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डर से नहीं बल्कि दिल से दिखाएं देशभक्ति, बस इतनी सी बात पर फिर क्यों बवाल है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जिससे किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य किया जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी के बावजूद देश में राष्ट्रगान की बहस ‘सावधान मुद्रा’ में ही जारी थी

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jan 09, 2018 06:17 PM IST

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डर से नहीं बल्कि दिल से दिखाएं देशभक्ति, बस इतनी सी बात पर फिर क्यों बवाल है?

सिनेमाघर में फिल्म शुरू होने से राष्ट्रगान के बजने पर खड़े होना चाहिए या नहीं इस पर एक लंबी बहस चल रही थी. निजता और अभिव्यक्ति की आजादी बनाम देशभक्ति की बहस में अदालती आदेश पर सवाल उठ रहे थे तो फैसले को देशभक्ति के सर्टिफिकेट से जोड़ कर देखा जा रहा था. आखिरकार केंद्र की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नया फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बदलाव करते हुए कहा कि सिनेमाघर में अब राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है.

दरअसल देशभक्ति के इस प्रतीक को सर्वोच्च अदालत तक ले जाने वाले शख्स का नाम है श्यामलाल चौकसे. मध्यप्रदेश के निवासी श्याम लाल चौकसे की ही जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान पर आदेश सुनाया था. लेकिन इस फैसले से तकरीबन 16 साल पहले श्यामलाल चौकसे ने ही फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ के एक सीन से राष्ट्रगान हटाने के लिए जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जिस पर जबलपुर हाईकोर्ट ने निर्माता-निर्देशक करण जौहर को फिल्म के सीन से राष्ट्रगान हटाने का आदेश दिया था.

बाद में सितंबर 2016 में श्यामलाल ने दोबारा राष्ट्रगान से जुड़े मुद्दे पर याचिका दाखिल की थी जिस पर सुनवाई के बाद 30 नवंबर 2016 को तत्कालीन जस्टिस दीपक मिश्र ने सभी सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स को आदेश दिया कि वो फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान को पूरा बजाएं और इसके प्रति सम्मान में दर्शक खड़े हों. कोर्ट का मानना था कि कि राष्ट्रगान को बजाने से लोगों में देशभक्ति और राष्ट्रीयता का भाव पैदा होगा.

Supreme Court

लेकिन कोर्ट का यही आदेश बाद में देशभक्ति की बहस में तब्दील होता चला गया. परिवार के साथ मनोरंजन के लिए सिनेमाघर गए लोगों की राष्ट्रीयता की परख पर सवालों की आंच उठने लगी. दरअसल सिनेमाघर जाने वाले लोगों में सेना के वो जवान भी हो सकते हैं जो कड़ाके की ठंड में सीमा पर देश के सुरक्षा के लिए पहरा देते हैं. लेकिन मुश्किल से मिली छुट्टी में परिवार के साथ मनोरजंन के लिए सिनेमाघर आने पर उन्हें भी राष्ट्रभक्ति के लिए एक नया सबूत देना पड़ता था. उस भीड़ में समाज के हर वर्ग के जिम्मेदार और सम्मानित लोग भी होते थे जिनसे देशभक्ति तक सीखी जा सकती है. लेकिन उनके लिए भी देशभक्ति के सर्टिफिकेट की खातिर खड़ा होना जरूरी था.

सवाल राष्ट्रगान के सम्मान की बजाए देशभक्ति के सर्टिफिकेट पर पहुंच चुका था. जबकि कोर्ट का ऐसा आशय कभी नहीं था. लेकिन बहस की लहर ऐसी चली कि सिनेमाघरों से विवाद और मारपीट की खबरें आने लगीं. वजह ये थी कि कुछ लोग मजबूरी की वजह से खड़े होने में असमर्थ थे तो कुछ लोगों का कहना था कि उन्हें खड़े होकर देशभक्ति दिखाने की जरूरत नहीं. कई जगहों पर बुजुर्गों और दिव्यांगों को सिनेमाघर में राष्ट्रगान के बजने पर खड़े न होने की वजह से अपमानित होना पड़ा.

गुवाहाटी में एक दिव्यांग अरमान अली व्हील चेयर पर बैठे थे. इसके बावजूद सिनेमाघर के कुछ ‘घोर राष्ट्रवादी’ दर्शक उन पर राष्ट्रगान पर खड़े होने का दबाव डाल रहे थे. जब वो नहीं खड़े हो सके तो उन्हें भारतीयता के बावजूद नया सर्टिफिकेट दिया गया. उन्हें कुछ लोगों ने पाकिस्तानी कह कर अपमानित किया. ऐसा नहीं था कि उनमें राष्ट्रीयता की कमी थी या फिर राष्ट्रगान के प्रति सम्मान नहीं था. वो पूरे राष्ट्रगान के वक्त सामने झुक कर बैठे रहे. एक दिव्यांग से और क्या अपेक्षा थी जो पूरी न हो सकी?

