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बहू को मक्खी बनाते सीरियल क्या कॉन्डम के ऐड से ज्यादा जरूरी हैं?

यूएन के मुताबिक भारत एड्स रोगियों के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर है

Updated On: Dec 12, 2017 12:43 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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बहू को मक्खी बनाते सीरियल क्या कॉन्डम के ऐड से ज्यादा जरूरी हैं?

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने सोमवार को एक नया निर्देश जारी किया है. अब सुबह 6 से रात 10 बजे तक कॉन्डम के विज्ञापन नहीं दिखाए जाएंगे. मंत्रालय का कहना है कि उन्हें शिकायत मिली थी कि बार-बार दिखाए जाने वाले कई विज्ञापन दर्शकों को असहज करते हैं. मंत्रालय ने कहा कि ये विज्ञापन बच्चों के लिए ठीक नहीं होते हैं. मंत्रालय ने केबल टेलीविज़न नेटवर्क रूल्स 1994 का हवाला भी दिया.

इन विज्ञापनों में सबसे ज्यादा आपत्ति मैनफोर्स कंपनी के विज्ञापनों को लेकर है. जिसकी ब्रैंड अंबैसेडर सनी लियोनी हैं. मंत्रालय ने जो अधिसूचना जारी की है उसमें कहा गया है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली सामग्री जो आपत्तिजनक, भद्दी, उत्तेजक ट्रीटमेंट दिखाती हो, को नहीं दिखाना चाहिए.'

इस खबर की बड़े अर्थों में बात की जानी चाहिए. क्योंकि यूएन की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार भारत 21 लाख एड्स मरीजों के साथ दुनिया में तीसरे नंबर पर था. सिर्फ एक साल के अंदर इस डेटा में लगभग 2 लाख नए एड्स मरीज जुड़ गए थे. दूसरा हमारी तेजी से बढ़ती आबादी भी एक समस्या है. चुनावी भाषणों में 'मेरे सवा-सौ करोड़ देशवासियों', सुनना भले ही अच्छा लगता हो, हकीकत में ये बड़ी समस्या है. इसलिए इस फैसले को दो अर्थों में देखा जा सकता है.

भारत में कॉन्डम का विज्ञापन स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण के लिए शुरू हुआ था. 1968 में पहली बार बड़े स्तर पर भारतीयों के लिए कॉन्डम और उसके प्रचार की जरूरत समझी गई. सरकार ने जापान, कोरिया और अमेरिका से 40 करोड़ कॉन्डम (प्रति व्यक्ति एक) की पहली खेप मंगवाई. IIM ने इसके प्रचार-प्रसार की प्लानिंग की और हिंदी में नाम ‘निरोध’ दिया गया और कीमत रखी गई 5 पैसे. एरनाकुलम के तब के डीएम एस कृष्ण कुमार ने इस कैम्पेन को इतनी ज़ोर-शोर चलाया कि लोगों ने उनका नाम ही ‘निरोध कुमार’ रख दिया.

मगर भारत में एड्स आने के बाद इसके विज्ञापन में कई बदलाव हुए. एक तरफ सरकार के निर्देश पर बने ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ और ‘बलवीर पाशा को एड्स होगा क्या?’ जैसे विज्ञापन थे. दूसरी ओर पूजा बेदी के आस्क फॉर केएस जैसे विज्ञापन.

आज भारत में कॉन्डम के विज्ञापनों से गर्भनिरोधन और एड्स छूने से नहीं फैलता जैसी बातें पीछे हटा दी गई हैं. इसकी जगह प्लेज़र ने ले ली. और आज के भारत में सनी लियोनी का चेहरा किसी भी प्रोडक्ट में जानबूझ कर जोड़ा जाता है. क्योंकि हममें से ज्यादातर भारतीय (जिनमें ये लिखने और पढ़नेवाला दोनों शामिल हो सकते हैं) सनी लियोनी को अक्सर उनके पॉर्नस्टार वाले पैकेज के साथ देखते हैं. सनी का पर्दे पर होने का मतलब है कि उन्हें एक खास अवस्था में इमैजिन करना. और कहीं न कहीं इसी इमैजिनेशन के कारण इन विज्ञापनों पर रोक लगी है.

कह सकते हैं कि अपनी गलतियों को सुधारने की जगह इलाज पर ही रोक लगा देना. आज हेल्थ इंडस्ट्री कॉन्डम को गर्भ निरोध या एचआईवी के नाम पर शायद ही बेचने के लिए तैयार हो. मगर इसको रोकने के लिए विज्ञापनों पर पाबंदी कहां की समझदारी है. और वो भी तब जब कई खबरें दावा करती हैं कि भारत का किशोर 14-16 के बीच पहली बार संबंध बनाने लगा है. सेनेटरी नैपकिन पर बनी फिल्म फुल्लू को एडल्ट सर्टिफिकेट दिया गया था. जबकि ये ऐसा विषय है जिसे 13-14 साल से बड़े स्कूली बच्चों को खास तौर पर दिखाया, समझाया जाना चाहिए.

इन सबके अलावा एक बात और भी है. हमारे टीवी सीरियल इच्छाधारी नागिन, बहू का मक्खी बन जाना, 3-4 लोगों का आपस में 15-20 बार शादी करना आम है. हमारे न्यूज़ चैनल खबर के नाम पर हनीप्रीत और इंसान की गुफा दिखाते हैं.

इनके कंटेंट को रोज देखने वाली महिलाओं, छोटे बच्चों की शब्दावली सुनिए. शादी, सौतन, पति की हत्या, शैतान और राक्षस जैसे शब्द खूब मिलेंगे. मगर इनपर कोई चर्चा नहीं होती. हमारी वर्तमान सूचना प्रसारण मंत्री इस तरह के कंटेंट के बारे में काफी अच्छी जानकारी रखती  हैं. हम उम्मीद कर सकते हैं कि वो कभी इस पर भी चर्चा करवाएंगी. तब तक याद रखिए कि अगली पीढ़ी को एचआईवी के बारे में सही समय पर सजग करना जरूरी है.

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