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चारा घोटाले पर SC का फैसला: क्या अब लालू के 'करिश्मे' से पर्दा उठेगा?

इतने आरोपों और एक विफल मुख्यमंत्री होने के बाद भी लालू 'करिश्माई' क्यों बने रहे?

Pawas Kumar Updated On: May 08, 2017 06:31 PM IST

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चारा घोटाले पर SC का फैसला: क्या अब लालू के 'करिश्मे' से पर्दा उठेगा?

लालू प्रसाद यादव की बात होते ही जो शब्द सबसे अधिक सुनने को मिलता है, वो है 'करिश्मा'. लालू के बारे में बात होती है तो सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा जैसे शब्द उछाले जाते हैं. अजीब बात है कि जब लालू के खिलाफ घोटालों के आरोप लगे, जब उन्हें सजा हुई और अब जबकि उनके खिलाफ आपराधिक साजिश का मामला चलाने का आदेश दिया गया है- ये शब्द फिर हवा में या यूं कहें लेखों की आखिर लाइनों में नजर आ रहे हैं.

आखिर लालू क्या हैं- सामाजिक न्याय के चैंपियन या फिर एक भ्रष्ट नेता जिसे सजा भी हो चुकी है?

1996 में जब चारा घोटाला सामने आया था तो बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए गजब चर्चा का विषय था. पहली बार जानवरों के चारे तक में घोटाले की बात सामने आई. बड़ा मजाक भी बनाया गया.

1997 में लालू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. वह पत्नी राबड़ी को गद्दी सौंप जेल चले गए. इस बीच आय से अधिक संपत्ति का भी मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था. लालू को कुछ दिनों बाद बेल मिली.

2000 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू और राबड़ी को कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा. राबड़ी को बेल मिल गई लेकिन लालू फिर जेल भेजे गए. कुछ दिनों बाद उन्हें सशर्त जमानत मिल गई.

झारखंड बनने के बाद मामला रांची ट्रांसफर किया गया. 2006 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह और राबड़ी बरी हो गए. 2013 में लालू में रांची की सीबीआई कोर्ट ने लालू सहित 44 लोगों को सजा सुनाई. इसके साथ ही लालू को लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी.

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झारखंड हाई कोर्ट ने लालू के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र के आरोप खत्म कर दिए थे लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इन आरोपों को फिर से बहाल कर दिया है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 9 महीने पूरी करने को भी कहा है. कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट के पिछले फैसले पर भी सवाल उठाए हैं.

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लालू और उनका परिवार इन दिनों मिट्टी घोटाला और जमीन आवंटन घोटाले को लेकर भी निशाने पर है. बिहार में बीजेपी नीतीश कुमार सरकार से लालू पर कार्रवाई की मांग कर रही हैं. केंद्र से हस्तक्षेप की भी मांग की जा रही है.

क्या ये लालू की राजनीति के अंत की शुरुआत है?

लालू प्रसाद यादव को पहचान जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान मिली. कहा जाता है कि जेपी को लोकनायक का नाम देने वाले लालू ही थे. जेपी आंदोलन के बाद लालू ने अपनी छवि एक ऐसे नेता की बनाई जो जमीन से उठकर आया था. यह गंवई, देहाती शैली हिट भी रही. लेकिन यहीं गंवई, देहाती नेता आज करोड़ों की संपत्ति का मालिक है- यह बात लालू खुद स्वीकार कर चुके हैं.

लालू प्रसाद (और राबड़ी देवी) के मुख्यमंत्री पद कार्यकाल बिहार के लिए सबसे बुरे और बदनामी भरे दौर में जाना जाता है. पटना की सड़कों पर शाम छह बजे से छा जाने वाला सन्नाटा उस दौर के दहशत की कहानी कहता था. बिहार में रेप, गुंडागर्दी, रंगदारी और फिरौती का माहौल लालू-राबड़ी काल में रहा, उसे भुलाना इतना आसान नहीं है. लालू ने सामाजिक बराबरी के नाम पर जो भी खेल किए, असल में उन्होंने ताकतवरों और असामाजिक ताकतों को मजबूती ही दी. इसे याद करने के लिए बहुत पीछे जाने की भी जरूरत नहीं है. दो दिन पहले ही टेप सामने आया है जिसमें लालू जेल में बंद शहाबु्द्दीन से बतियाते सुनाई दे रहे हैं.

नीतीश कुमार आज उनके सहयोगी भले हों लेकिन लालू के शासनकाल को जंगलराज कहने वालों में वही सबसे आगे थे.

सवाल ये है कि इतने आरोपों और एक विफल मुख्यमंत्री होने के बाद भी लालू 'करिश्माई' क्यों बने रहे.

इस 'करिश्मे' में लालू के पॉलिटकल फॉर्मूलों के बराबर योगदान मीडिया का भी है. लालू की मजाकिया शैली और उनका चुटीला देसी अंदाज हमेशा से मीडिया को भाता रहा है. इसलिए तो संसद में उनके बयानों को बार-बार दिखाया जाता रहा. अब भी उनके हर एक ट्वीट पर चुटकी ली जाती है और हर मुद्दे पर उनकी बाइट.

उनके इस अंदाज की वाहवाही में लोग उन तमाम घोटालों को भूलते रहे जिसके वे आरोपी हैं. लालू-राबड़ी के 'जंगलराज' की यादों को धुंधला कर दिया गया है. लालू के करिश्मे की चकाचौंध के पीछे वह स्याह तस्वीर छिपती गई जो एक विफल प्रशासक और एक भ्रष्ट नेता की थी.

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