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दहेज कानून पर नए फैसले से क्या कमजोर होंगी बहुएं?

क्या परिवार कल्याण समिति की ये रिपोर्ट सामाजिक ओहदें, माली स्थिति और जान-पहचान के साये से दूर रहेगी?

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Jul 28, 2017 08:06 PM IST

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दहेज कानून पर नए फैसले से क्या कमजोर होंगी बहुएं?

धारा 498ए यानी दहेज उत्पीड़न मामले में अब सीधे गिरफ्तारी नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान ये गाइडलाइन बनाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट द्वारा कहा गया कि धारा 498ए के दुरुपयोग को रोकने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है.

कोर्ट ने ये भी कहा कि हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति बनाई जाए और समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही गिरफ्तारी की जाए.

कानून की रक्षा करना और उसका दुरुपयोग होने से रोकना, बेशक हमारी न्यायपालिका की जिम्मेदारी है. लेकिन क्या कानून के दुरुपयोग होने के डर से कानून को कमजोर करना सही है?

सवाल ये भी कि, क्या सच में अब तक 498ए के तहत गिरफ्तारी या केस दर्ज कराना इतना आसान था? क्या ये अकेला ऐसा कानून है जिसके दुरुपयोग होने का डर है?

कोर्ट से पहले समाज से लड़ना होता है

दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा की शिकायतों के तहत दर्ज हुए मामले पहले से ही सीधा कोर्ट में नहीं पहुंचा करते थे, ना ही हर मामले में गिरफ्तारी हुआ करती थी. इन मामलों में आपको पुलिस थाने, वीमेन सेल, मीडिएशन जैसी प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता था.

अब ऐसे में समिति बनाना और मामले को पहले वहां भेजना, क्या ऐसे मामलों को और ढील देना या फिर न्याय की प्रक्रिया में एक और सीढ़ी को जोड़ने जैसा नहीं है.और ये तो आपने भी सुना ही होगा कि जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड यानी देर से मिलने वाला इंसाफ, इंसाफ ना मिलने जैसा ही है.

एक और अहम बात जो हमें नहीं भूलनी चाहिए वो ये कि हम वैसे भी उस समाज का हिस्सा है जहां आज भी घरेलू मामलों को कोर्ट तक ले जाना इतना आसान नहीं. वो समाज, जहां घर की इज्जत को कोर्ट कचहरी में ले जाना शर्म की बात है. कोर्ट से पहले आपको ये लड़ाई अपने घर, परिवार, रिश्तेदारों से लड़नी पड़ती हैं.

Justice Law 1

जिस समिति की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है उस समिति में सामाजिक कार्यकर्ता, लीगल स्वयंसेवी और रिटायर शख्स को शामिल किया जाएगा. वीमेन सेल जाने से महिलाएं पहले से कतराती है वो इसलिए क्योंकि वहां बैठा कोई अधिकारी आपके जानने वाला हो सकता है या फिर इस बात का डर कि आपका कोई जानने वाला आपको वहां जाते हुए कोई देख ना ले. अब ऐसे में जिला स्तर की समिति जाना क्या कानूनी लड़ाई को परिवार की इज्जत और महिला की इज्जत के साए में कमजोर नहीं करेगा?

महिला अपराधों के लिए सख्त कानून का अभाव 

और अब बात महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधोंं की और उससे लड़ने के लिए बने कानूनों की. हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए सख्त कानूनों की पहले से ही कमी है. जिसका एक बड़ा उदाहरण हम निर्भया रेप कांड मामले में देख चुके है.

निर्भया मामले का मुख्य आरोपी आज सिर्फ इसलिए आजाद है क्योंकि वो जुवनाइल था और हमारे देश में उस समय ऐसा कोई कानून नहीं था जिसके तहत उसे सजा मिल सके. ऐसे में एक और कानून को कमजोर करना महिलाओं को कमजोर करने जैसा है. ऐसे ही एक मामले का सामना कर चुकी सिमरन (बदला हुआ नाम) से हमने बात की.

