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मोदी सरकार की साफ नीयत पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

राफेल पर कांग्रेस का शोरशराबा अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद डील के असली घोटाले से ध्यान हटाने का एक तरीका था

Updated On: Dec 15, 2018 11:13 AM IST

Rajeev Chandrasekhar

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मोदी सरकार की साफ नीयत पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अब तक कांग्रेस एवं राहुल गांधी द्वारा राफेल फाइटर डील पर लगाए गए सारे आरोपों पर विराम देते हुए उन्हें सिरे से निरस्त कर दिया है. अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, 'हमें इस प्रक्रिया पर कोई संदेह नहीं है. हमें विमान की गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं है. हमारा देश बिना तैयारी के नहीं रह सकता है.'

एक नेता (मैं बहुत संक्षेप में कह रहा हूं) और एक राजनीतिक पार्टी के रूप में, जिनके लिए बेकार के आरोप लगाना/ राजनीतिक रणनीति की एक मजबूत कड़ी होगी- ऐसे में निर्णय के ये तीन वाक्य प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों की तरह पढ़ने आवश्यक हो जाते हैं. उनकी यह याचिका राहुल की ‘आरोप लगाकर हट जाने की’ रणनीति के तहत खारिज हो गई. जिसके तहत उन्होंने यह आरोप लगाए थे कि सरकारी अनुबंधों में भ्रष्टाचार करने के लिए कॉरपोरेट कंपनियों को एनपीए के तहत छूट दी गई थी.

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सरकार एवं रक्षा मंत्रालय इसमें सबसे पहले रणनीति के तहत बैकफुट में पकड़े गए थे. और वह उस प्रचार के मुकाबले काफी कम भी रहे. कांग्रेस इस कारण लगातार झूठ भी बोलती रही. इसमें राहुल गांधी ने जिस तरीके से प्रचार कर राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, यह बात अक्षम्य है. इसके लिए वायुसेना प्रमुख एवं दो सेवारत एयर मार्शल को आगे आकर अदालत के बाहर एवं भीतर की प्रक्रिया को स्पष्ट करने की आवश्यकता थी.

लोगों को शुरु से सच्चाई पता थी:

शुरुआत से ही कई लोगों को यह बात स्पष्ट रूप से पता थी कि अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर के असली घोटाले से ध्यान हटाने के लिए राफेल पर शोरशराबा करना उनकी एक मजबूरी थी. इसके साथ ही यह भी स्पष्ट था कि राहुल गांधी इन जानकारियों का इस्तेमाल अन्य प्रतियोगी कंपनी दसॉ (Dassault) के इशारे पर कर रहे थे.

लेकिन आज मुझे राहुल गांधी और कांग्रेस के संबंध में बार-बार यह दोहराने में आनंद का अनुभव हो रहा है कि सच्चाई अंतत: सामने आ ही जाती है और आज यह बात प्रत्यक्ष है.

Rafale Fighter Plane

आईएएफ नेतृत्व द्वारा समझाया गया कि दसॉ राफेल एक स्टेट ऑफ द आर्ट प्लेटफॉर्म है. जिसमें आईएएफ एयर को चीनी एवं पाकिस्तानी वायुसेना के मुकाबले श्रेष्ठता प्रदान की गई है. यूपीए कार्यकाल के दौरान राफेल को चुना गया था क्योंकि वह सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी थी. पर यूपीए सरकार ने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, जिसके असली कारण अभी भी अस्पष्ट हैं.

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वायुसेना को बिना किसी निर्णय के सालों तक एक किनारे पर धकिया दिया गया और उसकी परिचालन क्षमताओं को स्पष्ट रूप से कम कर दिया गया था. क्योंकि इसका असली प्लेटफॉर्म अधिग्रहण करीब तीन दशक पुराना था अर्थात् एसयू-30एमकेआई था. इसलिए जिन 36 लड़ाकू विमानों या दो स्क्वाड्रनों को विक्रेता से चलती हालत में खरीदा गया, उसका कारण यह था कि उस समय भारतीय वायुसेना सुसज्जित नहीं थी और अपने बहुत बुरे दौर से गुजर रही थी.

