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प्रद्युम्न मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने भेजा रायन के मालिकों को नोटिस

रायन समूह के मालिकों को मिली जमानत के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में प्रद्युमन के पिता ने याचिका दाखिल की है

FP Staff Updated On: Oct 13, 2017 05:01 PM IST

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प्रद्युम्न मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने भेजा रायन के मालिकों को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने रायन समूह के मालिकों से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने गुड़गांव स्थित रायन इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के एक बच्चे की मौत के मामले की जांच कर रही सीबीआई से भी जवाब मांगा है.

रायन समूह के मालिकों को मिली जमानत के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में  प्रद्युम्न के पिता ने याचिका दाखिल की है. इस मामले पर सुनवाई अब 30 अक्टूबर को होगी.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस धनन्जय वाई चंद्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कक्षा दो के छात्र प्रद्युमन की हत्या के मामले की जांच कर रहे केन्द्रीय जांच ब्यूरो से भी जवाब मांगा है. यह छात्र आठ सितंबर को स्कूल के शौचालय में मृत पाया गया था और उसकी गर्दन कटी हुई थी.

पीठ ने इस समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रायन पिंटो, उसके माता-पिता और संस्थापक अध्यक्ष अगस्टाइन पिंटो और प्रबंध निदेशक ग्रेस पिंटो को नोटिस जारी किए. इन्हें सुनवाई की अगली तारीख 30 अक्तूबर तक नोटिस का जवाब देना है.

प्रद्युमन के पिता बरुण चंद्र ठाकुर ने अपनी याचिका में इन सभी की अग्रिम जमानत निरस्त करने का अनुरोध किया है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने रायन समूह के इन तीन ट्रस्टियों की गिरफ्तारी पर 28 सितंबर को रोक लगा दी थी. इन तीनों ने न्यायालय से अग्रिम जमानत का अनुरोध किया था.

सीबीएसई ने पांच अक्तूबर को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि गुरुग्राम स्थित रायन स्कूल में प्रशासन की लापरवाही के कारण ही नाबालिग छात्र की नृशंस हत्या हुई क्योंकि सिर्फ बच्चों और स्टाफ के लिए बने वाशरूम का इस्तेमाल करने की अनुमति ड्राइवरों और कंडक्टरों को भी दी गई थी.

ठाकुर ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि हाई कोर्ट द्वारा अंतरिम राहत देने और यह राहत आगे बढ़ाने के आदेश त्रुटिपूर्ण हैं और इन्हें निरस्त किया जाना चाहिए.

याचिका के अनुसार जांच ब्यूरो की जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और ऐसी स्थिति में उन्हें अंतरिम जमानत देना आपराधिक न्याय व्यवस्था को निष्फल बनाता है.

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