूर्ण बातें जिन्हें जानना हर भारतीय के लिए जरूरी हैः

किस बारे में है फैसला?

क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है जिसे संवैधानिक संरक्षण की जरूरत है? अभी तक निजता को एक अधिकार के रूप में पहचान दी गई थे लेकिन इसे मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो जाएगी.

कोर्ट इस पर अभी क्यों फैसला कर रहा है?

आधार पर चर्चा के दौरान कई याचिकाकर्ताओं ने इसके खिलाफ दलील देते हुए कहा कि आधार के लिए व्यक्ति के बायोमैट्रिक डाटा की जरूरत होती है और इन्हें साझा करना निजता के अधिकार का हनन है. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निजता एक मौलिक अधिकार है वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि निजता का अधिकार महज एक एलिटिस्ट कॉन्सेप्ट (अभिजात्य वर्ग की अवधारणा) है.

क्या है केंद्र सरकार का पक्ष?

सरकार का कहना है कि निजता को मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया जा सकता है. एक अन्य तर्क में केंद्र सरकार ने कहा कि जिस देश में लाखों लोग घर और खाने के लिए भटक रहे हैं वहां निजता को मौलिक अधिकार नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ऐसा करने से सोशल वेलफेयर की कई योजनाएं प्रभावित होंगी. खासकर वे योजनाएं जिनका क्रियान्वयन आधार के माध्यम से होता है.

क्या है बड़ी पीठ और छोटी पीठ का चक्कर ?

इस केस की शुरुआत में तीन जजों की खंडपीठ ने 7 जुलाई को कहा था कि आधार स्कीम से जुड़े सारे मुद्दों पर बड़ी पीठ को ही फैसला करना चाहिए. इसके बाद, चीफ जस्टिस ने इस मामले में सुनवाई के लिए 5 सदस्यों की संविधान पीठ गठित की थी. फिर 5 सदस्यों वाली संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिये 9 जजों वाली संविधान पीठ विचार करेगी.

संविधान पीठ में 9 जज क्यों?

1954 में छह जजों की बेंच और फिर 1962 में 8 जजों की बेंच ने फैसला सुनाया था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं, नागरिकों का आम कानूनी अधिकार है. लेकिन जब आधार मामले में याचिकाकर्ताओं ने निजता को मौलिक अधिकार बताया तो सरकार ने कहा कि आठ जजों की बेंच जो फैसला सुना चुकी है उस पर 9 जजों की बेंच ही पुनर्विचार कर सकती है.

इस फैसले से कैसे बदलेगी देश के लोगों की जिंदगी?

सरकार ने कई सोशल वेलफेयर योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य कर दिया गया है. इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए भी. आधार डाटा को शेयर करना या इसका लीक होना बेहद खतरनाक हो सकता है क्योंकि ऐसा होने पर नागरिकों के बायोमैट्रिक डाटा (आंखों की पुतली और फिंगरप्रिंट्स) का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता

है. इसके अलावा दो लोगों के बीच फोन पर मैसेज और तस्वीरों का आदान प्रदान भी प्राइवेसी के तहत आता है और कोई सर्विस प्रोवाइडर इसका एक्सेस लेकर उसका गलत इस्तेमाल कर सकता है.

आधार पर क्या होगा असर?

इस फैसले के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच आधार की वैधता पर सुनवाई करेगी. यह बेंच जांच करेगी कि आधार डाटा के कलेक्शन और स्टोरेज के दौरान क्या निजता के अधिकार का हनन करता है? यदि ऐसा होता है तो आधार को अवैध घोषित किया जा सकता है.

और किन चीजों पर पड़ेगा असर?

आधार के अलावा समलैंगिक संबंधों को गैरकानूनी बनाने वाली धारा 377 पर भी इस फैसले का असर पड़ सकता है. दो वयस्क व्यक्ति यदि आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं तो यह उनकी प्राइवेसी का मुद्दा है. अब चूंकि निजता एक फंडामेंटल राइट है तो धारा 377 को एक बार फिर चुनौती दी जा सकती है. वहीं टेलीमार्केटिंग कंपनियों और बैंकों द्वारा नागरिकों के व्यक्तिगत डाटा शेयर करने पर भी रोक लग सकती है.

कितने लोगों पर पड़ेगा सीधा असर?

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले के बाद इसका सीधा असर देश की 134 करोड़ जनता पर पड़ेगा. क्योंकि देश की सवा सौ करोड़ जनता ने 'आधार' कार्ड बनवाया, जिसमें 134 करोड़ लोगों की निजी जानकारियां शामिल की गई.

देश की सवा सौ करोड़ जनता की ये निजी जानकारी केंद्र सरकार के साथ-साथ 'आधार' कार्ड बनाने वाली एजेंसियां, केंद्र सरकार और टेलीकॉम सेक्टर समेत कई निजी कंपनियों के पास चली गई है, जिसके कारण देश की 134 करोड़ जनता की निजता का हनन हुआ है.

कौन-कौन है इस केस के मुख्य याचिकाकर्ता?

इस मामले के मुख्य याचिकाकर्ताओं में कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के. एस. पुट्टास्वामी, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहली अध्यक्ष औप मैग्सेसे अवार्ड विजेता शांता सिन्हा और नारीवादी शोधकर्ता कल्याणी सेन मेनन शामिल हैं.

(साभार: न्यूज़18)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
FIRST TAKE: जनभावना पर फांसी की सजा जायज?

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi