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CBI Vs CBI: SC ने पूछा- सरकार ने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने से पहले सेलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली

सीबीआई बनाम सीबीआई की लड़ाई में सुनवाई करते हुए गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की खिंचाई की और पूछा कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने से पहले सरकार ने सेलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली

Updated On: Dec 06, 2018 01:14 PM IST

FP Staff

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CBI Vs CBI: SC ने पूछा- सरकार ने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने से पहले सेलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली

सीबीआई बनाम सीबीआई की लड़ाई में सुनवाई करते हुए गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की खिंचाई की और पूछा कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने से पहले सरकार ने सेलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ पिछले महीने से ही इस मामले की सुनवाई कर रही है. जजों की पीठ ने पूछा कि सरकार को सेलेक्शन कमिटी से सलाह लेने में क्या दिक्कत थी. बेंच ने कहा, 'यह पूरी तरह से उचित नहीं है. सरकार के किसी भी कार्रवाई का आशय शासन के लिए ठीक होना होता है.'

सेलेक्शन कमिटी में प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और नेता प्रतिपक्ष या विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता होते हैं. वर्मा ने कोर्ट में तर्क दिया है कि उनके दो साल के तय कार्यकाल को सेलेक्शन कमिटी की सलाह के बिना खत्म नहीं किया जा सकता.

सरकार के पक्ष पर सुप्रीम कोर्ट को संदेह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेलेक्शन कमिटी से सलाह नहीं लेने से अच्छा, सलाह लेना है. पीठ ने कहा, यह कानून के पालन भर का सवाल नहीं है लेकिन कानून के बेहतर पालन का सवाल है. यहां तक कि यदि जरूरत होती है तो क्या किसी कमिटी से किसी स्टेज पर सलाह नहीं ली जा सकती.

अदालत ने सरकार के पक्ष पर भी संदेह जताया कि असाधरण परिस्थिति में यह कार्रवाई आवश्यक थी. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि केंद्र सरकार और सीवीसी इस मामले को जुलाई तक झलेती रही, तब उसने सेलेक्शन कमिटी से संपर्क क्यों नहीं किया. इससे पता चलता है कि वर्मा को रातोंरात छुट्टी पर नहीं भेजा गया बल्कि यह अक्टूबर में तय कर लिया गया था.

इस मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई गोगोई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया था कि सरकार को 23 अक्टूर को ही आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का फैसला लेना पड़ा? सीजेआई ने कहा कि वर्मा कुछ ही महीने में रिटायर होने वाले थे, तो कुछ महीने इंतजार क्यों नहीं किया गया और सेलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली गई?

ट्रांसफर नहीं हुआ, अधिकारियों से अधिकार छीने गए

सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, 'असाधारण परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी. सीवीसी का आदेश बिल्कुल पक्षपाती नहीं था. सीबीआई के दो सबसे वरिष्ठ अधिकारी आपस में लड़ रहे थे और बजाय गंभीर केसों पर ध्यान देने के वो एक-दूसरे के खिलाफ ही मामलों की जांच कर रहे थे. अगर सीवीसी अपना काम नहीं करता तो ये अपने कर्तव्य का निर्वाह न करना होता.'

सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा का ट्रांसफर नहीं किया गया था, यह एक बनावटी तर्क है कि उनका ट्रांसफर कर दिया गया. वेणुगोपाल ने कहा कि यह एक ट्रांसफर नहीं था बल्कि दोनों अधिकारियों से उनके काम का अधिकार छीन लिया गया.

देश में दो सीजेआई नहीं हो सकते

आलोक वर्मा के वकील फली एस नरीमन ने अटॉर्नी जनरल वेणुगोपल की बात पर सुप्रीम कोर्ट में कहा, 'किसी भी हालत में सेलेक्शन कमिटी से सलाह लेना चाहिए था. इस केस में ट्रांसफर का मतलब केवल सेवा क्षेत्र में नहीं है. ट्रांसफर सिर्फ एक जगह से दूसरे जगह भेजना नहीं होता.'

आलोक वर्मा के वकील फली एस नरीमन ने कोर्ट में कहा, 'देश में दो चीफ जस्टिस नहीं हो सकते, संविधान के अनुसार भारत के सिर्फ एक चीफ जस्टिस हो सकते हैं. ऐसी ही अवस्था यहां भी है, सीबीआई में कोई एक्टिंग डायरेक्टर नहीं हो सकता.'

फली एस नरीमन के तर्क के बाद सीजेआई रंजन गोगोई ने पूछा, 'अगर कोई मुद्दा है तो क्या सुप्रीम कोर्ट एक्टिंग डायरेक्टर नियुक्त कर सकता है? इस पर नरीमन ने कहा, हां...सुप्रीम कोर्ट नियुक्त कर सकता है क्योंकि संविधान का अंतिम रक्षक वही है.'

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