S M L

सेक्सुअलिटी का प्रदर्शन कर रहे समलैंगिकों को सजा होनी चाहिए: स्वामी

सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि धारा 377 हटाई नहीं जा सकती. उन्होंने कहा कि अपनी सेक्सुअलिटी का प्रदर्शन करने वाले समलैंगिकों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए

FP Staff Updated On: Jan 09, 2018 10:26 AM IST

0
सेक्सुअलिटी का प्रदर्शन कर रहे समलैंगिकों को सजा होनी चाहिए: स्वामी

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 यानी समलैंगिकता को गैर-कानूनी बनाने वाले फैसले पर दोबारा विचार करने की बात की है. इसके बाद इस मुद्दे पर कई लोगों ने प्रतिक्रियाएं दी हैं. कुछ इसके पक्ष में हैं, तो कुछ इसके विरोध में.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि धारा 377 हटाई नहीं जा सकती. उन्होंने कहा कि अपनी सेक्सुअलिटी का प्रदर्शन करने वाले समलैंगिकों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए. दरअसल, स्वामी को इस कानून से नहीं सेक्सुअलिटी के प्रदर्शन से दिक्कत है.

स्वामी ने कहा कि एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) कम्युनिटी प्राइवेसी में चाहे जो करे लेकिन उन्हें सार्वजनिक मंच पर अपने सेक्सुअलिटी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा, 'जब तक वो सार्वजनिक तौर पर इसका जश्न नहीं मनाते, इसका प्रदर्शन नहीं करते तब तक कोई समस्या नहीं है.'

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा कि सेक्शन 377 की वजह से उठे मुद्दे पर एक बड़ी बेंच के सामने बहस होनी चाहिए. आईपीसी की धारा 377 अप्राकृतिक शारीरिक संबंध से जुड़ी है. इसके मुताबिक जो भी प्रकृति के नियमों के खिलाफ किसी पुरुष, महिला या जानवर से शारीरिक संबंध बनाएगा, उसे आजीवन कारावास या दस साल से अधिक की सजा दी जा सकती है. उस पर आर्थिक दंड भी लगाया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने आपसी रजामंदी से दो बालिग लोगों के बीच समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग करने वाली याचिका को संविधान पीठ के पास भेज दिया है.

यह बेंच नवतेज सिंह जौहर द्वारा फाइल की गई याचिका पर सुनवाई कर रही है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह आपसी सहमति से संबंध बनाने वाले वयस्कों को भी सजा का पात्र बनाता है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में धारा 377 को रद्द कर दिया था. जिसके बाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जीएस सिंघवी और जज एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने 11 दिसंबर, 2013 को दिए अपने फैसले में अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 की वैधता बरकरार रखी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईपीसी की धारा 377 को बदलने के लिए कोई संवैधानिक गुंजाइश नहीं है. धारा 377 के तहत दो बालिगों के बीच समलैंगिक रिश्ते को अपराध माना गया है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi