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एडल्ट्री पर कोर्ट का फैसला: कुछ ने किया स्वागत तो कुछ ने जताई चिंता

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एडल्ट्री से संबंधित आईपीसी की धारा 497 को सर्वसम्मति से असंवैधानिक करार देते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को रद्द कर दिया

Updated On: Sep 27, 2018 08:05 PM IST

Bhasha

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एडल्ट्री पर कोर्ट का फैसला: कुछ ने किया स्वागत तो कुछ ने जताई चिंता

एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार को आए फैसले का कई लोगों ने स्वागत करते हुए कहा कि अच्छा हुआ कि एक पुरातन कानून से छुटकारा मिल गया, जबकि कुछ ने फैसले पर चिंता जताई.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एडल्ट्री से संबंधित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 को सर्वसम्मति से असंवैधानिक करार देते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को रद्द कर दिया. शीर्ष अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया.

बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि यह कानून बन जाता है, जिसे हम सभी को स्वीकार करना होगा.

उन्होंने कहा, ‘हमें मूल अधिकारों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर गौर करना होगा, चाहे वे कानून के समक्ष पुरूष या महिला के बीच हो या सबकी समानता को लेकर हो, या यह निजता का अधिकार के बारे में हो, या फिर यह वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन) के बारे में हो.’ उन्होंने कहा, ‘इसे इस क्रमिक विकास के संदर्भ में देखना होगा. यह फैसला उस दिशा में एक कदम है.’

एआईएमईआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीन तलाक का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 और 497 को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, लेकिन कोर्ट ने मुसलमानों में ‘फौरी तीन तलाक’ की प्रथा को निरस्त कर दिया और सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए इसे दंडनीय अपराध बना दिया.

उन्होंने ट्वीट किया, ‘सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि तीन तलाक असंवैधानिक है बल्कि इसे निरस्त कर दिया, लेकिन उसने कहा है कि 377 और 497 असंवैधानिक है.’ ऐसे में क्या मोदी सरकार इन फैसलों से कुछ सीख लेगी और तीन तलाक पर अपने असंवैधानिक फैसले को वापस लेगी.’

मुद्दे पर और अधिक स्पष्टता लाने की मांग

शीर्ष अदालत के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा अडिगे ने पूछा कि क्या यह फैसला बहुविवाह की भी इजाजत देता है? ‘चूंकि हम जानते हैं कि पुरुष अक्सर ही दो-तीन शादियां कर लेते हैं और तब बहुत ज्यादा समस्या पैदा हो जाती है जब पहली, दूसरी या तीसरी पत्नी को छोड़ दिया जाता है.’

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कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने भी इस मुद्दे पर और अधिक स्पष्टता लाने की मांग करते हुए कहा, ‘यह तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में डालने जैसा है. उन्होंने ऐसा किया लेकिन अब पुरुष हमें महज छोड़ देंगे या तलाक नहीं देंगे. वे बहुविवाह या निकाह हलाला करेंगे, जो महिला के तौर पर हमारे लिए नारकीय स्थिति पैदा करेगा. मुझे यह नहीं दिखता कि यह कैसे मदद करेगा. कोर्ट को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.’

वहीं, अन्य कार्यकर्ताओं और वकीलों ने इस फैसले का स्वागत किया. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस फैसले को एक बेहतरीन फैसला बताया. उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने एक और बेहतरीन फैसला देते हुए आईपीसी की धारा 497 के पुरातन कानून को रद्द कर दिया, जिसमें महिलाओं को उनके पति की संपत्ति माना जाता था और एडल्ट्री को अपराध (दूसरे की पत्नी के साथ संबंध रखने वाले पुरुष के लिए) माना जाता था. व्यभिचार तलाक का आधार हो सकता है लेकिन यह अपराध नहीं है.’

कांग्रेस सांसद और पार्टी की महिला इकाई की प्रमुख सुष्मिता देव ने उनसे सहमति जताते हुए ट्वीट कर कहा, ‘एडल्ट्री को अपराध नहीं मानने का फैसला शानदार है. साथ ही, जो कानून अपने व्यभिचारी पति पर मुकदमा करने का अधिकार नहीं देता और अपने (महिला) पर भी व्यभिचार में शामिल रहने पर उस पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दे सकता, वह असमान व्यवहार है और एक अलग व्यक्ति के तौर पर उसके (महिला के) दर्जे के विरूद्ध है.’

वहीं, उनकी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने फैसले की सराहना करते हुए कहा कि कुछ ऐसे कानून हैं जिन्हें बदले जाने, उनमें सुधार किए जाने या उन्हें समय के साथ हटाए जाने की जरूरत है.

उन्होंने कहा कि यह 150 साल पुराना कानून था जिसकी नए भारत में कोई जगह नहीं है लेकिन साथ ही हमें इस बात पर भी गौर करना होगा कि एडल्ट्री सामान्य चीज नहीं है और यह तलाक का आधार हो सकता है. मेरे विचार से जिस देश में हम रहते हैं उसे ध्यान में रखते हुए यह एक बहुत ही निष्पक्ष फैसला है.

ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमन एसोसिएशन और सीपीआई (एमएल) की पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णन ने कहा कि एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर करना स्वागत योग्य कदम है और यह काफी समय से लंबित था. उन्होंने ट्वीट किया, ‘...चलो अच्छा हुआ कि छुटकारा मिल गया: एडल्ट्री पर फैसला.’

इस कानून को बहुत पहले ही खत्म कर देना चाहिए था

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इसे बहुत पहले ही खत्म कर देना चाहिए था. उन्होंने कहा, ‘यह अंग्रेजों के जमाने का कानून था. अंग्रेजों ने इससे बहुत पहले ही मुक्ति पा ली थी, लेकिन हम अब तक इसे बना कर रखे हुए थे. इसे बहुत पहले ही खत्म कर देना चाहिए था.’ उन्होंने कहा, ‘महिलाएं अपने पतियों की संपत्ति नहीं हैं. यह फैसला न सिर्फ सभी महिलाओं के हित में है, बल्कि लैंगिक तटस्थता वाला फैसला भी है.’

सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी के मुताबिक महिलाओं पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण अस्वीकार्य है. हम 158 साल पुराने कानून को रद्द करने के फैसले का स्वागत करते हैं.

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प्रमुख महिला वकीलों ने लैंगिक समानता पर इस फैसले को ठोस और प्रगतिशील बताया है. वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन और वकील ऐश्वर्या भाटी और मेनका गुरूस्वामी ने शीर्ष अदालत के फैसले को सही ठहराया.

फैसले का दूरगामी असर होगा

रेबेका ने कहा कि धारा 497 को 50 साल पहले ही खत्म कर देना चाहिए था. उन्होंने कहा कि इसे आधुनिक भारत की दंड संहिता का कभी हिस्सा नहीं होना चाहिए था क्योंकि यह अत्यधिक पुरातन पितृसत्तात्मक कानून था. उन्होंने कहा, यह ‘काफी देर से आया लेकिन स्वागत योग्य कदम है.’

वहीं, ऐश्वर्या ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों को मजबूती प्रदान करने में इस फैसले का दूरगामी असर होगा. यह कानून औपनिवेशिक काल का था जिससे हमें छुटकारा पाना था क्योंकि उस समय महिलाओं को पुरुषों की चल संपत्ति माना जाता था और पत्नी अपने पति की संपत्ति मानी जाती थी.

मेनका ने लैंगिक समानता पर इस फैसले को अच्छा करार देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह नाम की संस्था में पुरुष और महिला, दोनों समान हैं.

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