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सुप्रीम कोर्ट विवाद : CJI के खिलाफ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस संवैधानिक इतिहास का निम्नतम बिंदु

कोलेजियम का जन्म न्यायपालिका के अत्याधिक दमन का परिणाम है. जिसका सबसे ज्यादा जिम्मेदार इंदिरा गांधी को ठहराया जाता है. कोलेजियम की वजह से न्यायपालिका असुरक्षित हुई है

Raghav Pandey Updated On: Jan 12, 2018 10:28 PM IST

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सुप्रीम कोर्ट विवाद : CJI के खिलाफ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस संवैधानिक इतिहास का निम्नतम बिंदु

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया देश की एकमात्र ऐसी सरकारी संस्था है, जो वैधता के बजाए प्राथमिकता और नैतिकता के आधार पर कार्य करती है. लेकिन पिछले कुछ अरसे से सुप्रीम कोर्ट में इसके उलट वैधता पर ज्यादा जोर है. यह प्राथमिकता और नैतिकता से पलायन की पराकाष्ठा ही है, जो सुप्रीम कोर्ट के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस का सहारा लेना पड़ा. भारत के सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सिटिंग जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है.

हमें अभी इस बात की गंभीरता का एहसास नहीं है, लेकिन यह पल हमारे संवैधानिक इतिहास के निम्नतम बिंदु के तौर पर गिना जाएगा. वह संवैधानिक इतिहास, जिसे हम में से ज्यादातर कानून के शिक्षार्थी गर्व और श्रद्धा की भावना के साथ पढ़ते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसे पल दो बार पहले भी आ चुके हैं. पहला तब, जब तीन जजों की वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए जस्टिस रे को CJI नियुक्त किया गया था और दूसरा तब, जब जस्टिस एचआर खन्ना की जगह जस्टिस बेग को तरजीह देते हुए नियुक्त किया गया था.

जजों के बीच विवाद और मतभेद उस समय भी खासे गहरा गए थे, लेकिन मौजूदा वक्त की तरह तब, कोर्ट की शुचिता पर संकट खड़ा नहीं हुआ था. क्योंकि उस समय इन घटनाओं के कर्ताधर्ता इंदिरा गांधी के मातहत काम करते थे और उन्हीं के निर्देशों द्वारा संचालित होते थे. दरअसल मौजूदा संकट ने सुप्रीम कोर्ट की जन्मजात समस्या को जाहिर किया है.

सुप्रीम कोर्ट में कोई चीज ऐसी है जो सड़ चुकी है 

अलग-अलग बेंचों को केसों के आवंटन को लेकर निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट में समस्याएं और जटिलताएं बढ़ी हैं. उदाहरण के तौर पर जस्टिस ए. एम. खानविलकर का मामला ही लीजिए. जस्टिस खानविलकर दरअसल कामिनी जायसवाल बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई करने वाली बेंच में शामिल थे. इसके अलावा, वह खासे विवादित मेडिकल कॉलेज केस की सुनवाई करने वाली बेंच में भी शामिल थे. इस केस को कामिनी जायसवाल के केस के साथ ही चलाया जा रहा था. लेकिन जब विवाद गर्माया तो, जस्टिस खानविलकर ने इस मामले में खुद को क्लीन चिट दे दी.

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सुप्रीम कोर्ट के लंबे इतिहास और परंपरा से अब यह बात स्थापित हो चुकी है कि सर्वोच्च न्यायालय के सभी जज रैंक में बराबर हैं, और इस बराबरी में चीफ जस्टिस को सबसे पहले रखा जाता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह बात बताना, वास्तव में कोर्ट के कामकाज की दुखद स्थिति को प्रतिबिंबित करता है.

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने एक बार इलाहाबाद हाईकोर्ट की घटनाओं पर अहम टिप्पणी की थी. उस बेंच ने कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कोई चीज ऐसी है, जो सड़ चुकी है. शायद, समय का चक्र घूम चुका है और अब, सुप्रीम कोर्ट में कोई चीज ऐसी है जो सड़ चुकी है.

