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SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है

समाज के रसूखदार और प्रभावशाली लोगों के द्वारा समानता के अवसर पर कब्जा कर लेना एक तरह से संविधान के मूल सिद्धांतों के साथ धोखा है

Updated On: Apr 04, 2018 01:21 PM IST

Alok Prasanna Kumar

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SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है

सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने पूरे देश के दलितों और आदिवासियों के मन में भय और असुरक्षा का माहौल खड़ा कर दिया है. ऐसा सही भी है क्योंकि इस मामले में कोर्ट ने अपने हिसाब से आकड़ों का चयन करके और कुछ संदिग्ध तर्कों के आधार पर प्रभावी रुप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 के प्रावधानों को धक्का पहुंचाने का काम किया है.

प्रभावशाली लोग सुरक्षित, पीड़ित को समस्या

कोर्ट के इस मामले में दिए गए निर्देशों के आधार पर अब दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले को दर्ज कराने में ही शिकायतकर्ता को नाकों चने चबाना पड़ेगा. ये निर्देश एक तरह से प्रभावशाली और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को सुरक्षित करेगा वहीं दूसरी तरफ पीड़ितों को और पीड़ा पहुंचाने का काम करेगा.

अत्याचार निरोधक कानून के दुरुपयोग का आधार ही कमजोर तर्कों के बुनियाद पर खड़ा है. कोर्ट ने इस मामले में अपने दिए गए निर्देशों के पक्ष में किसी तरह का कोई गंभीर आंकड़ा पेश नहीं किया है और ना ही ये बताने में सफल रहे हैं कि एससी/एसटी एक्ट का किस तरह से अन्य कानूनों के मुताबिक ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है.

केवल नवीनतम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक इस तरह के केसों में 75 फीसदी मामलों में आरोपी बरी हो गया या फिर उसके खिलाफ कोई लगाया गया आरोप खत्म कर दिया गया. एमिकस क्यूरी ने जिरह के दौरान इन आकड़ों को कोर्ट के सामने रखा था. कोर्ट के इस निर्देश को देखकर लगता है कि कोर्ट की केवल इस बात में दिलचस्पी थी कि इस कानून के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सके.

क्या कानून से कोई बदलाव भी आया है?

कोर्ट का दलित अत्याचार के मुद्दे पर दोमुहांपन चौंकाने वाला है. एक तरफ जहां पर ये प्रयास बिल्कुल नहीं किया जा रहा कि इस कानून के लागू होने के बाद दलितों और आदिवासियों की जिंदगी में क्या बदलाव आए. क्या उनपर होने वाले अत्याचार कम हो गए या अब उन पर होने वाले अत्याचार लोगों के सामने आने लगे और दोषियों को सजा मिलने लगी. और क्या अब वे इस कानून के लागू होने के बाद खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. वहीं दूसरी तरफ ये माना जा रहा है कि ये कानून खुद ही एकता और भाईचारा जैसे संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी कर रहा है इसलिए इसकी व्याख्या करना आवश्यक है. इसलिए ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि कोर्ट की संवेदनाएं किसकी तरफ है.

वैसे ये पहला मामला नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट या खास करके सुप्रीम कोर्ट की एक निश्चित बेंच ने इस तरह के मामलों में दखल देने का फैसला किया है. इससे पहले इसी बेंच ने धारा 498-ए के प्रावधानों को कम करने का प्रयास इसी तरह से किया था. उस वक्त भी कोर्ट ने ये ही दलील दी थी कि दहेज कानून का दुरुपयोग हो रहा है और इसका इस्तेमाल अब लोगों को फंसाने के लिए किया जा रहा है. इस मामले में भी कोर्ट के निर्देशों के बाद ये तय हो गया था कि अब इस धारा के अंतर्गत किसी आरोपी को कोई सजा नहीं हो पाएगी. हालांकि इन निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच पुनर्विचार कर रही है.

