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सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझ आई हाई कोर्ट के आदेश की अंग्रेजी

अंग्रेजी इतनी जटिल थी कि यह सुप्रीम कोर्ट के भी पल्ले नहीं पड़ी

FP Staff Updated On: Apr 20, 2017 07:55 AM IST

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सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझ आई हाई कोर्ट के आदेश की अंग्रेजी

कानूनी आदेशों की भाषा वैसे ही बड़ी जटिल होती है. अक्सर इन्हें समझना आम आदमी के बस में नहीं होता. हिमाचल प्रदेश के एक हाई कोर्ट के एक आदेश की अंग्रेजी इतनी जटिल थी कि यह सुप्रीम कोर्ट के भी पल्ले नहीं पड़ी. हारकर सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को अलग रखते हुए मामला पुनर्विचार को भेज दिया.

मामला एक किराएदार और मकान मालिक के बीच चल रहे केस का है. इस पर हाई कोर्ट ने फैसला दिया था और कहा था कि मकान मालिक किराएदार को नहीं निकाल सकता. लेकिन यह आदेश बड़ी ही कठिन अंग्रेजी में लिखा गया था. आदेश के बाद मकान मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

हाई कोर्ट के फैसले को देखने को बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हम इस फैसले को खारिज कर रहे हैं क्योंकि इसे कोई नहीं समझ सकता.' जस्टिस मदन लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने मामले को वापस हाई कोर्ट को भेज दिया ताकि इस पर दोबारा विचार किया जा सके.

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, किराएदार की वकील ने हाई कोर्ट के आदेश के बारे में मजाकिया लहजे में कहा कि उन्हें इसे समझने के लिए अंग्रेजी के प्रोफेसर के पास जाना होगा. मकान मालिक के वकील ने भी आदेश की भाषा बेहद जटिल बताया था.

आदेश के भाषा की एक बानगी आप भी देखिए...

“(The)…tenant in the demised premises stands aggrieved by the pronouncement made by the learned Executing Court upon his objections constituted therebefore… wherewithin the apposite unfoldments qua his resistance to the execution of the decree stood discountenanced by the learned Executing Court

However, the learned counsel…cannot derive the fullest succour from the aforesaid acquiesence… given its sinew suffering partial dissipation from an imminent display occurring in the impunged pronouncement hereat wherewithin unravelments are held qua the rendition recorded by the learned Rent Controller…”

मामला 1999 से चला आ रहा है जब मकान मालिक ने किराएदार के खिलाफ किराया देने का मामला दर्ज कराया था.

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