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पुराने नोटों पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप कितना जरूरी!

31 मार्च 2017 तक की समय-सीमा जब बतायी गयी थी, तब उसके लिए कोई शर्त नहीं थी

Updated On: Mar 22, 2017 07:53 PM IST

Rajeev Ranjan Jha Rajeev Ranjan Jha
लेखक आर्थिक पत्रिका निवेश मंथन और समाचार पोर्टल शेयर मंथन के संपादक हैं.

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पुराने नोटों पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप कितना जरूरी!

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि उसने उन लोगों के लिए एक श्रेणी क्यों नहीं बनायी, जो चलन से बाहर हो चुके नोटों को 30 दिसंबर 2016 से पहले जमा नहीं करवा पाए.

न्यायालय ने सरकार को 11 अप्रैल तक हलफनामा दाखिल करके बताने को कहा है कि उसने मुश्किल में फंसे लोगों के लिए खिड़की क्यों नहीं बनायी. अदालत ने यह भी पूछा है कि क्यों यह मौका सिर्फ एनआरआई या उन्हीं नागरिकों को दिया गया, जो विदेश यात्रा पर थे.

आपको पता ही है कि प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर 2016 को देश को संबोधित करते हुए भरोसा दिलाया था कि अमान्य हो चुके नोटों को आरबीआई की शाखाओं में 31 मार्च 2017 तक जमा कराया जा सकता है. यही आश्वासन नोटबंदी की औपचारिक घोषणा के लिए आरबीआई की ओर से जारी प्रथम अधिसूचना में भी दिया था.

30 दिसंबर का सरकारी अध्यादेश वादाखिलाफी 

30 दिसंबर 2016 तक सरकार या आरबीआई ने यह संकेत नहीं दिया था कि 31 मार्च 2017 तक नोट बदलने की सुविधा का जो आश्वासन दिया गया था, वह सुविधा केवल प्रवासी भारतीयों या विदेश यात्रा पर गए भारतीयों के लिए है.

ऐसे में जिस आदमी ने भी यह सोचा हो कि (चाहे किसी भी कारण से) कि वह बैंक में जाने के बदले 31 मार्च से पहले आरबीआई में अपने नोट बदलवायेगा, उसके पास ऐसा सोचने के लिए एक वाजिब कारण था.

खुद प्रधानमंत्री और आरबीआई की ओर से किया गया एक वादा था. आम लोगों के भरोसे को केंद्र सरकार के नोटबंदी के अध्यादेश में तोड़ा गया है.

प्रधानमंत्री के 8 नवंबर के संबोधन या आरबीआई की अधिसूचना में आरबीआई शाखा में 31 मार्च तक नोट बदलने की सुविधा के साथ कोई शर्त नहीं जोड़ी गयी थी.

30 दिसंबर को बैंकों में नोट बदलने का विकल्प समाप्त होने के बाद ऐसी शर्त जोड़ दिया जाना बिल्कुल गलत है और इसने काफी संख्या में ऐसे लोगों को विकल्पहीन छोड़ दिया है, जिन्होंने प्रधानमंत्री और आरबीआई के वादे पर भरोसा करके 31 मार्च 2017 तक नोट बदलने का विकल्प चुना हो.

यह कुछ ऐसा ही मामला है कि कोई सरकारी टेंडर भरने की तारीख 31 मार्च 2017 तक घोषित करने के बाद अचानक 30 दिसंबर 2016 को ही कह दिया गया हो कि टेंडर भरने की तारीख खत्म हो गयी, अब किसी का टेंडर स्वीकार नहीं होगा. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ऐसा ही किया गया था और सर्वोच्च न्यायालय ने इसे गैर-कानूनी बताया था.

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सुप्रीम कोर्ट करे दखल 

इस वजह से माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध है कि वह सरकार को ऐसे सभी लोगों के लिए एक विशेष खिड़की खोलने का निर्देश दे, जो किसी भी कारण से 30 दिसंबर 2016 तक बैंकों में 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट जमा नहीं करा सके.

आखिर सरकार को अब क्या हिचक है, क्योंकि 8 नवंबर 2016 तक 500 और 1000 रुपए के जितने भी नोट प्रचलित थे, उनमें से लगभग सारे नोट तो आरबीआई के पास आ ही चुके हैं. अब अगर कोई व्यक्ति इन पुराने नोटों में बड़ी रकम जमा कराने आये तो सरकार उससे स्रोत की पूछताछ कर सकती है.

लेकिन ऐसे तमाम लोग होंगे, जिन्हें 30 दिसंबर के बाद भी घर की सफाई में, या कहीं किसी किताब में दबे 10-20 पुराने नोट मिल गये होंगे. किसी गृहिणी को चावल के डिब्बे में रखे नोट भी मिले होंगे, जिन्हें वह रख कर भूल गयी होगी.

कोई बुजुर्ग अपने बेटे-बेटी के यहां महीनों रहने के बाद अपने स्थायी निवास वापस लौटा होगा तो उसे संदूक में कुछ नोट मिल गये होंगे.

कारण तो कुछ भी हो सकता है पुराने नोट अब भी पड़े होने का. मगर सबसे पहली बात यही है कि 31 मार्च 2017 तक की समय-सीमा जब बतायी गयी थी, तब उसके लिए कोई शर्त नहीं थी, कोई कारण बताने की जरूरत नहीं थी.

प्रधानमंत्री और आरबीआई का एक बहुत स्पष्ट वादा था. उस वादे को नहीं निभाना भविष्य में सरकार की संप्रभु गारंटी पर ही सवालिया निशान खड़े कर देगा.

अगर इस वादे को नहीं निभाया गया, तो क्या गारंटी कि भविष्य में सरकार अपनी ओर से जारी बॉन्डों का भुगतान करेगी? कल को एक अध्यादेश ला कर वह कह दे कि ये सारे बॉन्ड अमान्य घोषित किये जाते हैं!

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सरकार बताए कि पुराने नोटों का क्या करें?

सरकार इसे प्रतिष्ठा का विषय न बनाये और गलती को सुधार ले. न्यायालय ने सरकार से जो प्रश्न पूछे हैं, वे आपको इस गलती को सुधार लेने का सम्मानजनक अवसर दे रहे हैं. इस अवसर का उपयोग कीजिए.

अगर आप जनता के पास बच गये कुछ छिट-पुट पुराने नोट बदलने की सुविधा नहीं देना चाहते, तो कृपया एक पहेली का उत्तर दे दें. जिन लोगों के पास 10-20-50 पुराने नोट बच गये हों, वे इनका क्या करें?

आपकी सरकार ने 10 से ज्यादा ऐसे पुराने नोटों को रखना कानूनी अपराध बना दिया है, इसलिए रख नहीं सकते. इन नोटों को बैंक या आरबीआई को भी नहीं दे सकते. इन नोटों को जलाना, फाड़ना या किसी भी तरीके से नष्ट करना अपराध होता है. रख नहीं सकते, दे नहीं सकते, नष्ट नहीं कर सकते. तो प्रधानमंत्री जी, आप ही बताइये कि लोग इनका क्या करें?

लेखक आर्थिक पत्रिका 'निवेश मंथन' और समाचार पोर्टल शेयर मंथन (www.sharemanthan.in) के संपादक हैं.

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