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'दुनिया भर में मानवाधिकार और पर्यावरण नियमों को ठेंगा दिखा रही है वेदांता'

24 साल का यह संघर्ष 22 मई को उस समय काफी दुखद स्तर पर पहुंच गया, जब पुलिस फायरिंग में 13 प्रदर्शनकारी मारे गए. इस घटना के बाद से थूथुकुडी में कर्फ्यू लगा है और इंटरनेट सेवाओं को 27 मई तक बंद कर दिया गया है

Greeshma Rai Updated On: May 27, 2018 08:48 AM IST

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'दुनिया भर में मानवाधिकार और पर्यावरण नियमों को ठेंगा दिखा रही है वेदांता'

तमिलनाडु के थूथुकुडी (तूतीकोरीन) में स्टरलाइट कॉरपोरेशन के खिलाफ काफी लंबे समय से आंदोलन चलता रहा है. इसमें स्थानीय लोग और पूरे राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ता एकजुट नजर आए हैं. स्टरलाइट की तरफ से नियमों के उल्लंघन के कारण बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलने के बावजूद सरकार के पूर्ण सहयोग से कंपनी का कामकाज जारी रहा. ऐसे में इसे बंद कराने की मांग को लेकर भी पूरे राज्य में नियमित स्तर पर विरोध-प्रदर्शन होते रहे हैं.

24 साल का यह संघर्ष 22 मई को उस समय काफी दुखद स्तर पर पहुंच गया, जब पुलिस फायरिंग में 13 प्रदर्शनकारी मारे गए. इस घटना के बाद से थूथुकुडी में कर्फ्यू लगा है और इंटरनेट सेवाओं को 27 मई तक बंद कर दिया गया है. मुमकिन है कि मौजूदा आक्रोश के कारण ही तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) को कार्रवाई करने और स्टरलाइट की कॉपर यूनिट की बिजली काट देने पर मजबूर होना पड़ा हो. बहरहाल, स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता लिमिटेड का इतिहास समझना जरूरी है.

नित्यानंद जयरामन तमिलनाडु के लेखक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. वो 15 साल से भी ज्यादा से वेदांता स्टरलाइट के पर्यावरण संबंधी अपराधों का दस्तावेज तैयार करने में लगे रहे हैं. जाहिर तौर वह इस मोर्चे पर संघर्ष का हिस्सा भी रहे हैं. लगातार वैधानिक और मानवधिकार उल्लंघन करने के बावजूद वेदांता लिमिटेड किस तरह से अपनी जवाबदेही से बच रही है, इस बारे में बारीकी से जायजा लेने के लिए फ़र्स्टपोस्ट ने जयरामन से बात की. पेश है इस बातचीत के अंश...

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पिछले दिनों भड़की हिंसा में 13 लोगों की मौत हो गई थी

तमिलनाडु के तूतीकोरीन में पिछले दिनों भड़की हिंसा में 13 लोगों की मौत हो गई थी

फ़र्स्टपोस्ट: स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता भारत में जहां भी काम कर रही है, उन तमाम जगहों पर वह मुश्किल में जान पड़ती है. क्या आप भारत में वेदांता के ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में और जानकारी दे सकते हैं?

नित्यानंद जयरामन: वेदांता का मानवाधिकार और पर्यावरण के मामले में न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर में विवादास्पद रिकॉर्ड रहा है. यह बात नार्वे पेंशन फंड से संबंधित जानकारी के जरिए भी जाहिर होती है. यह दुनिया के सबसे बड़े पेंशन फंडों में से एक है. नार्वे पेंशन फंड की एक एडवाइजरी संस्था है, जिसका नाम नार्वे काउंसिल एथिक्स है. यह संस्था अलग-अलग कॉरपोरेट स्टॉक की जांच कर यह पता करती है कि फंड में निवेश के लिए कौन सा स्टॉक सक्षम है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि नार्वे के कानून के मुताबिक, सरकारी पैसा वैसे स्टॉक में नहीं निवेश किया जाना चाहिए, जिन पर पर्यावरण और मानवधिकार संबंधी उल्लंघनों के मामले चल रहे हैं. इस फंड ने 2007 से ही वेदांता को ब्लैकलिस्ट कर रखा है. इसकी वजह इस कंपनी के न सिर्फ भारत बल्कि जाम्बिया, ऑस्ट्रेलिया और उन बाकी मुल्कों में इन नियमों के उल्लंघन के मामले हैं, जहां उसका कामकाज है.

