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प्रदूषण को लेकर सरकार की नीयत और नीति पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

14 अक्टूबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी डंपिंग को रोकने के लिए एक लैंडमार्क जजमेंट दिया था लेकिन यह जजमेंट एक डेड लेटर हो गया है.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Oct 13, 2017 09:22 AM IST

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प्रदूषण को लेकर सरकार की नीयत और नीति पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक नवंबर तक पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने के बाद हंगामा बरपा हुआ है. कुछ लोगों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने काफी सख्त कदम उठाए हैं जो कि नहीं उठाने चाहिए थे, तो कुछ लोग मान रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या पटाखों से ही इतना प्रदूषण फैलता है, जिससे सालोंभर प्रदूषण रहता है या फिर इसके दूसरे भी अनेक कारण हैं? पर्यावरण मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर में दिवाली पर पटाखे नहीं फोड़ना ही प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है. इस समस्या के और भी कई कारण हैं.

पटाखे ही नहीं और भी हैं कई कारण

पिछले तीन-चार सालों से यह देखा जा रहा है कि सर्दी के मौसम आते ही दिवाली के आस-पास दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है. इस खतरनाक स्तर के लिए कहीं न कहीं पटाखों को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. लेकिन, विशेषज्ञों की राय है कि केवल दिवाली के मौके पर पटाखों से होने वाले प्रदूषण से ही नहीं दूसरे कारक भी सालभर जहरीली हवा फैलाने में काफी सहायक साबित होते हैं.

देश के जाने-माने पर्यावरणविद और खासकर प्रदूषण को लेकर ही काम कर रहे गोपाल कृष्ण फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘वायु प्रदूषण नुकसानदायक है, पर इससे कई गुना नुकसानदायक वह जहरीला कचरा है जो विदेशों से हमारे यहां आकर डंप होता है. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि देश की कॉमर्स मिनिस्ट्री इसको प्रमोट कर रही है. हमलोग अपने कचरे को मैनेज नहीं कर पाते हैं और बाहर के देशों का कचरा भारत में डंप करने का क्या तुक है?

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गोपाल कृष्ण आगे कहते हैं, 'देखिए मैं इसलिए कॉमर्स मिनिस्ट्री का नाम ले रहा हूं, जो नए नियम हैं या जो पुराने नियम भी है उसमें यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि जो फॉरेन ट्रेड हैं, वही हमारे देश में प्रदूषण फैलाते हैं. हमलोग इस महीने के 14 तारीख को इस मुद्दे को लेकर एक एनिवर्सरी मना रहे हैं.’

विदेशी डंपिंग पर फैसला अब डेड लेटर

बकौल गोपाल कृष्ण, ‘मैं आपको बताना चाहता हूं कि 14 अक्टूबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी डंपिंग को रोकने के लिए एक लैंडमार्क जजमेंट दिया था. इस लैंडमार्क जजमेंट को दिए 14 साल हो गए हैं. इस जजमेंट को बंग्लादेश जैसे देश भी मिसाल के तौर लेते हैं पर अपने देश में यह जजमेंट एक डेड लेटर हो गया है. यह भारत के नेशनल पर्यावरण के मुद्दे से जुड़ा हुआ है. हम जानना चाह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद देश के नेशनल लॉ में, इंटरनेशनल लॉ में, देश के बाहर, देश के अंदर रेगुलेशन में या फिर इनफोर्समेंट में क्या बदलाव हुए हैं?

जानकारों का मानना है कि कागजी तौर पर देश में इस समय प्रदूषण को लेकर कई स्तर पर काम किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार भी शायद कोई सख्त कदम उठाए?

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पर्यावरण पर काम करने वाले कुछ गैरसरकारी संगठनों का मानना है कि दिवाली बिना आतिशबाजी के भी अच्छे तरह से मनाया जा सकता है.

स्मोकर और नॉन स्मोकर में कोई फर्क नहीं

डॉक्टरों के मुताबिक, कुछ साल पहले तक लंग कैंसर के मरीजों में से केवल धूम्रपान करने वालों के फेफड़े ही काले होते थे, लेकिन आज सिगरेट नहीं पीने वालों के फेफड़े भी गुलाबी से काले होते जा रहे हैं. इस जहरीली हवा ने स्मोकर और नॉन स्मोकर में कोई अंतर नहीं छोड़ा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण पटाखा नहीं है, लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा पटाखों का होता है. दिल्ली में दो-तीन दिन की आतिशबाजी का सालभर के पर्यावरण में सिर्फ दो से तीन प्रतिशत का हिस्सा है.

अगर हम पिछले साल की बात करें तो दिवाली के दिन पीएम 2.5 का स्तर सामान्य से 8 गुना ज्यादा बढ़ गया था. इसी तरह पीएम 10 का स्तर भी सामान्य से 6 गुना ज्यादा बढ़ गया था. वहीं दिवाली के दूसरे दिन दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में पीएम 2.5 का स्तर सामान्य से 16 गुना ज्यादा लगभग 999 तक पहुंच गया था.

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक दिवाली के आसपास भी हवा की गति 8 से 10 किलोमीटर प्रतिघंटा से अधिक नहीं होगी.जिसके चलते प्रदूषण से राहत मिलने के आसार कम दिख रहे हैं.

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक दिवाली के आसपास भी हवा की गति 8 से 10 किलोमीटर प्रतिघंटा से अधिक नहीं होगी.जिसके चलते प्रदूषण से राहत मिलने के आसार कम दिख रहे हैं.

60-40 प्रतिशत का रेशियो

सिस्टम ऑफ एयर क्वॉलिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर) के मुताबिक पिछले साल पीएम 2.5 का स्तर दिवाली के तीन बाद काफी खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था.

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'सफर' के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर में पिछले 17 सालों के इतिहास में 2 नवंबर 2016 सबसे प्रदूषित दिन था. 17 सालों में पहली बार यह देखा गया था कि दिन में भी कम दृश्यता नजर आ रही थी.

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि 40 पर्सेंट पॉल्यूशन एनसीआर के बाहर से आने वाले धुंए की वजह से बढ़ता है. इसमें पराली जलाना, खाना पकाने के लिए डोमेस्टिक बायोमास, इंडस्ट्री और पावर प्लांट का धुंआ शामिल है. वहीं 60 पर्सेंट पोल्यूशन की वजह दिल्ली-एनसीआर में ही है. इसमें ट्रांसपोर्ट, सड़कों पर धूल, कंस्ट्रक्शन साइटों पर धूल, खुले में कूड़ा जलाना, डोमेस्टिक बायोमास, इंडस्ट्री से निकलने वाला धुंआ और डीजी सेट्स शामिल हैं.

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