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तलाक-ए-बिद्दत खत्म होने का मतलब तीन तलाक से आजादी नहीं

मुस्लिम पति और पत्नी अब भी एक साथ तीन तलाक के आधार पर अलग हो सकते हैं, अगर वो शरिया के मुताबिक जिंदगी जी रहे हैं

Tufail Ahmad Updated On: Sep 12, 2017 10:44 PM IST

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तलाक-ए-बिद्दत खत्म होने का मतलब तीन तलाक से आजादी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की प्रथा को अवैध बताया है. यह फैसला भारत में मुस्लिम महिला अधिकार आंदोलन के लिए मील का पत्थर है. इस प्रथा में मुस्लिम पति तीन बार तलाक बोल कर विवाह खत्म कर देते हैं. यह दो तरह का होता है.

पहले प्रकार में पति एक साथ तीन बार तलाक बोल देता है. यह मौखिक या फिर लिखित जैसे फोन कॉल, पत्र, वाट्सएप, स्काइप, एसएमएस या फिर दूसरे तरीकों से हो सकता है. दूसरे प्रकार में हर तीन महीने में एक-एक बार तलाक बोला जाता है.

इस लेख को लिखे जाने तक ये अस्पष्ट था कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक के इन दोनों रूपों को अवैध करार दिया है. लेकिन ऐसा लगता है कि कोर्ट ने तीन-दो के बहुमत से एक साथ तीन तलाक बोलने की प्रथा को असंवैधानिक ठहराया है.

देशभर में एक साथ तीन तलाक बोलने को लेकर ही बहस छिड़ी थी. मुस्लिम पति इसका एकतरफा उपयोग करते थे. यह फैसला गरीब मुस्लिम महिलाओं के लिए मील का पत्थर है क्योंकि सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ता है. उनके पास अदालती लड़ाई के पैसे नहीं होते हैं.

Muslim Triple Talaq

ऐसा लगता है कि तीन तलाक का दूसरा रूप (एक साथ नहीं बोला जाने वाला) पहले की तरह वैध रहेगा. इस्लामिक धर्मगुरु इसका स्वागत करेंगे. अगर तलाक का ये तरीका जारी रहता है तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है.

गरीब वर्गों को प्रभावित करता है तीन तलाक

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के गरीब वर्ग को प्रभावित करता है क्योंकि वित्तीय वजहों से अधिकतर महिलाएं कोर्ट नहीं जा पातीं.

इसका मतलब है कि मुस्लिम पतियों को पत्नियों को एकतरफा तलाक देने का शरिया आधारित अधिकार हासिल रहेगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसा नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा तलाक की इस प्रथा का समाधान निकाला है.

मुस्लिम पति की तरफ से एकतरफा तलाक इसलिए होता है क्योंकि मुस्लिम पतियों को इसके लिए कोर्ट जाने की मनाही है. दूसरी वजह है कि इस्लाम में तलाक देने का अधिकार पति को है न कि पत्नी को. इस तरह, भारत में मुस्लिम पत्नी कोर्ट या मौलवी के जरिए तलाक मांग सकती है, दे नहीं सकती.

मीडिया रिपोर्ट्स को पढ़कर इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि अब मुस्लिम पति को तलाक के लिए कोर्ट जाना होगा. इसलिए, सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला जिसमें मुस्लिम पति के लिए कोर्ट के सामने तलाक लेना जरूरी नहीं हो, महिलाओं की स्थिति में वास्तविक बदलाव नहीं ला पाएगा. इस तरह, इस्लामिक संगठनों की ओर से चल रही संस्थाएं पहले की तरह अपना काम करती रहेंगी.

हालांकि कानून अच्छे हैं, लेकिन एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि मुस्लिम पति और पत्नी अब भी एक साथ तीन तलाक के आधार पर अलग हो सकते हैं, अगर वो शरिया के मुताबिक जिंदगी जी रहे हैं. उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में शरिया को मानने वाले मुस्लिम अदालत जाने से बचते हैं और अपना शरिया कोर्ट चुनते हैं.

अच्छी शिक्षा ही है तरक्की का जरिया

ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश फैसले की तारीख यानी 22 अगस्त, 2017 से प्रभावी हो गया. यह मील का पत्थर है क्योंकि तीन तलाक में जो मनमानापन है वो खत्म हो गया है. हालांकि, ये देखना होगा कि ये न्याय शायरा बानो के मामले को कैसे सुलझाता है.

Triple Talaq

शायरा बानो और दूसर याचिकाकर्ताओं की अपील पर ही देशभर में तीन तलाक पर बहस शुरू हुई और यह फैसला आया. अगर फैसला 22 अगस्त से ही लागू होता है तो इसका मतलब होगा कि शायरा बानो को न्याय नहीं मिलेगा. और तीन तलाक के जरिए विवाह-विच्छेद वैध रहेगा.

मीडिया रिपोर्ट्स में संकेत है कि कोर्ट ने सरकार से इस पर कानून बनाने को कहा है. साथ ही तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराने वाला फैसला छह महीने के लिए वैध है. लेकिन ये मुद्दा पांच जजों की संविधान पीठ में अल्पमत वाले दो जजों की टिप्पणी है और इसका कोई अर्थ नहीं है.

आखिर में, मुस्लिम महिलाओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी जिंदगी में कोई अर्थपूर्ण बदलाव नहीं आने वाला है. अगर बदलाव चाहिए तो उन्हें अपनी बेटियों और पोतियों को बेहतर शिक्षा दिलानी होगी जहां वो अच्छी नौकरी हासिल कर सकें.

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