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आर्टिकल-35A: जम्मू-कश्मीर के लाखों लोगों के मौलिक अधिकारों के हनन का सबब!

सुप्रीम कोर्ट को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि कैसे इस एक कानून के कारण जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में सालों से मानवाधिकार उल्लंघन किया जा रहा है

Updated On: Aug 07, 2018 01:25 PM IST

Abha Khanna

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आर्टिकल-35A: जम्मू-कश्मीर के लाखों लोगों के मौलिक अधिकारों के हनन का सबब!

जब वो सिर्फ़ 16 साल की थी, तब मीना (बदला हुआ नाम) इस बात को लेकर दृढ़ संकल्प थी, कि वो अपनी मां के सपनों को पूरा करने के लिए लिए कड़ी मेहनत करेगी. उसने दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत के साथ पढ़ाई की, क्योंकि उसकी मां का सपना था कि मीना बड़ी होकर डॉक्टर बने- उनके परिवार का वो पहला शख़्स हो जो डॉक्टर बना हो!

मीना बेहद खुश और उत्साहित थी! जब उसे अपने सीनियर सेकेंड्री यानी 12वीं की परीक्षा में अच्छे नंबर मिले तब उसके सपनों को पंख मिल चुके थे. उसके माता-पिता बेहद खुश थे. सफाई कर्मचारियों के वर्ग से वो पहली लड़की या बच्ची थी जो डॉक्टर बनने की राह पर निकलने वाली थी!

मीना के माता-पिता दोनों ही जम्मू के म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करते हैं. उन्होंने जीवन भर कड़ी मेहनत की है. अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने जम्मू शहर को साफ़ और सुंदर बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया है, ताकि उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सके. उनकी उम्मीदें उस वक्त़ और बड़ी हो गईं जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि उनकी बेटी मीना पढ़ाई में काफी अच्छी है. उन्हें मीना को अंग्रेज़ी भाषा में बातचीत करते हुए सुनना बेहद अच्छा लगता था- उसका आत्मविश्वास और साफ़ भाषा का उच्चारण, उनके शहर में रहने वाले उच्च वर्ग और अंग्रेज़ी माध्यम व कॉनवेंट स्कूलों के बच्चों के समान था.

उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई सिर्फ़ इसलिए बचाकर रखी थी कि जब समय आए तब वे अपनी बेटी की डॉक्टरी की पढ़ाई का खर्चा उठा सके. उन्होंने ये तय कर लिया था कि वे कभी भी पैसों की कमी की वजह से अपनी बेटी की उच्च शिक्षा में बाधा नहीं आने देंगे. अब ऐसी कोई हालात या मजबूरी नहीं होगी जो उन-पर और उनके परिवार के नाम पर, सदियों से लगे सफाई-कर्मचारी के टैग या लेबल को हटाने के आड़े आएगी.

भारत एक महान देश है और उतनी ही महान इसकी लोकतांत्रिक परंपरा. हमारे देश में हर इंसान को समानता का अधिकार मिला हुआ है. हमारे यहां ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जहां कई सफल व्यक्तित्वों ने ग़रीबी, पिछड़ेपन और सामाजिक भेदभाव या कलंक से निकलकर न सिर्फ़ सफ़लता हासिल की है बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी वे मिसाल भी बने हैं.

मीना ने भी ऐसा ही सपना देखा था कि वो समाज के लिए एक ऐसा ही रोल-मॉडल बनेगी. लेकिन, शायद ये उसकी किस्मत में नहीं था. उसके सपने चकनाचूर हो गए हैं. इन दिनों वो और उसकी मां हर समय रोती रहती है, उसके पिता भी हर समय गुस्से में रहते हैं. क्योंकि जो सपना टूटा है वो किसी एक व्यक्ति या परिवार का सपना नहीं था बल्कि, वो एक पूरे समाज, एक पूरी पीढ़ी का सपना था- जो टूट गया.

