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न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और भारतीय लोकतंत्र

न्यायालय की अवमानना के भय से लोग न्यायपालिका या अन्य न्यायालयों के ऊपर कोई टिप्पणी करने से घबराते हैं. हालांकि निजी बैठक या व्यक्तिगत रुप से लोग विभिन्न न्यायालयों की आलोचना करते पाए जाते हैं

Tarushikha Sarvesh Updated On: Jan 13, 2018 11:20 AM IST

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न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और भारतीय लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका के इतिहास में इस तरह की यह पहली घटना है. यह घटना देश के लिए सुखद और दुखद दोनों है. दुखद इसलिए कह सकते हैं कि कुछ राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां इस प्रकार की घटना को जनता का न्यायपालिका से विश्वास उठ आने वाला कह सकती हैं. दूसरी ओर सुखद इसलिए की जनता को एक पारदर्शी सरकार के अलावा एक पारदर्शी न्यायपालिका भी चाहिए जिसके लिए लोगों का आगे आना बहुत जरूरी है.

न्यायालय की अवमानना के भय से लोग न्यायपालिका या अन्य न्यायालयों के ऊपर कोई टिप्पणी करने से घबराते हैं. यह अलग बात है कि निजी बैठक में या व्यक्तिगत रूप से लोग विभिन्न न्यायालयों की आलोचना करते पाए जाते हैं. इस मामले की गंभीरता सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों की प्रेस वार्ता से ही स्पष्ट हो जाती है.

जैसा की हम जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय न्याय पाने का अंतिम पायदान है इसलिए चार न्यायाधीशों का आगे आना अति महत्वपूर्ण है और न्यायपालिका में चल रहे पक्षपात को समाप्त करने का एक हथियार भी हो सकता है. जैसा की इन चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने कहा कि यह पक्षपात निजी नहीं है बल्कि जनता और गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर हो रहा है इसलिए यह प्रेस कॉन्फ्रेंस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. इस घटना को हमें सकारात्मक ढंग से देखना चाहिए न कि इसके पक्ष और विपक्ष की राजनीति में उलझना चाहिए.

कोई भी आचार संहिता जनहित और न्यायहित से ऊपर नहीं हो सकती 

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जजमेंट में माना है कि आपातकाल के दौर में मौलिक अधिकारों के हनन के मामले में उनसे चूक हुई थी, जिसका रेफरेंस खास तौर पर एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस 1976 को लेकर दिया जाता है. इस बात का पब्लिक में आना भी सकारात्मक था.

Justice Loya

(फोटो: फेसबुक से साभार)

ऐसा प्रतीत होता है कि इन चार न्यायाधीशों को पूर्व की निष्क्रियता के चलते और वर्तमान परिस्थितियों से ऐसा लगा हो कि उन्हें अपने विचारों को सार्वजनिक करना चाहिए. लोग ऐसा कह सकते हैं कि यह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है लेकिन लोग भूल जाते हैं कि न्यायपालिका जनता के लिए है न कि अपनी इज्जत बचाने के लिए.

इज्जत बचाने के नाम पर कुछ भी या अन्याय होते रहने देना भी सत्यनिष्ठा की श्रेणी में नहीं आता है. इन 4 जजों की आलोचना करने के बजाय हम सभी को पारदर्शी न्याय को ही सर्वोच्च स्थान देना चाहिए. कोई भी आचार संहिता जनहित और न्यायहित से ऊपर नहीं हो सकती.

जस्टिस लोया की मौत का खुलासा अवश्य होना चाहिए 

इसी तरह जस्टिस लोया की मौत सामान्य थी या हत्या थी, इसका खुलासा भी अवश्य ही होना चाहिए क्योंकि न्यायाधीश की अगर हत्या हुई है तो इसके कारणों का पता अवश्य ही लगना चाहिए. वह एक व्यक्ति विशेष की हत्या का खुलासा नहीं होगा बल्कि न्याय की सोच की हत्या का खुलासा होगा. जनता का विश्वास बातें छुपा कर नहीं बल्कि सही बातें उजागर करके ही जीता जा सकता है.

न्यायाधीशों व पत्रकारों में भय पैदा करने वाली स्थितियां भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है इसलिए मैं फिर इस बात पर जोर देना चाहती हूं कि कोई भी इंस्टिट्यूशन या आचार संहिता जनहित और न्याय हित से ऊपर नहीं हो सकती.

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