उन्हें तत्काल भी इसीलिए खरीदा गया क्योंकि उस समय पिछले एक दशक से यूपीए सरकार जानबूझकर और बुरे तरीके से अपने फैसले पर काबिज़ नहीं रह पा रही थी. उस समय जब यह सर्वविदित था कि आईएएफ एक पुराना विमान उड़ा रही है. और युवा पायलट उन विमानों को उड़ाते हुए अपनी जान जोख़िम में डाल रहे हैं.

कांग्रेस ने अगस्तावेस्ट लैंड पर पैसे उड़ाए:

वहीं सैन्य रूप से आक्रामक चीन के मुकाबले हमारे वहां विमानों की खासी कमी थी. ऐसे में यूपीए सरकार ने परमाणु वितरण सक्षम लड़ाकू प्लेटफॉर्म पर निर्णय लेने के बजाय, कांग्रेस पार्टी के प्रथम परिवार के प्रभाव में अगस्तावेस्ट लैंड वीआईपी हेलिकॉप्टर खरीद वायुसेना के दुर्लभ संसाधनों को वहां खर्च किया.

नरेंद्र मोदी की सरकार ने त्वरित रूप से इस आवश्यकता को पहचाना और इसके तहत अत्यावश्यक रूप से एक व्यापक पैकेज में 2 स्क्वाड्रनों को तत्काल रूप से अधिग्रहित किया गया. जिससे नए विमान जल्द से जल्द परिचालित हो सकें. चूंकि इस संबंध में ठोस रूप से बातचीत का एक हिस्सा पूर्ण हो चुका था, इसलिए अंतर सरकारी अनुबंध पर वर्ष 2016 में हस्ताक्षर हुए.

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वायुसेना की मध्यम और दीर्घकालिक आवश्यकता के लिए, सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत एक रोडमैप बनाया और निविदा जारी की. सार्वजनिक/निजी क्षेत्र की कंपनियों के 100 लड़ाकू विमानों को उस निविदा के माध्यम से चुना. यह राष्ट्र के लिए एक सही रणनीति है. क्योंकि जहां एक ओर बहुत कम अवधि में ही भारतीय वायुसेना को सशक्त बना दिया गया. वहीं दूसरी ओर लंबी अवधि में असली मिलट्री मैनुफैक्चरिंग क्षमता का निर्माण किया गया.

राजनीतिक आरोपों की कीमत:

कांग्रेस का तो घोटालों का एक बड़ा शानदार इतिहास रहा है. हाल ही के आलेखों से पता चलता है कि 70 के दशक में जगुआर सौदे में तत्कालीन रक्षा मंत्री का वैसा ही हस्तक्षेप रहा, जैसा आज के समय में हैलिकॉप्टर घोटाले में वीआईपी लोगों की भूमिका रही है. यह बात तो साफ है कि कांग्रेस ने यह सोचा होगा कि भारत की जनता उनके लंबे और संदिग्ध इतिहास को भूल जाएगी. और नरेंद्र मोदी की सरकार के बारे में विश्वास करने लगेंगे.

RAHUL GANDHI

पर उनकी यह राजनीतिक रणनीति बुरी तरह से असफल हो गई. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार की प्रामाणिकता को और मजबूत किया है और दशकों से दिल्ली के गलियारों में अपने विभिन्न कांग्रेसी परचमों के तहत निहित हितों को फलीभूत करने वाले लोगों को साफ करने की मोदी सरकार के दृढ़ संकल्प को अपने फैसले से मजबूती प्रदान की है.

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राहुल एवं उनके सलाहाकारों के लिए झूठ बोलकर प्रचार करना एक वैध राजनीतिक रणनीति हो सकती है. जो एकदम भी माफ करने योग्य कदम नहीं है और एक तरह से यह एक आपराधिक प्रवृति भी है. क्योंकि इसके मूल में राष्ट्रीय सुरक्षा की बात निहित है. जिससे हमारी सुरक्षा में दिन-रात लगे लोगों के शिशु मन की मानसिकता पर बुरा असर पड़ता है. कुछ कहानियां तो इतनी बुरी हैं कि इसे सुन गुस्से में हम सबका खून उबलने लगेगा.

