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तीन तलाक बैन: ये फैसला नहीं, 1400 सालों के अन्याय और शोषण का अंत है

कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को बिना किसी लीपापोती के सभी को स्वीकार करना चाहिए

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Aug 23, 2017 10:43 AM IST

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तीन तलाक बैन: ये फैसला नहीं, 1400 सालों के अन्याय और शोषण का अंत है

तीन तलाक पर मेरी एक सहयोगी ने कहा कि बताइए पाकिस्तान में इस पर बैन हैं और हम हैं कि इस पर अभी तक एकमत नहीं हो पाए हैं. सुप्रीम कोर्ट के पांच सीनियर जजों की बेंच तक इस पर एकमत नहीं थी. इस बेंच के तीन जजों ने इसे असंवैधानिक करार दिया लेकिन दो जज, जिसमें चीफ जस्टिस जेएस खेहर भी शामिल हैं, इसे असंवैधानिक मानने को तैयार नहीं थे.

चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर का मानना था कि चूंकि सुन्नी समुदाय में तलाक-ए-बिद्दत (इंस्टैंट ट्रिपल तलाक) हजार साल से चली आ रही है इसलिए कोर्ट का इस मामले में दखल देना ठीक नहीं है, ये सुन्नी समुदाय का आंतरिक मसला है और मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा है.

सवाल है कि कोई परंपरा हजार अगर दो हजार साल से भी चली आ रही हो तो क्या उसके सही या गलत होने को चैलेंज नहीं किया जा सकता? क्या कोर्ट को उस परंपरा के नतीजों को ध्यान में रखते हुए फैसला नहीं देना चाहिए? क्या कोर्ट को ऐसे मामलों में धार्मिक सोच के दायरे से बाहर निकलकर नहीं सोचना चाहिए? इस आधार पर देखा जाए तो सती प्रथा और दहेज की परंपरा को भी सही ठहाराया जा सकता है.

अगर किसी समुदाय की महिलाओं के साथ परंपरा के नाम पर ज्यादती हो रही है तो उसे क्यों नहीं खत्म किया जाना चाहिए? क्या धर्म की आड़ लेकर इसे जायज ठहराने की कोशिशें खुद अपने ही नागरिकों के साथ अत्याचार नहीं है? triple-talaq.jpg]

पाकिस्तान ने 1961 में तीन तलाक पर पाबंदी लगा दी. बांग्लादेश में 1971 में नए देश के जन्म के साथ ही तीन तलाक वहां बैन है. श्रीलंका ने 1951 में तीन तलाक को अमान्य करार दे दिया. ईरान से लेकर सीरिया तक ने तीन तलाक को वर्षों पहले अवैध करार दे दिया है. हम अब भी इस बहस में पड़े हैं कि मुसलमानों के इस मसले पर क्या रुख अपनाया जाए.

धर्म की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार गलत

धर्म की आड़ देकर मुस्लिम महिलाओं के साथ जो ज्यादती वर्षों से चली आ रही है उसको खत्म करने में कोर्ट तक एक राय नहीं बना पाता है. वो भी तब जब पांच जजों की बेंच में हर धर्म के जज शामिल किए गए हों ताकि ये लोग निष्पक्ष होकर फैसला ले सकें.

तीन तलाक के मामले में मंगलवार को जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है उसके लिए छह याचिकाएं लगाई गई थीं. ये छह याचिकाएं डालने वाली महिलाओं की कहानी सुनकर ही समझा जा सकता है कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं कि जिंदगी को किस तरह से नर्क बना रहा है. सिर्फ तीन बार तलाक बोलकर किसी की महिला की जिंदगी को नर्क बना देने  को किस तरह  से न्यायसंगत माना जा सकता है ये समझ से परे बात है.

तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करने वाली अहम याचिका डालने वाली महिला शायरा बानो हैं. शायरा बानो की कहानी इस बात को समझने के लिए काफी है कि क्यों सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को महिला सशक्तिकरण की ओर बड़ा कदम माना जा रहा है.

36 साल की शायरा बानो के पति ने 15 साल की शादीशुदा जिंदगी के बाद एक झटके में तीन तलाक कहकर उससे छुटकारा पा लिया. उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो की शादी के बाद कई बार अबॉर्शन हुआ, इंफेक्शन की वजह से वो गंभीर रूप से बीमार हुई लेकिन पति ने बिना उसकी हालत की परवाह किए तीन तलाक बोलकर मर्द होने का इस्लामी फायदा उठा लिया. क्या इस मामले से ही ये नहीं समझा जा सकता कि किसी भी तरह से तीन तलाक को जायज ठहराना सही नहीं है.

याचिकाकर्ताओं की दास्तानें

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाली दूसरी महिला है इशरत जहां. इशरत को उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया. इशरत के बच्चों को अपने साथ ले गया. इशरत की शादीशुदा जिंदगी इस्लामी रवायत के हाथों बलि चढ़ गई, हावड़ा में वो अपने किसी दूर के रिश्तेदार के भरोसे किसी तरह से अपनी जिंदगी काट रही है. Muslim Triple Talaq

रामपुर की रहने वाली गुलशन परवीन भी एक याचिकाकर्ता है. उसकी कहानी भी शायरा बानो और इशरत जहां की तरह ही है. जयपुर की रहने वाली आफरीन रहमान भी तीन तलाक की सताई एक याचिकाकर्ता हैं तो सहारनपुर की रहने वाली अतिया साबरी ने भी सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि औरतों पर जुल्म करने की छूट देने वाले इस इस्लामी रवायत पर पाबंदी लगाई जाए.

इसके अलावा एक याचिकाकर्ता के तौर पर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) नाम का एक संगठन भी है. सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान इस संगठन का कहना था कि अगर अल्लाह की नजर में मर्द और औरत बराबर हैं तो फिर तीन तलाक के नाम पर भेदभाव क्यों किया जा रहा है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से इस मामले में पैरवी करने उतरे सीनियर वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक का मसला धार्मिक विश्वास का मसला है और धार्मिक विश्वास के मसले पर कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अब तक जिंदा रखा मुद्दा

उन्होंने उदाहरण सहित कोर्ट को समझाया था कि अगर भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे, ये एक धार्मिक विश्वास है और उसे संविधान के दायरे में रखकर चुनौती नहीं दी जा सकती है तो फिर तीन तलाक के मसले पर भी कोर्ट को ऐसा ही रुख रखना चाहिए. इस्लाम में 1400 सालों से जो प्रथा चली आ रही है उसे गैरइस्लामी नहीं कहा जा सकता.

Muslim Women

क्या राम का जन्म अयोध्या में हुआ है इस धार्मिक विश्वास से किसी महिला और पुरुष के साथ नाइंसाफी हो रही है. और अगर ऐसा होता है तो इस धार्मिक विश्वास से अलग हटकर कोर्ट को किसी भी तरह का फैसला देने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए.

रामजन्म भूमि को धार्मिक विश्वास से जोड़कर मामले को अब भी अदालत की चौखट में ले जाकर भी एक राजनीतिक मसले के बतौर जिंदा रखा गया है. दरअसल तीन तलाक के साथ भी यही साजिश वर्षों से चली आ रही है. अब तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है. कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को बिना किसी लीपापोती के सभी को स्वीकार करना चाहिए.

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