S M L

प्रदूषण संकट पार्ट 2: क्या किसानों को पराली जलाने से रोक पाना मुमकिन है?

उत्तर भारत की स्मॉग समस्या राज्यों के बीच बड़े तनाव का कारण बनती है. ऐसा लगता है कि इसने नेताओं, किसानों और यहां तक कि विशेषज्ञों को भी बेबस कर दिया है.

Updated On: Oct 13, 2018 09:06 AM IST

Arjun Sharma

0
प्रदूषण संकट पार्ट 2: क्या किसानों को पराली जलाने से रोक पाना मुमकिन है?

उत्तर भारत की स्मॉग समस्या राज्यों के बीच बड़े तनाव का कारण बनती है. ऐसा लगता है कि इसने नेताओं, किसानों और यहां तक कि विशेषज्ञों को भी बेबस कर दिया है.

पंजाब में धान की पराली जलाने से निपटने के सरकार के उपायों का बहुत मामूली फायदा मिला है. किसान कहते हैं कि फसल कटाई के मौसम के अंत में उनके पास खेतों को खाली करने के लिए पराली को जलाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है. इन किसानों में ज्यादातर कर्ज में डूबे हुए हैं

हालांकि हमेशा से ऐसा नहीं था. पंजाब के बरनाला जिले के फरवाही गांव के एक छोटे किसान 45 वर्षीय जगजीवन सिंह का मामला लें, जो कुछ साल पहले तक धान की पराली को हाथों से अलग करते थे और इसकी खाद बनाने के लिए अपने तीन एकड़ खेत के पास एक विशाल गड्ढे में भर देते थे. यह गेहूं की बुवाई के मौसम से पहले किया जाता था.

वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने किसानों को 10 जून के बाद ही धान की बुवाई करने का आदेश दिया था, ऐसे में कई अन्य किसानों की तरह जगजीवन ने भी देरी से बोई गई फसल के तुरंत बाद गेहूं की बुवाई के लिए खेत खाली करने को धान के पराली जलाना शुरू कर दिया था. वह कहते हैं, 'हम पराली जला कर प्रदूषण क्यों फैलाना चाहेंगे? लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, इसलिए हम इसे जलाते हैं.'

मोगा जिले के राजियाना गांव के एक अन्य किसान 42 वर्षीय बूटा सिंह की स्थिति भी ऐसी है, हालांकि फसल के अवशेष जलाने का उनके पास कारण अलग है. पिछले कुछ सालों से, पंजाब आने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या में कमी आने के साथ मजदूरी की लागत में बढ़ोतरी हुई है. अब बूटा सिंह के लिए फसल कटाई के बाद हाथों से अलग करना मुमकिन नहीं है.

सरकारी नीति की नाकामी

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि हर साल धान के अवशेष का 95% और गेहूं का 25% जला दिया जाता है. अध्ययन में कहा गया है, 'खरीदार नहीं होना, मजदूरों की कमी, अगली फसल का समय और राज्य सरकार की तरफ से बहुत मामूली मदद इस समस्या के प्रमुख कारण हैं.'

Stubble burning in Amritsar

पराली जलाने से रोकने के लिए पंजाब किसानों पर जुर्माना लगाने, पराली की सफाई के लिए मशीनरी पर सब्सिडी और उपग्रह इमेजरी के माध्यम से पराली-जलाने की निगरानी जैसे तरीके अपना रही है. लेकिन, पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय पूर्व प्रोफेसर और अर्थशास्त्री डॉ. ज्ञान सिंह, बताते हैं कि अधिकांश किसानों की माली हालत इतनी खराब है कि वे पराली को नष्ट करने के लिए न तो मानवीय श्रम और ना ही यांत्रिक श्रम का सहारा ले सकते हैं. डॉ. ज्ञान सिंह के अनुसार, 'सरकार को यह समझना होगा कि धान ऐसी फसल नहीं है जो पंजाब की थी. इसे हरित क्रांति के दौरान राज्य में लाया गया था और, इसे न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ, राज्य के फसल चक्र में दाखिला दिलाया गया.'

एफआईआर दर्ज करने और जुर्माना लगाने जैसी धमकियों से भी कोई मदद नहीं मिली. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पहले ही फसल के अवशेष जलाने वाले किसानों पर 2,500 से 15,000 रुपये तक के जुर्माने का आदेश दे रखा है. तारन जिले में धान की पराली जलाने पर हाल ही में आईपीसी की धारा 188 (सरकारी कर्मचारी द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवहेलना) के तहत चार किसानों का चालान किया गया था, जबकि 22 अन्य लोगों पर कुल 55,000 रुपए जुर्माना लगाया गया था. फिर भी, किसानों द्वारा पराली जलाना जारी है क्योंकि उनका मानना है कि पराली को नष्ट करने के लिए मशीनरी के इस्तेमाल पर आने वाला खर्च जुर्माने से ज्यादा पड़ेगा. राजनीतिक मजबूरियों के कारण भी पंजाब सरकार सख्त कार्रवाई करने में हिचकिचा रही है, क्योंकि किसान राज्य में एक मजबूत वोट बैंक हैं.