जब मीना मेडिकल की प्रवेश परीक्षा के लिए फॉर्म भरने के लिए गई थी, तब वहां उसे पता चला कि वो ‘पर्सोना नॉन ग्रेटा,’ कैटेगरी में आती है, यानी वो व्यक्ति जो उस शहर या राज्य का मूल निवासी नहीं है, बल्कि उसे विदेशी या परदेसी माना जाता है. उन्होंने उससे कहा कि ये ज़रूरी है कि उसके एप्लिकेशन फॉर्म में उसका परमानेंट रेसिडेंशियल सर्टिफिकेट संलग्न हो. और मीना के पास ये सर्टिफिकेट नहीं था. सच तो ये है कि उसके समाज या समुदाय के किसी भी सदस्य के पास ये प्रमाण-पत्र नहीं है.

मीना के पिता और अन्य रिश्तेदारों ने इस सरकारी नियम को पूरा करने (इससे निपटने) की हरसंभव कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हो सके. उसके बाद, जैसा कि अन्य माता-पिता करते हैं, मीना के अच्छे नंबरों को देखते हुए उन्होंने मीना की दूसरे हायर टेक्निकल एजुकेशन कोर्स में भर्ती कराने की कोशिश की लेकिन वहां भी उन्हें इसी समस्या से दो-चार होना पड़ा. यहां भी पीआरसी उनके रास्ते आ गई.

इस घटना को बीते अब कुछ साल हो गए हैं, लेकिन इस घटना ने इस पूरे परिवार की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी है. अब उनके जीवन में कोई भी उम्मीद बची नहीं रह गई है. उनकी आंखों में न तो कोई सपने हैं, न ही कोई उम्मीद और न हीं किसी तरह का कोई उत्साह. मीना अब एक एकाकी बच्ची बन गई है, उसका चेहरा जो पहले मुस्कुराता रहता था, अब उसमें किसी तरह का कोई भाव नहीं आता. वो बाहरी लोगों से नज़रें चुराती है, उनसे मिलने से कतराती है और अपना पूरा समय घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर बिताती है. ये धारा- 35A की व्याख्या है, आपके लिए.

मीना का केस जम्मू-कश्मीर में होने वाला कोई इकलौता केस नहीं है. यहां ऐसे सैंकड़ों-हज़ारों की संख्या में युवा हैं जिनके साथ इस तरह का भेदभाव लंबे समय से किया जाता रहा है. ये भेदभाव कोई और नहीं बल्कि वही राज्य कर रहा है जहां उनका जन्म हुआ है और जहां वे पलकर बड़े हुए हैं.

साल 1957 में, जम्मू-कश्मीर की सरकार ने पंजाब के करीब 200 वाल्मिकी परिवारों को अपने यहां सफाई कर्मचारी के तौर पर नियुक्त करने लिए बुलाया था. इन परिवारों ने यहां इस आश्वासन पर काम करने के लिए हामी भरी थी कि समय के साथ उन्हें राज्य की नागरिकता और परमानेंट रेसिडेंट स्टेट्स दे दी जाएगी. लेकिन, ये दो सौ परिवार ये नहीं समझ पाए कि उन्हें जो परमानेंट रेसिडेंट स्टेट्स दी जाएगी, वो सशर्त होगी - और वो शर्त ये होगा कि उन्हें ये स्टेट्स सिर्फ़ ‘सफाई कर्मचारी’ होने के हैसियत तक ही मिल पाएगी. ये एक ऐसा शर्त था जो आने वाली कई पीढ़ियों के अरमानों, उनके सपनों और उनके भविष्य को बर्बाद करने वाला था.

पांच दशक के बाद आज ये समाज कई गुणा बढ़ चुका है, उसके सदस्यों की संख्या काफी बड़ी हो गई है. माता-पिता बेहतर भविष्य के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, उन्हें पढ़ा-लिखा रहे हैं. लेकिन, उनके सपने और मेहनत सिर्फ़ इस कारण से टूट रहे हैं क्यंकि वे राज्य के स्थायी निवासी सिर्फ़ तब तक हैं जब तक वे सफाई कर्मचारी का काम कर रहे हैं, उसके बाद नहीं!

उनके बच्चों को सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रोफेशनल कॉलेजों और शिक्षा संस्थानों में एडमिशन नहीं मिल सकता है. इस परिवारों के बच्चे और युवा चाहे कितने भी पढ़े-लिखे क्यों न हो उन्हें सरकारी नौकरी सिर्फ़ सफाई कर्मचारी की ही मिल सकती है, कुछ और नहीं.