सिमरन ने बताया कि उनकी शादी उतने लंबे समय की नहीं थी जितना लंबा समय उन्हें वीमेन सेल, कोर्ट ओर मीडिएशन में लगा.

gang rape

प्रतीकात्मक तस्वीर

सिमरन कहती है, शादी कौन तोड़ना चाहता है, आखिर एक लड़की अपनी शादी के लिए कितने सपने सजाती है. लेकिन जब मामला दहेज उत्पीड़न का हो या घरेलू हिंसा का, तो उसे कोई कितना बर्दाश्त करेगा और क्यों करेगा.

सिमरन ने कहा कि उनकी शादी को ज्यादा लंबा वक्त नहीं हुआ था. वो पहले तो इसे चुपचाप सहती रही क्योंकि उन्हें डर था कि इस लड़ाई में उनका परिवार, समाज उनका साथ देगा भी या नहीं. लेकिन जिस दिन हालात बद से बदत्तर हुए वो किसी तरह अपने पति के घर को छोड़कर भाग निकली.

न्याय के लिए मिलती है तारीख पर तारीख 

खुद को और परिवार रिश्तेदार को समझाने में उन्हें लगभग 2 महीने का लंबा वक्त लगा और जब वो मामला दर्ज कराने थाने पहुंची तो वहां उन्हें एक अलग मुसीबत का सामना करना पड़ा. एफआईआर दर्ज कराने के लिए उन्हें निवेदन करना पड़ा. गिरफ्तारी तो इस मामले में दूर की चीज थी, क्योंकि मामले की रिपोर्ट उन्होंने घटनास्थल से रिपोर्ट नहीं की थी.

मामला दर्ज हुआ और पहुंचा वीमेन सेल जहां शुरू हुआ तारीखों का दौर. क्योंकि कंप्लेन उन्होंने दर्ज की थी, ऐसे में उन्हें और उनके परिवार को हर तारीख पर पहुंचना पड़ता था पर सामने वाला पक्ष आए या ना आए उस पर किसी का जोर नहीं. जोर सिर्फ इतना कि अगली तारीख का एक और समन. वो कहती है कि हालांकि वीमेन सेल काफी कॉपरेटिव था पर नियमों के आगे वो भी क्या कर सकते थे.

तारीखों का लंबा दौर वीमेन सेल से निपटा तो मीडिएशन में जहां पहुंचा. जहां उन्हें समझाया गया कि सजा दिलाने की लड़ाई कम से कम 6 से 7 साल का लंबा वक्त ले सकती है, उसमे भी सजा होगी या नहीं उसकी कोई गारंटी नहीं. अक्सर ऐसे मामलों में सलाह दी जाती है कि मामले को मीडिएशन में ही निपटा दिया जाए, जिसमें भी एक लंबा वक्त लगता है.

Demonstrators shout slogans during a protest against the rape and murder of a law student in the southern state of Kerala, in Mumbai, India

मामला मीडिएशन में सेटल हो जाए तो उसके 6 महीने बाद आप कोर्ट में डिवोर्स का मामला डाल सकते है और नहीं तो मीडिएशन के बाद मामला जाएगा कोर्ट में और फिर आप करते रहिए तारीख पर तारीख.

आज भी आसान नहीं है कानूनी लड़ाई 

न्यायपालिका द्वारा शुरू की गई मीडिएशन की प्रक्रिया ऐसे तो कोर्ट के बाहर मामले को निपटाने की एक अच्छी कोशिश है. अच्छी इसलिए क्योंकि इस कोशिश से कुछ टूटते रिश्तें जिन में वापस साथ होने की गुंजाइश हो वो बच जाते हैं.

'दावत ए इश्क' जैसी फिल्में देख कर और किस्सों बातों में सुनकर ऐसा लग सकता है कि 498ए किसी लड़के और उसके घरवालों को फंसाने का आसान तरीका है पर यकीन मानिए कानूनी लड़ाई लड़ना हमारे देश में आज भी कोई मामूली बात नहीं. उपयोग और दुरुपयोग हर कानून का हो सकता है.

अंत में बस एक आखिरी सवाल और दुरूपयोग का ये डर क्या सच में उन महिलाओं के कानूनी अधिकारों का हनन नहीं है जो सच में ऐसे अपराधों का शिकार होती हैं. जिला स्तर की समिति निष्पक्षीय जांच करेगी, इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी. क्या परिवार कल्याण समिति की ये रिपोर्ट सामाजिक ओहदें, माली स्थिति और जान-पहचान के साये से दूर रहेगी?

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