आप उतनी ही बुलंदी पर पहुंचें, जहां कानून आपके ऊपर रह सके 

17वीं शताब्दी के ब्रिटिश दार्शनिक और सम्मानित कानूनविद थॉमस फुलर ने एक बार कहा था कि, 'आप उतनी ही बुलंदी पर पहुंचें, जहां कानून आपके ऊपर रह सके.' इस तरह के सिद्धांत ही 'कानून के नियमों' के आधार हैं. कानून के ऐसे सिद्धांत सभी उदार लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मौजूद हैं.

भारतीय राजनीति में तो ऐसे सिद्धांतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. भारतीय संवैधानिक इतिहास में ऐसे उदाहरणों की भरमार है, जहां कानून के नियमों की श्रेष्ठता को किसी भी व्यक्ति विशेष के हितों से पहले रखा गया है.

मौजूदा घटनाओं को आजादी से पहले के हमारे संवैधानिक इतिहास से भी संदर्भित किया जाना चाहिए. 1970 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने अपने इतिहास के सबसे मशहूर केस का फैसला सुनाया था. यह केस था, हिज हॉलिनेस केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संसद के संशोधन की शक्ति के खिलाफ बुनियादी सिद्धांत को स्थापित किया था. ऐसा माना जाता था कि, संसद भी संविधान के उन हिस्सों में संशोधन नहीं कर सकती है, जो कि संविधान के बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हैं.

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दिलचस्प बात यह है कि, कोर्ट ने यह परिभाषित नहीं किया था कि, संविधान के कौन से हिस्सों से उसकी मूल संरचना बनी है. इसलिए, 'संवैधानिक श्रेष्ठता' का यह सिद्धांत 'न्यायिक सर्वोच्चता' का सिद्धांत बन गया. संसद की ओर से किए गए किसी भी संशोधन को अब कोर्ट रोक सकता था, क्योंकि यह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ था.

आज तक अपारदर्शी है कोलेजियम का कार्य 

सुप्रीम कोर्ट ने 80 के दशक के आखिरी दौर में और 90 के दशक की शुरुआत में तीन अहम केसों का फैसला किया, जो बाद में जजों के ट्रांसफर केसों के रूप में मशहूर हुए. इन फैसलों का संयुक्त प्रभाव संविधान में संशोधन के तौर पर सामने आया. जिसके चलते एक अतिरिक्त संवैधानिक संस्था का उदय हुआ, जिसे हम कोलेजियम के नाम से जानते हैं. कोलेजियम की अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया करते हैं.

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दरअसल कोलेजियम का जन्म न्यायपालिका के अत्याधिक दमन का परिणाम है. जिसका सबसे ज्यादा जिम्मेदार इंदिरा गांधी को ठहराया जाता है. कोलेजियम की वजह से न्यायपालिका असुरक्षित हुई है. कोलेजियम का कार्य आज तक अपारदर्शी है.

न्यायपालिका धीरे-धीरे विकसित हुई, लेकिन कोर्ट ने अपनी आजादी की रक्षा हमेशा से बहुत सख्ती के साथ की है. संभवत: ऐसे जोश में, कानून के नियम कभी-कभी खतरे में पड़ जाते हैं. हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में लोकपाल की नियुक्ति की थी, वह सरासर सरकार की न्यायिक संस्था की ओर से किया गया एक शासनात्मक कार्य था.

भारत का सुप्रीम कोर्ट दुनिया का सबसे शक्तिशाली सर्वोच्च न्यायालय बन चुका है, क्योंकि वह अपने जजों को खुद नियुक्त करता है. बहुत अधिक शक्तियां अक्सर निरंकुशता और मनमानी की ओर ले जाती हैं. शायद, आज हम जो देख रहे हैं वह उसी की अभिव्यक्ति है. लिहाजा सुधारवादी उपायों का समय आ चुका है. एनजेएसी व्यवस्था जैसे सुधारवादी उपाय का तो कोर्ट ने खुद ही स्वागत किया है. यह कदम कोर्ट के सम्मान को पुनर्स्थापित कर सकता है. बशर्ते इसे अमल में लाया जाए.

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