इतना ही नहीं उच्च शिक्षा हासिल होने के बाद भी जो सफाई कर्मचारी जम्मू की म्युनिसिपैलिटी में पहले से काम कर रहे हैं, उन्हें योग्य होने के बाद भी प्रमोशन नहीं दी जाती है क्योंकि वे सिर्फ़ सफाई कर्मचारी के तौर पर ही काम कर सकते हैं, कुछ और नहीं. ये सफाई कर्मचारी लोकसभा चुनावों में तो अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन राज्य विधानसभा और म्यूनिसिपैलिटी के चुनावों के लिए नहीं. इसलिए राज्य स्तर के नेताओं और राजनैतिक दलों को उनकी कोई चिंता नहीं होती- क्योंकि ये लोग उनके वोट-बैंक का हिस्सा नहीं हैं. सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज़ दबकर रह जाती है क्योंकि उसे सुनने वाला वहां कोई नहीं है.

सफाई कर्मचारियों/वाल्मिकियों के अलावा ये व्यथा राज्य के कुछ और समुदायों के साथ भी है जिसमें पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थी शामिल हैं. इसके अलावा राज्य की आधी आबादी यानी महिलाएं भी सरकार के इस कानून से बुरी तरह से प्रभावित हैं कि किसको पीआरसी की स्टेटस दी जाएगी.

आख़िर क्या है आर्टिकल 35A?

आर्टिकल 35A भारत की संविधान में शामिल किया गया एक ऐसा प्रावधान है, जो जम्मू-कश्मीर की विधायिका को ये तय करने का पूर्ण अधिकार देता है कि राज्य के स्थायी निवासी कौन हैं. जिन लोगों को ये स्टेटस दिया जाता है उनके पास कई तरह के नागरिक अधिकार होते हैं, जो देश के अन्य राज्यों में रहने वाले नागरिकों को भी हासिल है- जिसमें सरकारी क्षेत्र में नौकरियां, राज्य में संपत्ति खरीदना या रखना, छात्रों को स्कॉलरशिप और अन्य किस्म की सरकारी और कल्याणकारी मदद. लेकिन, जिन लोगों को ये स्टेटस नहीं मिला है, उन्हें ये अधिकार हासिल नहीं हैं. जिसका नतीजा, राज्य में रह रहे विभिन्न समुदायों के बीच एक अकल्पनीय विभाजन पैदा हो गया है- ये एक तरह से सरकार या देश द्वारा समाज में- अमीरों और वंचितों के वर्ग को कानूनी सहमति देने जैसा है.

14 मई, 1954 को, भारत के राष्ट्रपति ने एक आदेश पारित किया जिसका नाम था- कॉन्स्टीट्यूशन ऑर्डर 1954 . (जम्मू-कश्मीर संबंधी) ये ऑर्डर या कानून तुरंत, बिना देर किए लागू कर दिया गया और उसने भारतीय संविधान के (एप्लिकेशन टू जम्मू-कश्मीर) ऑर्डर 1950 का भी अधिक्रमण कर लिया. इस प्रेसिडेंशियल ऑर्डर ने न सिर्फ़ कई नए बदलाव किए बल्कि उसमें एक नया अनुच्छेद भी शामिल कर लिया जो आर्टिकल - 35’ए’ बना. लेकिन, आपको ये धारा संविधान की मूल प्रति में कहीं भी नहीं मिलेगी.

आर्टिकल 35 ‘ए’ राज्य विधासभा को ये अधिकार दे देती है कि वो राज्य के स्थायी निवासियों की परिभाषा तय करे, और उन्हें वो सारे अधिकार और फायदे हासिल हो, जो भारत के उन अन्य नागरिकों को हासिल नहीं है, जो ‘परमानेंट रेसिडेंट’ की इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं. इस धारा ने जम्मू-कश्मीर में रह रहे अनेक समुदायों के लोगों को पिछले छह दशक से उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा है

जिसका नतीजा ये हुआ है कि राज्य में रह रहे लोगों में से, जिस किसी को भी ये स्टेटस नहीं मिला है, वो न तो राज्य में अपनी प्रॉपर्टी खरीद सकता है, न सरकारी नौकरी पा सकता है, न पंचायत, विधानसभा और म्युनिसिपैलिटी के चुनावों में हिस्सा ले सकता है, न ही सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई कर सकता है और न ही स्कॉलरशिप या अन्य सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का फायदा उठा सकता है.

