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SC/ST Quota in Promotions: कोर्ट ने दिया फैसला, 2006 के आदेश को नहीं करेगा रिव्यू

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 2006 के अपने फैसले में SC/ST कर्मचारियों की नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण का लाभ देने के लिए कुछ शर्तें लगाई थीं

Updated On: Sep 26, 2018 10:54 AM IST

FP Staff

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SC/ST Quota in Promotions: कोर्ट ने दिया फैसला, 2006 के आदेश को नहीं करेगा रिव्यू

सुप्रीम कोर्ट बुधवार को अनुसूचित जाति-जनजाति के (SC/ST) कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण पर कोर्ट ने फैसला दिया है. 2006 के आदेश को रिव्यू करने की याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया है. कोर्ट ने इस मसले को सात सदस्यों की बेंच के पास भेजने से मना कर दिया है.

कोर्ट ने कहा है कि राज्य को वर्ग के पिछड़ेपन और सरकारी रोजगार में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता दिखाने वाला मात्रात्मक डेटा इकट्ठा करने की जरूरत नहीं है.

कोर्ट ने उन याचिकाओं पर फैसला सुनाया है जिनमें कोर्ट के 2006 के आदेश पर पुनर्विचार के लिए सात सदस्यीय बेंच गठित करने का अनुरोध किया गया था. 2006 के फैसले में SC/ST कर्मचारियों की नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण का लाभ देने के लिए कुछ शर्तें लगाई गई थीं.

प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को यह तय करना था कि 12 साल पुराने नागराज मामले में पांच जजों की बेंच के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है या नहीं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 2006 के अपने फैसले में SC/ST कर्मचारियों की नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण का लाभ देने के लिए कुछ शर्तें लगाई थीं.

बता दें कि अक्टूबर 2006 में नागराज बनाम भारत संघ के मामले में पांच जजों की बेंच ने इस मुद्दे पर निष्कर्ष निकाला कि सरकारी नौकरी में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए सरकार बाध्य नहीं है. हालांकि अगर वे अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं और इस तरह का प्रावधान करना चाहते हैं तो राज्य को वर्ग के पिछड़ेपन और सरकारी रोजगार में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता दिखाने वाला मात्रात्मक डेटा एकत्र करना होगा.

इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सविधान पीठ ने 30 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल हैं.

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