S M L

सुकमा हमला: अवैध खनन और राजनीतिक फंडिंग से गहरे जुड़े हैं नक्सलियों के तार

अवैध खनन से नेता और अफसर तो मुनाफा कमाते ही हैं, इसके जरिए नक्सली उग्रवादी भी अपना धंधा चलाते हैं

Updated On: Apr 29, 2017 03:31 PM IST

RN Bhaskar RN Bhaskar
वरिष्ठ पत्रकार

0
सुकमा हमला: अवैध खनन और राजनीतिक फंडिंग से गहरे जुड़े हैं नक्सलियों के तार

24 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक सीआरपीएफ के डीआईजी ने कहा कि वो बहुत दिनों से सरकार से कह रहे थे कि वो बस्तर के इस इलाके में सड़कें बनाने का काम तेज करें.

डीआईजी ने इलाके में सड़कें बनाने की बेहद धीमी रफ्तार पर अफसोस जताया. जो सड़क कुछ दिनों में बनाई जा सकती थी, उसे बनाने का काम पिछले तीन साल से चल रहा था.

कुछ लोग इसे सरकार के कामकाज का तरीका कहकर इसे नक्सलियों के हमले के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं. वहीं कुछ जानकारों के मुताबिक ये सिर्फ अवैध खनन को जारी रखने के लिए किया जाता है. क्योंकि अवैध खनन से सरकारी अफसरों और नेताओं को फायदा होता है.

इसलिए किसी भी इलाके में विकास के संसाधन मुहैया कराने से नेता और अफसर दोनों परहेज करते हैं. इससे उनका अपना मुनाफा खत्म होने का डर जो रहता है.

नेताओं के फैसले की मार झेलता सुकमा

सुकमा तो उस बीमारी का दिखने वाला घाव भर है, जो मर्ज हिंदुस्तान को घुन की तरह खा रहा है. नेताओं के फैसले लेने या न लेने की नीयत का बदकिस्मती से यही नतीजा निकलता है कि दूर-दराज के इलाकों में बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं हो पाता. लोग गरीबी में जीने को मजबूर होते हैं. अपने हक से महरूम रहते हैं. उनका शोषण होता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

वहीं अवैध खनन से नेता और अफसर तो मुनाफा कमाते ही हैं. इसके जरिए नक्सली उग्रवादी भी अपना धंधा चलाते हैं. सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी यही हो रहा है.

इन राज्यों में अवैध खनन के मामले में महाराष्ट्र ने तो सबको पीछे छोड़ दिया है. आब छत्तीसगढ़ और झारखंड में स्थानीय लोगों से बात करें, तो इस सच का आसानी से पता चल जाएगा. वो आपको बताएंगे कि नक्सलियों को पैसा अवैध खनन करने वालों से ही मिलता है. वही नक्सलियों की आमदनी का मुख्य जरिया हैं.

आप कहेंगे कि अवैध खनन करने वाले नक्सलियों को क्यों पैसे देते हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि नक्सली उनसे पैसे लेकर उस इलाके में विकास की योजनाओं के विस्तार से रोकते हैं. वो सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनाने की राह में रोड़े खड़े करते हैं. क्योंकि ये सब बनेंगे, तो लोग आएंगे. स्कूल अस्पताल और सड़कें बनने के बाद वहां पर पुलिस स्टेशन बनेंगे.

लोगों के हाथ में अगर मोबाइल आ गए तो वो अवैध खनन की तस्वीरें बनाकर दुनिया के सामने रखेंगे. फिर अधिकारी कार्रवाई को मजबूर होंगे. इससे अवैध खनन का पूरा धंधा ही चौपट हो जाएगा.

इसीलिए अवैध खनन करने वाले, नक्सलियों को पैसे देकर विकास का काम होने से रोकते हैं. पर, सरकार क्यों बुनियादी ढांचे के विकास में ढिलाई बरतती है?

