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एडल्टरी लॉ: अगर पति सहमति दे ही सकता है तो फिर विवाह की पवित्रता कहां है-SC

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर पति अपने पत्नी के विवाहेत्तर संबंध के लिए राजी ही है तो फिर शादी की पवित्रता कहां रहती है

FP Staff Updated On: Aug 08, 2018 08:32 PM IST

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एडल्टरी लॉ: अगर पति सहमति दे ही सकता है तो फिर विवाह की पवित्रता कहां है-SC

सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी (व्याभिचार) पर दंड कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है. मामले की सुनावाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्याभिचार कानून की रक्षा करने वाले सरकार के रुख पर सवाल उठाया. एडल्टरी लॉ किसी विवाहित पुरुष का एक विवाहित महिला के साथ यौन संबंध रखने पर सजा की बात कहता है. सरकार ने 'शादी की पवित्रता' को बचाए रखने के लिए इंडियन पीनल कोड की धारा 497 का बचाव किया था. इस पर कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि एडल्टरी पर दंड कानून से 'सार्वजनिक तौर पर क्या अच्छा' होगा.

सेक्शन 497

इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 497 में ये लिखा हुआ है कि 'कोई भी व्यक्ति, जिसे वो जानता हो या ये जानता हो कि वो किसी और व्यक्ति की पत्नी है, उसके साथ बिना उस व्यक्ति की सहमति या उसकी जानकारी के उस महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, जोकि बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता, उसे अपराधी माना जाएगा और उसपर व्याभिचार का आरोप लगेगा, जिसमें उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है या आर्थिक दंड या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है. ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दंडनीय नहीं होगी.'

मामले की सुनवाई जस्टिस आर एफ नरीमन, ए एम खानविलकर, डी वाई चन्द्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा की बेंच कर रही है. छह दिनों तक चली इस सुनवाई की शुरुआत 1 अगस्त को हुई थी और आज कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. न्यायमूर्ति नरीमन ने पूछा, 'अगर पति सहमति दे ही सकता है तो फिर विवाह की पवित्रता कहां है.' मुख्य न्यायाधीश ने कहा: 'हम कानून बनाने के लिए विधायिका की योग्यता पर सवाल नहीं खड़ा कर रहे हैं, लेकिन आईपीसी की धारा 497 में 'अच्छा' कहां है.'

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद को बताते हुए जस्टिस मिश्रा कहते हैं: 'पति केवल अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख सकता है. और पत्नी को क्या करना चाहिए या क्या नहीं ये नहीं बता सकता.'

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