आर्टिकल 35 ‘ए’ को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई?

संविधान की किसी भी धारा में किसी तरह के बदलाव या उसे निरस्त करने की प्रक्रिया का मतलब होता है संविधान में संशोधन करना. और संविधान में संशोधन सिर्फ संसद के ज़रिए हो सकता है, ऐसा आर्टिकल 368 में संसद की प्रक्रिया के संदर्भ में साफ़ तौर पर लिखा है. लेकिन आर्टिकल 35 ’ए’ को संसद के सामने कभी पेश ही नहीं किया गया.

ऐसा लगता है कि इस केस में, राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान में व्यक्त की गई संशोधन की प्रक्रिया को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया ताकि वे आर्टिकल 35 ’ए’ को इसमें शामिल कर सकें. इसका मतलब ये भी हुआ कि जम्मू कश्मीर के संदर्भ में धारा- 368 में भी बदलाव किया गया. भारत के राष्ट्रपति के पास विधायिका के अधिकार नहीं है, लेकिन इस केस में ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद ही भारत की संसद की ड्यूटी या ज़िम्मेदारी खुद ही पूरी कर दी.

1954 के ऑर्डर में लिखा है कि- ‘उसका इस्तेमाल संविधान की धारा 370 के अनुच्छेद ‘1’ अधिकारों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, जिसमें जम्मू-कश्मीर की सरकार की सहमति शामिल है.’

धारा- 370 में ये कहीं भी नहीं लिखा है कि वो राष्ट्रपति को कार्यपालिका का इतना बड़ा अधिकार देता है कि वो संविधान में, नया अनुच्छेद जोड़ने जैसा बड़ा बदलाव कर दे. तो क्या इसे आर्टिकल 370 गलत इस्तेमाल नहीं कहा जाएगा, जिससे आर्टिकल 35 ‘ए’ का जन्म हुआ?

इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि इस ‘संशोधन’ की जानकारी जनरल ऑडिट की प्रक्रिया के दौरान, मुख्य संविधान के टेक्स्ट एडिशन में उसका ज़िक्र न करके छुपा ली गई थी. हाल-फिलहाल के दिनों तक संविधान के कई जानकारों तक को न तो आर्टिकल 35 ‘ए’ के बारे में पता था, न ही ये कि इसके दूरगामी नतीजे क्या हो सकते हैं.

धारा 35 ‘ए’ संविधान में एक अपेंडिक्स यानी अतिरिक्त विषय के तौर पर जोड़ा गया है. ऐसे भला कैसे हो सकता है कि संविधान की एक धारा, जिसे संविधान का हिस्सा मानकर लागू कर दिया गया हो वो संविधान के मुख्य पाठ्य से गायब हो?

आर्टिकल 35 ‘ए’ को सुप्रीम कोर्ट में इसलिए चुनौती दी गई है क्योंकि सिर्फ़ उच्च न्यायालय के पास संविधान से संबंधित मामलों की सुनवाई करने का अधिकार है.

धारा 35 ‘ए’ को किस तरह से पीछे के रास्ते संविधान में शामिल किया गया, इसकी जांच के अलावा सुप्रीम कोर्ट को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि कैसे इस एक कानून के कारण जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में सालों से मानवाधिकार उल्लंघन किया जा रहा है. इसकी वजह राज्य में गलत तरीके से लागू किया गया ये संदिग्ध अनुच्छेद है. आख़िरकार ये देश के लाखों नागरिकों के अधिकार और उनकी आने वाली पीढ़ी के भविष्य के भविष्य का सवाल है.

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं और जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों और नीतियों की थिंक टैंक जम्मू-कश्मीर मीडिया स्टडी सेंटर की मीडिया डायरेक्टर हैं.)

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