असल में इसकी वजह ये है कि अवैध खनन से सबसे ज्यादा फायदा नेताओं को होता है. इसीलिए उनकी दिलचस्पी दूरदराज के इलाके में विकास में नहीं होती है.

अवैध खनन मुनाफे वाला धंधा

coal

[तस्वीर-बिजनेस इनसाइडर]
अवैध खनन बेहद मुनाफे वाले धंधा है. सीबीआई के अपने रिकॉर्ड में इसका पूरा कच्चा चिट्ठा दर्ज है. शारदा चिट-फंड घोटाले की जांच के दौरान सीबीआई को पता चला कि इससे कमाई गई करीब एक हजार करोड़ रुपए की रकम, उत्तर-पूर्व के राज्यों में अवैध खनन के काम में लगाई गई थी.

ये महज इत्तेफाक नहीं कि पूर्वोत्तर के राज्यों में ज्यादातर हिंसक आंदोलन, बुनियादी ढांचे के विकास का विरोध करते हैं. पूर्वोत्तर में अवैध खनन के बारे में और विस्तार से आप बिजनेस इनसाइडर की इस रिपोर्ट से पा सकते हैं.

इसके अलावा जस्टिस शाह आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में 14 माइनर्स के खिलाफ सीबीआई जांच की सिफारिश की थी. इन सभी का ताल्लुक ओडिशा में अवैध खनन से था. ओडिशा में भी बुनियादी ढांचे के विस्तार के हिंसक विरोध की घटनाएं हम देख चुके हैं.

केवल झारखंड, ओडिशा और पूर्वोत्तर के राज्यों में ही अवैध खनन नहीं हो रहा है. अवैध खनन के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए हैं. लोकसभा में पेश किए गए सरकारी आंकडे इस बात की गवाही देते हैं.

ये आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में साल दर साल अवैध खनन के मामले सामने आने का सिलसिला बढ़ता ही गया है. मगर इससे निपटने में महाराष्ट्र का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है.

महाराष्ट्र में अवैध खनन कई तरह से होता है. सबसे ज्यादा बालू का अवैध खनन होता है. राज्य में निर्माण का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है. इसके लिए बालू की जरूरत होती है. जोकि वाजिब स्रोतों से पूरी नहीं हो सकती.

सरकार, बालू की जरूरतें पूरी करने का सही इंतजाम नहीं कर सकी है. न ही अवैध खनन करने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाती है. आवाज फाउंडेशन की सुमैरा अब्दुलाली ने महाराष्ट्र में अवैध खनन के तमाम आंकड़े जमा किए हैं.

जिनके आधार पर महाराष्ट्र सरकार कार्रवाई कर सकती है. लेकिन आरोपियों पर कार्रवाई के मामले में महाराष्ट्र की सरकार बेहद ढीली रही है.

naxal

महाराष्ट्र में भी उन इलाकों मे अवैध खनन की घटनाएं ज्यादा हुईं, जो नक्सलियों के गढ़ माने जाते हैं. इन इलाकों मे नक्सली अक्सर बुनियादी ढांचे के विस्तार की राह में रोड़े खड़े करते हैं.

कर्नाटक, आंध्र प्रदे, गोवा पर अक्सर इल्जाम लगता है कि उन्होंने अवैध खनन को बढ़ावा दिया है. मगर अवैध खनन सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में ही होता पाया गया है.

लोकसभा की रिपोर्ट इस बात की गवाही देती है. साल दर साल आंकड़े जाहिर करते हैं कि देश भर में हो रहे अवैध खनन का चालीस फीसद अकेले महाराष्ट्र में होता है.

संसद में पेश किए गए आंकड़ों से एक और बात पता चलती है. महाराष्ट्र सरकार अवैध खनन करने वालों के खिलाफ कोर्ट में केस भी नहीं करती. सरकार अक्सर अफसरों और अवैध खनन करने वालों के बीच ही मामला निपटाने की कोशिश करती है.

