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7 सांसदों और 98 विधायकों ने बेतहाशा पैसा बनाया है

देश की बड़ी जांच एजेंसियों में से एक सेंट्रल डायरेक्ट टैक्स बोर्ड(सीबीडीटी) ने कुछ सांसदों और विधायकों पर नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Sep 12, 2017 06:39 PM IST

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7 सांसदों और 98 विधायकों ने बेतहाशा पैसा बनाया है

देश की बड़ी जांच एजेंसियों में से एक सेंट्रल डायरेक्ट टैक्स बोर्ड(सीबीडीटी) ने कुछ सांसदों और विधायकों पर नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी है. सीबीडीटी देश के कुछ ऐसे विधायकों और सांसदों की संपत्ति का ब्यौरा हासिल कर रही है, जिन्होंने पिछले कुछ सालों में बेहिसाब संपत्ति अर्जित की है.

देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर यह रिपोर्ट तैयार की जा रही है. सीबीडीटी की इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक गलियारे में खलबली मची हुई है.

सीबीडीटी ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा है कि शुरुआती जांच में 98 विधायकों और 7 सांसदों की चल और अचल संपत्तियों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. सीबीडीटी ने कोर्ट को बताया है कि आयकर विभाग ने इन सभी नेताओं की संपत्तियों की शुरुआती जांच की है.

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सीबीडीटी ने पिछले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह इस मामले में आगे भी जांच जारी रखेगा. सीबीडीटी इन नेताओं के नामों का खुलासा नहीं किया है.

लखनऊ के एक एनजीओ लोक प्रहरी ने सांसदों और विधायकों की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी पर रिपोर्ट सार्वजनिक की थी. एनजीओ ने कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर सरकार के रवैये पर सवाल खड़ा किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्दश दिया था कि सरकार उन सांसदों और विधायकों की संपत्ति की जांच कराए, जो चुनाव जीतते ही अकूत संपत्ति अर्जित कर लेते हैं.

एनजीओ लोक प्रहरी ने लोकसभा के 26 सांसद, राज्यसभा के 11 सांसद और 257 विधायकों की संपत्ति निर्वाचित होते ही तुरंत बढ़ जाने की एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी. एनजीओ की यह रिपोर्ट इन नेताओं के चुनाव लड़ने के दौरान दिए गए हलफनामे के आधार पर तैयार किया गया था.

जिसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा था कि सरकार एक तरफ चुनाव सुधार की बात करती है. पर दूसरी तरफ कोई भी काम समय पर पूरा नहीं करती.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता पी एस नरसिम्हा से कहा था कि क्या भारत सरकार का यही रवैया है? आजतक सरकार ने एनजीओ की इस रिपोर्ट पर क्या किया है?

सुप्रीम कोर्ट में एनजीओ ने याचिका दाखिल की थी इन लोगों की संपत्ति और आय के स्रोत को सार्वजनिक किया जाए. याचिका में न केवल विधायक और सांसदों की संपत्ति को सार्वजनिक करने की बात की गई थी बल्कि, विधायकों और सांसदों की पत्नी और बच्चों की संपत्ति और आय के स्रोतों को भी सार्वजनिक करने की मांग की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ही सीबीडीटी एनजीओ की इस रिपोर्ट पर सांसदों और विधायकों की संपत्तियों की जांच कर रहा है.

सीबीडीटी की शुरुआती जांच के बाद 7 सांसदों और 98 विधायकों के लिए आने वाले दिन कठिन साबित होने वाले हैं. इन विधायकों और सांसदों की संपत्ति पिछले चुनाव के दौरान दिए गए हलफनामे की तुलना में 500 गुना से ज्यादा बढ़ी है.

सीबीडीटी के मुताबिक तीन कैटेगरी में जांच रिपोर्ट तैयार की जा रही है. पहली कैटेगरी में जिन खामियों के बारे में जांच की गई, उसमें सात सांसदों और 98 विधायकों की संपत्ति आय से अधिक पाई गई है.

दूसरी कैटेगरी में उन मामलों की जांच की गई, जिसमें विधायकों या सांसदों की घोषित संपत्ति और आय के स्रोत में अंतर की बात की जा रही थी, पर जांच के बाद यह सही नहीं पाया गया. इस कैटेगरी में लोकसभा के 19, राज्यसभा के दो और 117 विधायक हैं.

तीसरी कैटेगरी में अभी भी सीबीडीटी की जांच चल रही है. आयकर महानिदेशक की जांच रिपोर्ट आना बाकी है. यानी जांच अभी लंबित है. इस श्रेणी में राज्यसभा के 9 सदस्य और 42 विधायक हैं.

सुप्रीम कोर्ट के सरकार को लताड़ लगाने के पीछे लखनऊ के एक गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी की मजबूत पहल रही है.

अगस्त 2003 में लोक प्रहरी एनजीओ की स्थापना चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य आयुक्त और गुजरात के गवर्नर रहे आरके त्रिवेदी की रहनुमाई में हुई थी.

Allahabad High Court

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश एस एन सहाय और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी जे एन चतुर्वेदी लोक प्रहरी के संरक्षक हैं.

गुड गवर्नेंस के मूल उद्देश्य को हासिल करने के लिए बनी इस संस्था ने पहले भी कई तरह के चुनाव सुधार के निर्णय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है.

साल 2013 में लोक प्रहरी के प्रयास के बाद ही 1951 से चले आ रहे जनप्रतिनिधित्व कानून में एक बड़ा बदलाव संभव हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने जन प्रतिनिधित्व कानून की एक धारा को निरस्त कर आपराधिक चरित्र के लोगों के लिए सियासत की मुश्किलें बढ़ा दी थी.

दो साल की सजा हुई तो जनप्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म कर दी जाएगी. इस फैसले के बाद कई दिग्गजों पर गाज गिरी थी.

जन प्रतिनिधित्व कानून में बदलाव से पहले जन प्रतिनिधि इसी धारा का इस्तेमाल कर अदालत में दोषसिद्ध साबित होने के बावजूद सत्ता में बने रहते थे, लेकिन इस फैसले के बाद ऐसा मुमिकिन नहीं हो सकता. लोक प्रहरी का कहना था कि जिस आधार पर हम किसी को चुनाव लड़ने से रोक सकते हैं, उसी आधार पर उसकी सदस्यता कैसे जारी रह सकती है.

इसके अलावा भी कई याचिकाओं के लिए लोक प्रहरी एनजीओ चर्चा में रही है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पूर्व सांसदों और विधायकों को मिलने वाली पेंशन और अन्य सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्यों न इन सुविधाओं को खत्म कर दिया जाए. एनजीओ का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति एक दिन के लिए भी सांसद बनता है तो उसे जीवन भर पेंशन का लाभ मिलता है. वहीं, उसके परिवार को भी इस बात का फायदा मिलता है. यह आम व्यक्ति पर बोझ की तरह है.

इसके साथ-साथ यूपी में उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्रियों को मिल रहे सरकारी बंगले के खिलाफ भी इस एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. 1997 में उत्‍तर प्रदेश सरकार द्वारा एक नियम बनाया गया था, जिसके अनुसार राज्‍य के मुख्‍यमंत्रियों को ताउम्र रहने के लिए टाइप फोर सरकारी बंगले दिए जाने की बात थी. जिसे अगस्‍त 2016 में कोर्ट ने रद्द कर दिया था.

इस फैसले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, समाजवादी पार्टी संस्थापक और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती समेत उत्‍तर प्रदेश के 6 पूर्व मुख्‍यमंत्रियों को दो महीने के भीतर लखनऊ में अपना बंगला खाली करना पड़ा था.

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