अभी धारा 498-ए और एससी एसटी अत्याचार निरोधक पर जिस तरह से चर्चा हो रही है उस लगता है कि पूरे देश में केवल इन्हीं दोनों कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है. क्या आपको लगता है कि धारा 420 का इस्तेमाल फर्जी दावों के लिए नहीं हो रहा या फिर अंतर्जातीय विवाह और अंतर धार्मिक विवाह को तोड़ने के लिए अपहरण की धाराओं का गलत तरीके से सहारा नहीं लिया जा रहा. जहां तक मेरी जानकारी है उसके मुताबिक अभी तक तो किसी ने इन कानूनों के दुरुपयोग की शिकायत नहीं की है और न ही कोर्ट से इस संबंध में कोई निर्देश देने को कहा है फिर ऐसा क्यों है कि धारा 498-ए और अत्याचार निरोधक कानून पर ही न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की जा रही है.

A view of the Indian Supreme Court building is seen in New Delhi

न्यायपालिका में इस तबके का प्रतिनिधित्व न के बराबर

इसके उत्तर के लिए आपको ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है. दरअसल इन कानूनों के सहारे पहली बार समाज के उन लोगों पर सीधा प्रभाव पड़ा है जो ये समझते थे कि समाज में उनकी पोजीशन की वजह से वो कानून से ऊपर हैं. वैसे ये कोई गोपनीय बात नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के सबसे बड़े तबके का प्रतिनिधित्व न के बराबर है.

1960 के दशक के लिखने वाले अमेरिकी विद्वान जॉर्ज गडबोइस ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट का एक औसत जज उच्च जाति का पुरुष है जो कि प्रभावशाली लोगों की पृष्ठभूमि से आता है और उसके परिवार का संबंध कहीं न कहीं से न्यायिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए 1989 में शुरु किए गए कॉलेजियम सिस्टम से पहले जजों की नियुक्ति के संबंध में गडबोइस के पास अपने निष्कर्षों को बदलने का वाजिब कारण नहीं था. लेकिन अगर वो होते और उन्हें 1989 के बाद भी जजों की नियुक्ति को लेकर भी शोध करना होता तो भी उनका निष्कर्ष पहले जैसा ही निकलता.

अभी भी उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में महिला जजों की संख्या 15 फीसदी से कम है और उसमें भी दलितों की संख्या तो 5 फीसदी से भी कम है. जब जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के हाथ में है तो दलितों का प्रतिनिधित्व उच्च न्यायिक व्यवस्था में न के बराबर होने के पीछे भी जिम्मेदारी जुडिशियरी पर भी समान रुप से बनती है. हालांकि निचली अदालतों में स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन उसके लिए राज्य सरकार द्वारा निर्धारित आरक्षण जिम्मेदार है.

वैसे निचली अदालतों से हाईकोर्ट तक पहुंचने का सफर काफी मुश्किल है और अघोषित नियमों के तहत बहुत ही कम डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जजों को हाईकोर्ट जाने का मौका मिलता है और अगर मौका मिल भी गया तो उन्हें इतना समय ही नहीं मिलता कि वो नियुक्ति प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप पर सकें.

क्या संविधान से प्रेरणा लेकर न्यायपालिका में विविधता नहीं लाई जा सकती?

लेकिन सवाल उठता है कि विविधता कितना मायने रखती है? ये अब साबित हो चुका है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में विविधता की वजह से हमेशा अच्छे परिणाम सामने आते हैं. विविधता की वजह से परीक्षण किए जा रहे मामलों में अलग-अलग राय उभरकर सामने आती है जो कई बार केवल सैद्धांतिक न होकर वास्तविकता और खुद के अनुभवों के नजदीक होती है.

लेकिन जब संवैधानिक अदालतों की बात आती है तो ये इतना मायने क्यों रखता है? संविधान की व्याख्या केवल उसके शब्दों या पदों की व्याख्या करना नहीं है बल्कि एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए एक सुसंगत दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करना होता है जैसा समाज हम चाहते हैं. सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण के अलावा भारतीय संविधान एक सामाजिक सुधार का महत्वपूर्ण हथियार भी है जो कि हमारी बंटी हुई सामाजिक व्यवस्था में सभी को एक समान अवसर प्रदान करता है. लेकिन समाज के रसूखदार और प्रभावशाली लोगों के द्वारा समानता के अवसर पर कब्जा कर लेना एक तरह से संविधान के मूल सिद्धांतों के साथ धोखा है.

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