जैसे, 2018 में आईएएफ के अलावा दुनिया के किसी भी देश में जगुआर उड़ान नहीं भर रही है. वायुसेना अब इन विमानों को अपग्रेड करने की योजना बना रही है और उन्हें अगले 25 सालों तक नवजीवन देने की सोच रही है. आईएएफ पुराने विमानों के साथ ही जारी रखने के लिए मजबूर है क्योंकि आवश्यक फंड होने के बावजूद नए विमानों की आवक कहीं न कहीं अटक जाती है.

जहां राजनेता आपस में लड़ते रहते हैं और नौकरशाह फाइलों पर बैठे होते हैं. ऐसे में समय बदलता और बढ़ता जाता है. नब्बे के दशक में तो हालत इतनी खराब थी कि हमें पूर्वी यूरोप से 20-30 ग्राउंडेड एमआईजी-21 लेने के लिए मजबूर किया गया. आईएएफ को चालू हालत में रखने के लिए यह सेकेंड हैंड खरीद आवश्यक थी.

अगर जल्दी से आज और फिर अगले बीस सालों के बाद देखा जाए तो कांग्रेस के लिए कुछ नहीं बदला है. बेकार के राजनीतिक बिंदुओं पर अपने पॉइंट बनाने के लिए वह सशस्त्र सेना की तैयारियों को कहीं पीछे छोड़ सकती है.

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मैं समझता हूं कि इस प्रकार के खतरनाक झूठ फैलाने के लिए राजनीतिक नेताओं को कुछ खतरनाक परिणाम तो जरूर भुगतने ही चाहिए. इस प्रकार के राजनीतिक जाल बिछाकर स्वयं द्वारा गढ़े गए झूठ का प्रचार कर, राष्ट्र एवं उसकी सुरक्षा और रक्षाबलों की ताकत को राजनेताओं की उंगलियों एवं उनकी वाणी द्वारा खेल न बनाया जाए और उसकी अनुमति किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए.

लियो टॉल्स्टॉय का कथन राहुल गांधी के लिए श्रेष्ठ है:

राहुल गांधी के लिए यह निर्णय चुनौतियों का एक नया सेट बन गया है. एक ऐसा नेता जिनकी राजनीतिक रणनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा विचित्र से झूठ और दुष्प्रचार पर आधारित है. ऐसे में आज के निर्णय से राहुल गांधी द्वारा अगली बार फैलाए जाने वाले राजनीतिक दुष्प्रचार को झूठ जान लोगों की आंखें जरूर खुलेंगी.

आजकल उन्होंने अपने ट्वीट्स में प्रसिद्ध लेखक एवं विचारक लियो टॉल्स्टॉय को उद्धृत करने का एक नया तरीका अपनाया है. जो उनके लिए भी उपयुक्त है कि 'झूठ एवं धोखे से कुछ भी बेहतर है.'

PM MODI

नरेंद्र मोदी ने वास्तव में हमारी सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण के खनन का एक कठिन काम हाथ में लिया है. उनके इन राजनीतिक रूप से कठिन निर्णयों के कारण उन अधिग्रहणों पर रोक लगी है. उनकी ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता से रक्षा सौदों की मुश्किल दुनिया में अपनी सरकार की क्षमता पर विश्वास रख वह आत्मविश्वास के साथ राजनीतिक रूप से कठिन निर्णय ले सकते हैं.

राष्ट्र की सुरक्षा में दिन-रात कार्यरत स्त्री-पुरुष और सेनाएं उनपर विश्वास करती हैं. वह विश्वास करते हैं कि यह सरकार सही विकास और सही नीयत के साथ प्रतिबद्ध है और आज सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय देकर इस बात पर अपनी मुहर लगा दी है.

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(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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