पड़ोस के मध्य प्रदेश में अवैध खनन के कम ही मामले सामने आए हैं. मगर आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने के मामले में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र से बहुत आगे है.

अदालत में मुकदमा करने की तुलना करें तो महाराष्ट्र की सरकार ने अवैध खनन करने वालों के खिलाफ कोर्ट में एक भी केस नहीं दाखिल किया. वहीं मध्य प्रदेश की सरकार ने खनन माफिया के खिलाफ करीब 29 हजार कोर्ट केस किए हैं.

यानी मध्य प्रदेश की सरकार महाराष्ट्र के मुकाबले अवैध खनन रोकने के लिए ज्यादा संजीदा दिखती है.

महाराष्ट्र में खनन माफियाओं का जाल

खनन माफिया से जुर्माना वसूलने के मामले में भी महाराष्ट्र फिसड्डी है. जबकि कम केस सामने आने के बावजूद गुजरात, महाराष्ट्र से इस मामले में आगे है. हां, ये सच है कि महाराष्ट्र में खनन माफिया की गाड़ियां ज्यादा जब्त की गई हैं. लेकिन इन गाड़ियों का फिर क्या हुआ, कुछ पता नहीं. क्योंकि सरकार के पास इनकी नीलामी का रिकॉर्ड तो नहीं है. साफ है कि महाराष्ट्र में खनन माफिया और प्रशासन मिल-बैठकर मामला सुलटा लेते हैं.

अवैध खनन की एक बड़ी वजह है कानूनी तरीके से खनन के ठेकों की कमी. लोकसभा में पेश की गई रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र में 1869 जगहों पर कानूनी तरीके से खनन की इजाजत है. इसके मुकाबले 2033 ठिकानों पर अवैध खनन हो रहा था. ये तो सिर्फ उन खनिजों के लिए था जिनकी ज्यादा मांग है. कम अहमियत वाले खनिजों की तलाश में 94651 जगहों पर अवैध खनन किया जा रहा था.

sukma

सबसे अहम बात तो ये है कि महाराष्ट्र सरकार, केंद्र को इस बात की जानकारी नहीं देती कि अवैध तरीके से राज्य में कितना खनिज निकाला गया है. इसमें से सरकार ने कितना जब्त किया.

सारे आंकड़े हमें एक ही नतीजे पर पहुंचने को मजबूर करते हैं. महाराष्ट्र सरकार न तो अवैध खनन रोकने को गंभीर है, और नही वो आरोपियों पर कार्रवाई करना चाहती है. न महाराष्ट्र सरकार, अवैध खनन में इस्तेमाल हो रही गाड़ियां जब्त करती है और न ही आरोपियों से सख्ती से जुर्माना वसूला जाता है.

महाराष्ट्र के मुकाबले छत्तीसगढ़ सरकार अवैध खनन रोकने के मामले में ज्यादा गंभीर दिखती है. फिर वो चाहे खनिज की जब्ती का मामला हो या आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई. ये बात और है कि छत्तीसगढ़ सरकार को भी अभी इस अवैध धंधे को रोकने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है.

अवैध खनन रोकने का सबसे अच्छा तरीका, दूर-दराज के इलाकों में बुनियादी ढांचे का विस्तार करना है. हम इन इलाकों में सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनाएं तो ज्यादा बेहतर होगा. विकास की सुस्त रफ्तार को तेज करना होगा. इसके अलावा आरोपियों पर सख्त कार्रवाई, उनसे भारी जु्र्माना वसूली भी अवैध खनन को रोकने में कारगर साबित हो सकती है.

25 जवानों की शहादत के बाद सरकार और अफसरों के पास अच्छा मौका है कि वो कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं, ताकि अवैध खनन को रोका जा सके. लेकिन मुनाफे का लालच नेताओं और अफसरों को ऐसा करने देगा, ऐसा लगता नहीं. लालच ऐसी चीज है, जिसके आगे इंसानों की जिंदगी की भी कोई कीमत नहीं. ये बेहद डरावना सच है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi