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हिंदुत्व को 'जीवनशैली' मानने से बीजेपी की राजनीति को फायदा?

मनोहर जोशी की अपील पर हिंदुत्व को सुप्रीम कोर्ट ने धर्म नहीं बल्कि ‘एक जीवनशैली’ बताया था.

Indira Jaising Updated On: Jan 04, 2017 10:03 AM IST

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हिंदुत्व को 'जीवनशैली' मानने से बीजेपी की राजनीति को फायदा?

राजनीतिक दल और उसके नेताओं को जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगने से रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 123 (3) और 123 (3(अ)) को लागू किया गया है.

इस कानून में चुनावी प्रक्रिया के दौरान किसी उम्मीदवार या किसी तीसरे पक्ष के धर्म, समुदाय या जाति के नाम पर वोट मांगने की भी मनाही है.

राजनीति में धर्म का घालमेल होगा बंद?

धर्म के नाम पर वोट मांगना भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. ऐसा करना चुनावी भ्रष्टाचार माना गया. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को काफी हद तक जायज ठहराया.

उम्मीद की जानी चाहिए कि अब राजनीति और धर्म का घालमेल बंद होगा. इस बात में कोई शक नहीं कि इस फैसले का असर केवल यूपी चुनाव में ही नहीं बल्कि आगे आने वाले चुनावों पर भी पड़ेगा.

यह फैसला भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना पर आधारित है. अब कोई राजनीतिक दल भारत को एक धार्मिक राज्य बनाने का दावा नहीं कर सकता.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जनप्रतिनिधित्व कानून धारा 123 (3) के दो शब्दों ‘उसके धर्म’ पर आधारित है. यहां ‘उसके धर्म’ का मतलब ‘मतदाता का धर्म’ है. जिस पर धर्म या जाति के नाम पर असर डालने की कोशिश की जा रही हो.

धारा 123 में राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा ये दी गई है: ‘चुनाव के दौरान किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट या इनकी सहमति से किसी तीसरे आदमी का धर्म, जाति, संप्रदाय या भाषा के आधार पर अपने लिए या दूसरे के खिलाफ वोट करने की अपील. ऐसा करने के लिए अगर कोई अपनी अपील के समर्थन में किसी राष्ट्रीय चिह्न या राष्ट्रीय ध्वज के जरिए अपने उम्मीदवार या विपक्षी उम्मीदवार की चुनावी संभावनाएं बनाना या धूमिल करता है.’

इस धारा की अनुच्छेद 3(अ) में उम्मीदवारों को दिए जाने वाले चुनाव चिन्ह के बारे में भी स्पष्ट कहा गया है. कोई भी धार्मिक या राष्ट्रीय चिह्न किसी भी उम्मीदवार को नहीं दिया जा सकता.

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बीजेपी ने हमेशा से हिंदुत्व की राजनीति का सहारा लिया है

भारतीय नागरिकों के दो समुदायों के बीच धर्मों, जाति या भाषा के आधार पर दुश्मनी या नफरत फैला कर चुनाव पर असर डालना भी इस धारा में मना है.

3(अ) में कहा गया है: ‘चुनाव के दौरान किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट या इनकी सहमति से किसी तीसरे आदमी का धर्म, जाति, संप्रदाय या भाषा के नाम पर नफरत फैलाना. या फिर समाज को बांटकर चुनाव को प्रभावित करने के लिए किसी राष्ट्रीय चिह्न या राष्ट्रीय ध्वज के जरिए अपने उम्मीदवार या विपक्षी उम्मीदवार की चुनावी संभावनाएं बनाना या धूमिल करना.’

हिन्दुत्व धर्म नहीं 'जीवनशैली' के फैसले से किसको लाभ

1996 में रमेश प्रभु बनाम प्रभाकर कुंटे केस में फैसला सुनाते हुए जस्टिस जेएस वर्मा ने जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की इस धारा की अलग व्याख्या की थी.

इस फैसले में उम्मीदवार को अपने धर्म के नाम पर वोट मांगने से मना किया गया था. कोई तीसरा शख्स धर्म के नाम पर किसी के पक्ष या फिर किसी के खिलाफ वोट मांगने के लिए अपील कर सकता था.

1996 का यह वही दौर था सुप्रीम कोर्ट ने मनोहर जोशी की अपील पर हिंदुत्व की व्याख्या की थी. हिंदुत्व को सुप्रीम कोर्ट ने धर्म नहीं बल्कि ‘एक जीवनशैली’ बताया था.

किसी धर्मनिरपेक्ष देश में सत्ता हासिल करने के लिए चुनाव में धर्म के इस्तेमाल की मनाही है. भारत के संविधान का आधार ही धर्मनिरपेक्षता है. इसके खिलाफ जाकर भारत को एक धार्मिक राष्ट्र बनाने की कोशिश असंवैधानिक है.

हिंदुत्व को धर्म नहीं जीवनशैली बताकर अदालत ने अधूरा काम पांच जजों की बेंच के हवाले छोड़ दिया. इस बेंच ने भी अदालत की इस ऐतिहासिक संवैधानिक गलती को सुधारने का मौका गंवा दिया. हिंदुत्व धर्म नहीं है यह दावा करके बीजेपी इसके नाम पर वोट मांगती रहेगी.