चीन की भी यही परेशानी है

हर साल, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अलावा, चीन की राजधानी बीजिंग भी भारी प्रदूषण के स्तर को लेकर खबरों में रहती है. भारत का पड़ोसी देश भी जहरीली हवा के लिए उसी वजह से परेशान है- फसल अवशेष जलाने से.

नासा की वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि परंपरागत रूप से, चीनी परिवार फसल अवशेष, खरपतवार, शाखाओं और पत्तियों के जैविक ईंधन को खाना पकाने या घरों को गर्म रखने के लिए हमेशा से एकत्र और भंडारण करते थे, और यह तरीका ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जारी है. लेकिन, 'हाल के वर्षों में, चीन में तेजी से हुए आर्थिक विकास और शहरीकरण के कारण, अगले सीजन की फसल लगाने के वास्ते खेतों को तैयार करने के लिए अक्सर फसल के अवशेषों को जला दिया जाता है.'

चीन की तरह, पंजाब ने कई उपायों को लागू करने की कोशिश की है. यहां एक कृषि नीति भी तैयार की गई है जिसमें फसल अवशेष की समस्या के समाधान के लिए निधि बनाने की बात कही गई है. ड्राफ्ट पॉलिसी में कहा गया है, 'इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की सलाह से फसल के अवशेषों के निपटारे के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण को अंतिम रूप दिया गया है. इसके अनुसार, अवशेष प्रबंधन समस्या को हल करने के वास्ते नए विचारों को आमंत्रित करने के लिए पराली निधि की घोषणा की गई है.'

सरकार और विशेषज्ञ इन समाधानों पर उलझन में हैं, जबकि किसानों का मानना है कि कारोबारी मकसद के लिए पराली का इस्तेमाल करने से ज्यादा मदद मिल सकती है. जगजीवन सिंह सुझाव देते हैं कि कागज उद्योग में धान की फसल के अवशेष का उपयोग करना एक अच्छा विचार हो सकता है. वह कहते हैं, ' सरकार को पेपर या कार्डबोर्ड उद्योग में उपयोग के लिए पराली खरीदने के तरीकों का रास्ता निकालना चाहिए.'

पीएयू के अध्ययन में किसानों द्वारा समस्या से निपटने के लिए सुझाए गए अन्य समाधानों का जिक्र किया गया था, जैसे कि डंठल का उपयोग पशु चारे के रूप में हो, 'हैप्पी सीडर' जैसी मशीनों पर सब्सिडी दी जाए, फसल की कटाई के दौरान कम मात्रा में डंठल छोड़ना, कार्डबोर्ड कारखानों में उपयोग, बिजली उत्पादन, खाद बनाने, और कम अवशेष पैदा करने वाली फसल की नई किस्में उगाई जाएं.

जिन सिफारिशों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है, उनमें से एक है कटाई के बाद धान का खेत पर ही निपटारा करना. पीएयू के कृषि विज्ञान केंद्र के सहायक प्रोफेसर डॉ. ओपिंदर सिंह संधू बताते हैं कि विश्वविद्यालय द्वारा कई मशीनें तैयार की गई हैं, जिसमें स्ट्रॉ चॉपर भी शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल खेत में ही इस्तेमाल किया जा सकता है. डॉ. संधू कहते हैं, 'कटाई के बाद पराली का उपयोग खाद, बायोगैस, मवेशियों के बिस्तर और मशरूम उगाने के लिए किया जा सकता है.'

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

पंजाब के गैरसरकारी संगठनों ने पराली जलाने के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है और वो किसानों से आग्रह कर रहे हैं कि वो अपने खेतों में आग न लगाएं. एक गैरसरकारी संगठन हेल्पिंग आर्मी के साहिबजोत सिंह चावला का कहना है कि राज्य को एक ऐसे पाप के बदनाम किया जा रहा है, जो इसने किया ही नहीं है. ये एनजीओ पंजाब के युवाओं को सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने को प्रेरित करता है.

चावला कहते हैं, 'राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकार को यह समझना चाहिए कि किसानों को विकल्प प्रदान किए जाने की जरूरत है ताकि वो फसल अवशेष को न जलाएं. इस बीच, हम राज्य के विभिन्न हिस्सों में लोगों को जागरूक कर रहे हैं और किसानों से इस वर्ष पराली नहीं जलाने के लिए कह रहे हैं.'

अर्थशास्त्री डॉ. ज्ञान सिंह के मुताबिक, समस्या का एकमात्र समाधान उन फसलों की खेती अपनाना है जो राज्य की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप हैं.

ये भी पढ़ें: प्रदूषण संकट पार्ट 1: दिल्ली पर फिर स्मॉग का खतरा क्योंकि किसानों के पराली जलाने के अलावा विकल्प नहीं

( स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर सक्रिय लेखक लुधियाना में रहते हैं और जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाताओं के अखिल भारतीय नेटवर्क 101Reporters.com के सदस्य हैं. )

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi