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सुकमा हमला: वो गलतियां जिसके चलते हमने गंवा दिए 25 जांबाज

सरकारी गलतियों की कीमत सीआरपीएफ के जवान भुगतने को मजबूर हैं

Updated On: Apr 25, 2017 10:33 PM IST

FP Staff

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सुकमा हमला: वो गलतियां जिसके चलते हमने गंवा दिए 25 जांबाज

हथियारों से लैस 200 से 300 आदमी पिछले चार-पांच दिनों से किसी इलाके में एक से दूसरी जगह मूव कर रहे हों और किसी को कानों कान खबर तक नहीं है. इस बात से ये समझा जा सकता है कि गलती कितनी बड़ी है. हम बात कर रहे हैं सुकमा नक्सली हमले की. उसी हमले की जिसमें सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए. इस हमले से पूरा देश आहत है. बड़े-बड़े मंत्रियों से लेकर देश का आम नागरिक तक जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है.

लेकिन कहीं न कहीं सब के मन में एक सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर गलती किसकी थी, चूक हुई तो हुई कहां, कैसे आखिर नक्सली दिन दहाड़े सुरक्षा बलों की टोली को निशाना बनाते हैं और कत्लेआम मचा कर चले जाते हैं.

आखिर सुकमा हमले में कहां गलती हुई कि हमने सीआरपीएफ के 25 जवान गंवा दिए. इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर और बीएसएफ के पूर्व डायरेक्टर जनरल रह चुके प्रकाश सिंह से बात की.

खामियों का किला भेद आसानी से निकल गए नक्सली

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प्रकाश सिंह बताते हैं कि ये हमला अनेक खामियों से होने वाली तबाही का एक छोटा सा उदाहरण है. जिसके लिए केंद्र, राज्य सरकार, स्थानीय पुलिस, खुफिया एजेंसियां और यहां तक की अपने जवान खोने वाली सीआरपीएफ भी जिम्मेदार है. हर किसी ने अपने-अपने स्तर पर बड़ी गलतियां की हैं.

कहां हुई है केंद्र सरकार से गलती?

पूर्व बीएसएफ डीजी ने कहा कि आखिर केंद्र सरकार को सीआरपीएफ के लिए डीजी (डायरेक्टर जनरल) की नियुक्ति करने में परेशानी क्या है. हज़ारों जवानों की फोर्स है और पिछले 50 दिनों से इस फोर्स का कोई मुखिया नहीं है. 28 फरवरी को पूर्व डीजी दुर्गा प्रसाद रिटायर हुए. फिर अब तक केंद्र ने किसी फुल टाइम डीजी की नियुक्ति क्यों नहीं की. फिलहाल डीजी का चार्ज सुदीप लखटकिया के पास है. लेकिन वो भी फुल टाइम डीजी नहीं हैं. ऐसे में निचले स्तर पर अनिश्चितता का माहौल बनना लाजमी है.

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राज्य सरकार से कहां हुई चूक?

राज्य सरकार नक्सलियों को लेकर कितनी सख्त है. इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्टेट इंटेलिजेंस को इस हमले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी. सिंह ने बताया कि आखिर कैसे इतना बड़ा हमला हो जाता है और स्थानीय पुलिस या राज्य के किसी भी सरकारी कर्मचारी पर एक खरोंच तक नहीं आती है. इससे लगता है कि राज्य सरकार के मन में ये धारणा है कि नक्सलियों से लड़ाई केंद्र की है, हमारा इसमें कोई लेना देना नहीं है, हम बस दूर से समर्थन करेंगे.

उन्होंने कहा कि अगर इस तरह के हमलों से बचना है तो राज्य पुलिस को आगे आकर चार्ज लेना होगा. पुलिस को केंद्रीय सुरक्षा बलों का समर्थन करना चाहिए. स्टेट इंटेलिजेंस को आईबी के भरोसे नहीं बैठे रहना चाहिए. क्योंकि आईबी सुकमा जैसे छोटे इलाकों की तुलना में मेट्रो शहर की सुरक्षा ज्यादा बेहतर ढंग से समझती है. जब इतने लोग एक साथ घूम रहे थे. तो इसका पता क्यों नहीं लगाया गया?

सबसे बड़ी गलती कहां हो रही है?

रिटायर्ड आईपीएस प्रकाश सिंह का कहना है कि मुश्किल ये है कि एक बार सुरक्षा बल अपने दम पर नक्सलियों को इलाके से खदेड़ भी देते हैं तो भी वो कुछ समय बाद वापस आ जाते हैं और इसके लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है.

किसी इलाके के नक्सल मुक्त होने के बाद भी उस इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्कूल, हॉस्पिटल और रोड जैसी बुनियादी सुविधाएं ठीक नहीं की जाती. ईमानदारी की कमी रहेगी तो लड़ेंगे क्या. इसी का फायदा उठाकर नक्सली फिर से उस इलाके में अपना डेरा जमा लेते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

कहां से मिलती है नक्सलियों को ताकत?

नोटबंदी के बाद से ही केंद्र सरकार कहती आ रही है कि इससे आतंकियों और नक्सलियों को सबसे ज्यादा चोट पहुंची है. काफी हद तक ये बात सच भी है. लेकिन हम ये कैसे भूल सकते हैं कि इनके इरादे इतनी आसानी से कमजोर होने वाले नहीं है.

प्रकाश सिंह ने बताया कि डिमोनेटाइजेशन से नक्सलियों के पास पैसे की कमी जरूर हुई है और बैकफुट पर हैं. लेकिन वो खत्म नहीं हुए हैं. तीन-चार हजार रुपए में इनका काम चल जाता है और खाने-पीने के लिए गांव वाले दे देते हैं.

कई नक्सली ऐसे भी हैं जिनकी जमीन ले ली गई या विकास कार्यों के लिए उनको उन्हीं के घर से बेघर कर दिया गया. इस तरह के मामले और कुछ नहीं बल्कि लोगों को कट्टरपंथ की ओर ढकेलते हैं और इन्हें मजबूत इरादे वाला नक्सली बनाने में अहम किरदार निभाते हैं.

कहां से लाते हैं हथियार?

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प्रकाश सिंह बताते हैं कि हथियारों के लिए नक्सलियों को चीन या पाकिस्तान नहीं जाना पड़ता है, बल्कि वो अपने ही देश में इसका जुगाड़ कर लेते हैं. उनका कहना है कि सीआरपीएफ के पास फर्स्ट कलास वैपनरी हैं, सेकेंड क्लास ट्रेनिंग है और शायद थर्ड क्लास लीडरशिप है.

इसका फायदा उठाकर नक्सली जब भी हमला करते हैं वो सीआरपीएफ की फर्स्ट क्लास वैपनरी से हथियार चुरा ले जाते हैं और मौका लगते ही उसका सुरक्षा बलों के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं.

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