फैसले का उल्लंघन करने पर हो सकती कारवाई  

राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र को लेकर भी स्पष्टता की गुंजाइश है. अदालत को यह साफ करना चाहिए कि क्या किसी पार्टी का घोषणापत्र भी इस दायरे में आता है. क्योंकि पार्टी का उम्मीदवार भी इसी घोषणापत्र को जनता के बीच रखकर चुनाव में जाता है. पूरा फैसला पढ़े बगैर इस पर राय देना ठीक नहीं होगा. लेकिन एक बात तो साफ यह कि घोषणापत्र का मुद्दा भी उठेगा.

भारत में हर राजनीतिक दल को जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29ए के तहत एक शपथ-पत्र दाखिल करना होता है. इसमें भारत के संविधान की समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों में भरोसा करने और इनका पालन करने की शपथ होती है.

यह बात और है कि आज तक भारत में किसी पार्टी को धारा 29ए के उल्लंघन के आरोप में प्रतिबंधित नहीं किया गया है. लेकिन कम से कम चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद पार्टियों की धर्मनिरपेक्षता नए सिरे से जांचने का मौका मिल गया है.

पवित्र गाय

धर्म एक निजी मामला 

सुप्रीम कोर्ट का आदेश भारत के लोगों की जिंदगी में धर्म की खास भूमिका को मानता है. अपने धर्म का पालन करने, उसका सम्मान और सुरक्षा करने के नागरिकों के अधिकार को भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ताकत मिली है.

धर्म केवल निजी आस्था का विषय होना चाहिए. सत्ता हासिल करने और सरकार चलाने में इसकी भूमिका बर्दाश्त नहीं होगी.

इसका असली असर आने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा. चुनाव आयोग को भी यह देखना होगा कि राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में क्या वादे कर रहे हैं.

क्या कोई पार्टी धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हुए अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण का वादा कर सकती है? चुनावी रैलियों के दौरान हर पार्टी के नेताओं का भाषण भी चुनाव आयोग की नजर में होगा. कहीं कोई नेता अपने भाषण में संवैधानिक सीमा तो नहीं लांघ रहा?

अब होगी राजनीतिक दलों की असली परीक्षा 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का राजनीतिक पार्टियां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ऊपरी समर्थन तो कर रहीं हैं. लेकिन इसे लेकर पार्टियों के बीच में और उनके अंदर के संघर्ष का अब आगाज होगा.

1994 में एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के काम करने और उनके सत्ता हासिल करने के तरीकों पर टिप्पणी की थी.

कोर्ट ने कहा, 'अगर कोई पार्टी या संगठन सत्ता हासिल करने के लिए ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करती है. जो भारतीय के संविधान धर्मनिरपेक्ष ढांचे को नुकसान पहुंचाए. तो जाहिर है वो गलत कर रहीं हैं. राजनीतिक दलों का लक्ष्य गठन सत्ता हासिल करने के लिए होता है.’

कोर्ट ने कहा, ‘अलग लोगों के समूहों का उद्देश्य अलग हो सकता है. कुछ संगठन धार्मिक उद्देश्यों के लिए बनाए जाते हैं. कुछ सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार के लिए. लेकिन इनकी मंजिल कभी भी सत्ता हासिल करना नहीं होता. जबकि राजनीतिक दलों का उद्देश्य ही सत्ता हासिल करना होता है या कई उद्देश्यों में से एक होता है.’

इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, ‘राजनीतिक दलों के बगैर लोकतांत्रिक सरकार काम नहीं कर सकती. संविधान और राजनीतिक व्यवस्था का अटूट अंग हैं पार्टियां. अगर संविधान देश को धर्मनिर्पेक्ष रखने की मंशा  रखता है. तो पार्टियो का भी धर्मनिर्पेक्ष होना जरुरी है. राजनीति और धर्म के घालमेल को न तो भारतीय संविधान इजाजत देता है न ही कोई तवज्जो.’

संविधान की भावना के अनुकूल फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बताया, ‘राजनीति में धर्म को लाना संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ना है. किसी खास धर्म को मानने वाली पार्टी अगर सत्ता में आती है तो उसका धर्म देश का धर्म बन सकता है. देश के बाकि धर्म दोयम दर्जे के बन सकते हैं. यह संविधान की धारा 14, 16 और 25 के खिलाफ होगा.’

इस आदेश में कोर्ट ने आगे बताया,‘हमारा संविधान किसी भी पार्टी या संगठन को राजनीतिक और धार्मिक में से किसी एक क्षेत्र में ही काम करने की इजाजत देता है. अगर कोई पार्टी संविधान की इस भावना के खिलाफ काम करती है तो उसे राजनीतिक दल के रूप में काम करने का कोई अधिकार नहीं होगा.’

supreme court

मसला राजनीतिक पार्टियों की वैचारिक या धार्मिक आजादी का भी है. आखिर इन पार्टियों की आजादी की हद कहां तय होगी. धर्म पर हर भाषण पर रोक नहीं है. क्या यह मनाही तब होगी जब:

धर्म चुनावों में किसी एक पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष या उसके खिलाफ मतदाताओं को प्रभावित करे तब.

या

किसी एक उम्मीदवार को चुनाव जिताने के लिए वोटों की खातिर भाषण या अपील में धर्म का इस्तेमाल हो.

किसी एक राजनीतिक मामले को लेकर इसकी लक्ष्मण रेखा तय करना मुश्किल है. पर इतना तो तय है कि अब कोर्ट को धोखा देना मुमकिन नहीं होगा.

अगली बड़ी चुनौती मनोहर जोशी केस में जस्टिस वर्मा के फैसले को चुनौती देना है. क्या हिंदुत्व वाकई केवल एक जीवनशैली है या फिर एक धार्मिक राष्ट्र बनाने की कोशिश?

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