भारत में ज्यादा उल्लेखनीय मामले वैसे हैं, जहां सामुदायिक स्तर पर बड़ा संघर्ष देखने को मिला है. ऐसा ही एक मामला ओडिशा के कालाहांडी जिले के नान्जीगढ़  में मौजूद एल्युमीनियम स्मेल्टर से जुड़ा है. एक और मामला नियामगिरी की पहाड़ियों में कंपनी की प्रस्तावित बॉक्साइट खानों के खिलाफ विरोध और संघर्ष का है. यह जगह भी ओडिसा के कालाहांडी जिले में ही मौजूद है. इन दोनों परियोजनाओं का वहां के स्थानीय लोगों ने जोरदार विरोध किया. दोनों मामलों में कंपनी गंदा काम करने, परियोजनाओं पर काम सुनिश्चित करने के लिए सरकार और पुलिस को नियुक्त करने में सफल रही. जाहिर तौर पर परियोजनाओं पर काम नहीं हो सका, जो एक अलग कहानी है. हालांकि, इस प्रक्रिया में वेदांता के दुनिया की अहम नॉन-फेरस मेटल मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के तौर पर उभरने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय बर्बाद हो चुके हैं, आजीविका के स्थानीय साधन बिखर गए हैं और स्थानीय समुदायों के लोगों को अपराधी माना जा चुका है. किसी भी तरह की असहमति को अपराध बना दिया गया है. कंपनी की जहां कहीं भी एंट्री हुई है, राज्य और उसके लोगों के बीच रिश्ते खराब हुए हैं.

22 मई की तारीख शायद जनता और राज्य के बीच रिश्ते बिगड़ने का चरम थी. इसे एक ऐसे खिलाड़ी द्वारा बढ़ावा दिया गया, जो सभी जगहों पर सक्रिय है, चाहे वो ओडिशा हो, छत्तीसगढ़ या तमिलनाडु. या फिर गोवा जहां भी खदानों के कारण राज्य और लोगों के बीच काफी विवाद हो गया है. खास तौर पर नियामगिरी में कंपनी के कारनामों के परिणामस्वरूप ऐसे समुदाय की खोज हुई, जो पूरी तरह से मुख्यधारा से कटा रहा है. डोंगरिया कोंड नामक यह समुदाय नियामगिरी की पहाड़ियों में रहता है और पहाड़ को भगवान मानता है. वेदांता द्वारा चोटी पर खुदाई करने पर इस समुदाय ने इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी. यह बेहद छोटा समुदाय है और इसके लोगों ने उन साधनों के साथ लड़ाई लड़ी, जिनके बारे में उन्हें पता था. पूरे समुदाय को अपराधी मान लिया गया. उनके नेता नादो सिकाका को पुलिस ने पकड़ कर प्रताड़ित किया और उसके बाद उन्हें गांव वापस भेज दिया गया. वह काफी मुखर थे और अपने समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर बात करते थे.

ऐसा बार-बार हुआ है. कई और लोग सिर्फ इसलिए पुलिस की हिंसा के शिकार हुए हैं, क्योंकि उन्होंने वेदांता को चुनौती दी. थूथुकुडी में भी पुलिस लड़कों को उनके घर से उठा रही है. अब भी राज्य (सरकार) कंपनी के प्रति समर्पित है और उन्होंने अब तक अपने लोगों के लिए काम करना शुरू नहीं किया है.

तूतीकोरीन विरोध का एक दृश्य

तूतीकोरीन में भड़की हिंसा और स्थानीय निवासियों के विरोध का एक दृश्य

फ़र्स्टपोस्ट: सभी कंपनियों को कामकाज शुरू करने के लिए राज्य के तमाम विभागों से वैधानिक मंजूरी हासिल करना जरूरी है?

नित्यानंद जयरामन: हमें इस अहम चीज को समझने की जरूरत है कि कंपनी के पास काफी पैसा है. वैसी किसी भी कंपनी जिसके पास पर्याप्त पैसा और अपनी मर्जी लादने की इच्छा हो, भारत में इस तरह की चीजें कर सकती है. हम इसे इस तरह से नहीं देखें कि वेदांता एकमात्र ऐसी कंपनी है, जो नियमों को नजरअंदाज कर रही है. आम तौर पर बड़ी कंपनियां जो चाहती हैं, वह करवा लेती हैं. कावेरी डेल्टा में पब्लिक सेक्टर इकाई ओएनजीसी 183 हाइड्रो कार्बन एक्सट्रैक्शन कुंओं को ऑपरेट करती है. कंपनी के पास एक भी ऐसे कुंए को ऑपरेट करने का लाइसेंस नहीं है. ऐसा कैसे होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यह बड़ी कंपनियां हैं. गलती करने वाली बड़ी इकाइयों से अदालत द्वारा कभी पूछताछ नहीं की जाती है.