Indian supporters sing their national anthem before the start of the Cricket World Cup match between India and South Africa at the Melbourne Cricket Ground (MCG) February 22, 2015. REUTERS/Hamish Blair (AUSTRALIA - Tags: SPORT CRICKET) - RTR4QKO1

जब किसी नागरिक की राष्ट्रीयता पर सवाल उठता है तो वो कहीं का भी नागरिक क्यों न हो उसका अंतर्मन बुरी तरह आहत होता है. देश का नागरिक किसी भी देश में क्यों न हो उसक आत्मिक जुड़ाव देश और राष्ट्रगान से होता ही है. खेल के मैदान पर जब भारत की जीत के साथ तिरंगा लहराता है तो करोड़ों देशवासियों की रगों में देशभक्ति का लहू जुनून की तरह दौड़ता है. जब किसी विजय भारतीय खिलाड़ी को पदक देते समय राष्ट्रगान बजता है तो हर किसी का देशभक्ति में रोम-रोम जोश से सिहर उठता है. चाहे क्रिकेट विश्वकप में भारत की जीत का मौका हो या फिर ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा के गोल्ड मैडल जीतने का. वो भावनाएं सहज होती हैं जिनमें देशभक्ति चरम पर होती है.

लेकिन देशभक्ति पर छिड़ी बहस सिनेमाघर से निकल कर सियासत के मैदानों से कुलांचे भरते हुए खिलाड़ियों के ट्वीटर हाउस तक पहुंच गई. क्रिकेटर गौतम गंभीर ने ट्वीट कर पूछा कि क्या देश के लिए 52 सेकंड खड़े हो पाना मुश्किल है तो बॉलीवुड सिंगर सोनू निगम ने भी सवाल उठाए.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में संशोधन किया और बुजुर्गों और दिव्यांगों को खड़े न होने की रियायत दी. खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि देशभक्ति दिखाने के लिए राष्ट्रगान ही जरिया नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के वक्त खड़ा नहीं होता तो इसका मतलब ये नहीं कि उसे अपने देश से प्यार नहीं है. प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट 1971 में भी ये कहीं नहीं कहा गया कि राष्ट्रगान बजने के दौरान बैठा नहीं जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जिससे किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य किया जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी के बावजूद देश में राष्ट्रगान की बहस ‘सावधान मुद्रा’ में ही जारी थी.

देशभक्ति भी नैतिक संस्कार है जिसे थोपा नहीं जा सकता. देशभक्ति की भावना भीतर से पैदा होती है इसे ओढ़ा नहीं जा सकता. देश के लिए सम्मान की भावना को सीमित प्रतीकों में नहीं सिमटाया जा सकता. भारतीय मूल्य राष्ट्रीयता में पिरोए हुए हैं जो कहते हैं कि राष्ट्रगान का अपमान कतई नहीं होना चाहिए.

23 अक्‍टूबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि सिनेमाघर या दूसरी जगहों पर राष्ट्रगान बजाना जरूरी हो या न हो वो इस पर फैसला करे. जिसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि फिलहाल राष्ट्रगान को अनिवार्य न बनाया जाए. केंद्र सरकार ने एक अंतर मंत्रीमंडलीय कमेटी का गठन किया है जो आने वाले छह महीनों में अपने सुझाव देगी.

अजीब संयोग 

ये एक अजीब संयोग माना जा सकता है. चीफ जस्टिस बनने से पहले जस्टिस दीपक मिश्र ने ही सिनेमाघर में राष्ट्रगान बजाने पर आदेश दिया था. अब जबकि वो चीफ जस्टिस हैं तो उनकी अगुवाई वाली बेंच का संशोधित फैसला सामने आया है. देश के 45वें चीफ जस्टिस दीपक मिश्र को हमेशा से आम नागरिकों के प्रति झुकाव रखने वाला न्यायाधीश माना जाता है. अब उनके इस फैसले के बाद कम से कम देशभक्ति दिखाने की होड़ जरूर खत्म होगी. वर्ना फिलीपींस का ताजा उदाहरण सबके सामने है जहां राष्ट्रगान जोश में न गाने पर सजा भी मिल सकती है.

कोर्ट ने हमेशा ही अपने फैसले के बाद राष्ट्रीयता पर चल रही विरोधाभास से भरी बहस को रोकने की कोशिश की. यहां तक कहा कि लोगों को अपनी बाहों में देशभक्ति लेकर चलने को मजबूर नहीं किया जा सकता है.

बहरहाल अब इस फैसले के बाद आम नागरिक को देशभक्ति के ओवरडोज़ का शिकार नहीं होना पड़ेगा. भारतीय जीवन मूल्यों का विश्व में सम्मान है जो एक सभ्य समाज का निर्माण करते हैं और जो कहते हैं कि एक अच्छा इंसान और नागरिक ही सच्चा देशभक्त है. हमें जरूरत उस समाज को मजबूत करने की है ताकि राष्ट्रीयता की बहस में देश पीछे न छूट जाए.

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