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समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट: फैसले पर 5 अहम सवाल

भारत समेत 72 देशों में समलैंगिकता को अपराध माना जाता है, सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश से कई संवैधानिक सवाल खड़े हो गए हैं?

Virag Gupta Virag Gupta Updated On: Jan 09, 2018 01:56 PM IST

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समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट: फैसले पर 5 अहम सवाल

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की तीन सदस्यीय पीठ ने समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 के मुद्दे पर वृहद पीठ द्वारा सुनवाई का आदेश दिया है. भारत में इस कानून को 1860 में मैकाले की सिफारिशों पर 1862 में लागू किया गया जिसके अनुसार समलैंगिकता के अपराध के लिए 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

इंग्लैंड में यह क़ानून खत्म हो चुका पर भारत में इसको खत्म करने पर पिछले 18 सालों से कानूनी जद्दोजहद चल रही है. भारत समेत 72 देशों में समलैंगिकता को अपराध माना जाता है, जबकि 85 देश इसे संरक्षण देते हैं और 47 देश इसे मान्यता देते हैं. भारत में सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश से कई संवैधानिक सवाल खड़े हो गए हैं?

समलैंगिकता पर क्या अब दो संविधान पीठ सुनवाई करेंगी?

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने धारा 377 को दिसंबर 2013 में संवैधानिक ठहराते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया था. दिल्ली हाईकोर्ट के जज एपी शाह ने वर्ष 2009 के फैसले से दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था. उस फैसले के खिलाफ रिव्यू रद्द होने के बाद नाज फाउंडेशन की क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के गठन का आदेश 2016 में दिया था, जो अभी भी लंबित है.

सुप्रीम कोर्ट ने नवीनतम आदेश में क्यूरेटिव याचिका का जिक्र करते हुए प्राइवेसी के फैसले का हवाला देते हुए नई याचिका के लिए बृहत पीठ के गठन की बात कही. सवाल यह है कि नए मामले और क्यूरेटिव याचिका पर क्या दो अलग संविधान पीठ द्वारा सुनवाई होगी? यदि नए मामले को क्यूरेटिव याचिका के साथ जोड़ दिया गया तो इस याचिका पर नए तरीके से कैसे विचार हो सकेगा?

संसद द्वारा कानून में बदलाव के बगैर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कैसे लागू होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित करने के बाद संसद में कानूनी बदलाव के लिए सरकार द्वारा बिल पेश किया गया. इस पर बहस के दौरान केन्द्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि संसद द्वारा कानूनी बदलाव के बगैर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर अमल संभव नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2013 के फैसले में कहा था कि धारा 377 में संसद द्वारा ही बदलाव संभव है. समलैंगिकता के कानून में बदलाव के लिए कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने संसद में निजी विधेयक पेश किया जिसे सांसदों ने बहुमत से अस्वीकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ यदि समलैंगिकता पर कानून को गैर-संवैधानिक घोषित कर भी दे तो संसद द्वारा कानून में परिवर्तन के बगैर इसे कैसे लागू किया जाएगा?

क्या देश में 13 सुप्रीम कोर्ट हैं?

समलैंगिकता मामले में कानून में बदलाव होना ही चाहिए पर क्या इसके लिए संसद उचित प्लेटफार्म नहीं है? संसद में पेश नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार अदालतों में बेवजह के मामलों पर सुनवाई से पुराने मुकदमों पर फैसले नहीं हो पा रहे. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री विकास सिंह ने अपने भाषण में कहा कि हर बेंच में जजों के अलग रवैये से देश में 13 सुप्रीम कोर्ट है. पांच याचिकाकर्ताओं का मामला 2 सालों से लंबित होने के बावजूद इस पर नोटिस भी नहीं हुई थी पर बड़े वकीलों की बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अब बृहद पीठ के गठन का फैसला दे दिया. कई सालों से लंबित क्यूरेटिव याचिका पर जल्द सुनवाई की बजाय दो साल पुरानी याचिका पर एक नई बृहत पीठ बनाने का निर्णय संविधान की कसौटी पर कैसे सही हो सकता है?

पांच याचिकाकर्ताओं से मामला अलग कैसे हो सकता है?

नई याचिका पांच ऐसे लोगों ने दाखिल की है जो स्वयं को इस कानून से सीधे तौर पर प्रभावित बता रहे हैं, यद्यपि उन्हें समलैंगिकता के अपराध के लिए शायद ही सजा हुई हो? सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में प्राइवेसी के बारे में नौ न्यायाधीशों की पीठ के फैसले के उस अंश को दर्ज किया है जिसमें समलैंगिकता को अपराध मानने वाले नाज़ फाउंडेशन के फैसले से असहमति जताई गई थी.

पीआईएल नियमों के अनुसार पांच याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर करने से पहले सरकार को प्रतिवेदन देना जरूरी था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि याचिकाकर्ताओं ने कोई प्रतिवेदन दिया और सरकार ने मामले में कोई आदेश पारित किया? सुप्रीम कोर्ट के फैसले संविधान के अनुसार देश का क़ानून माने जाते हैं पर अपने फैसलों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वयं ही अंतिम नहीं मानने से न्यायिक अनुशासन पर सवाल खड़े होते हैं?

सरकारों के रवैये में विरोधाभास क्यों?

विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट के अनुसार समलैंगिकता को अपराध से मुक्त करने के लिए पिछले 18 वर्षो में सभी सरकारें विफल रहीं. कांग्रेस की यूपीए सरकार ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एड्स और बच्चों के यौन शोषण के खतरों के तर्क पर समलैंगिकता की याचिका का विरोध किया था. पर अब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल समलैंगिकता के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में बहस कर रहे हैं.

बीजेपी ने नियुक्त एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने समलैंगिकता के आदेश को गलत बताते हुए क्यूरेटिव याचिका को अप्रूव किया था. जबकि बाबा रामदेव और आरएसएस समलैंगिकता को मर्ज के साथ पारिवारिक व्यवस्था के खिलाफ मानते हैं. अति न्यायिक सक्रियता का विरोध करने वाली सरकार द्वारा समलैंगिकता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा से कई अन्य कानूनी बदलावों और संसदीय सर्वोच्चता के मुद्दों पर एक नई बहस शुरू हो सकती है.

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