दरअसल, सब कोई इन लोगों के साथ काम करता है. सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में थूथुकुडी के कॉपर स्मेल्टर प्लांट से संबंधित केस की सुनवाई की. मामले की 3 साल तक सुनवाई करने के बाद अदालत ने पाया कि कंपनी ने पर्यावरण नियमों का उल्लंघन किया है, पर्यावरण को प्रदूषित किया है, ज्यादातर कार्यकाल में बिना लाइसेंस के ऑपरेट किया और सुप्रीम कोर्ट समेत विभिन्न वैधानिकों इकाइयों को झूठी जानकारी दी. इस तरह की तमाम टिप्पणियों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट 100 करोड़ के जुर्माने के भुगतान के बाद यह कहते हुए कंपनी को ऑपरेशन शुरू करने की इजाजत दे देती है कि भारत को तांबे (कॉपर) की जरूरत है. यह पूरी तरह से दो अलग चीजें हैं. तांबे की जरूरत के लिए आप लोगों को मार सकते हैं, प्रदूषण फैला सकते हैं, आप जो चाहें, कर सकते हैं. इस देश की सर्वोच्च अदालत ने यही संदेश दिया है. जब पर्यावरण पर ध्यान और निगरानी की अहमियत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की इस तरह की राय है, तो इस मामले पर उदासीन रहने के लिए हम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या जिले के कलेक्टर को कैसे दोष दे सकते हैं?

फ़र्स्टपोस्ट: यानी वो सब साथ मिलकर चल रहे हैं?

नित्यानंद जयरामन: वो सांठगांठ कर काम करेंगे. उन्हें बखूबी यह पता है कि अगर आप एक बड़ी कंपनी हैं, तो सुप्रीम कोर्ट लाइसेंस के बारे में परवाह नहीं करता. अगर आपकी बाजार हिस्सेदारी 30 फीसदी है, तो कोई भी कानून आपको परेशान नहीं करेगा. हालांकि, अगर आप छोटे उद्यमी हैं और येन-केन प्रकारेण अपना मकसद पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो अदालत आपको किताब दिखाएगी, यह बताएगी कि न्याय का क्या मतलब होता है, पर्यावरण पोषण के मायने क्या होते हैं. मैं चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट थूथुकुडी में वेदांता की रिफाइनरी के बारे में बात करे. हमने इस मुद्दे पर उनकी बात सुनी है और उनका फैसला काफी दयनीय है.

फ़र्स्टपोस्ट: वेदांता ने बार-बार कहा है कि उसने नियमों का पालन किया है. मिसाल के तौर पर उनका मुख्य दावा यह रहा है कि स्टरलाइट सिपकॉट इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स की सीमाओं के अंदर है?

नित्यानंद जयरामन: उससे क्या होता है? मसला यह है कि क्या SIPCOT (सिपकॉट) इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स बेहद खतरनाक कैटेगरी वाले उद्योगों से निपटने की खातिर तमाम साधनों से लैस है? इसका जवाब है- नहीं. कोई इस तरह का आकलन कैसे पेश कर सकता है? मास्टर प्लान पर निगाह दौड़ाने से आपको इस बारे में पता चलेगा. लाल कैटेगरी वाले उद्योगों को सिर्फ वैसे इलाकों में लगाने की इजाजत है, जिन्हें खास तौर पर स्पेशल इंडस्ट्रीज की खातिर खतरनाक इस्तेमाल वाले जोन की तरह चिन्हित किया गया है. तमिलनाडु के शहरों के प्रबंधन के लिए 1971 में बना कानून ऐसा ही कहता है. जब आप मास्टर प्लान पर नजर डालेंगे, तो सिपकॉट इंडस्ट्रियल एस्टेट का एक हिस्सा सामान्य और हल्के उद्योगों के लिए है. बाकी एस्टेट में खेती योग्य जमीन है, जिसे अब तक औद्योगिक इस्तेमाल के लिए भी नहीं बदला गया है, स्पेशल या खतरनाक इंडस्ट्रीज की तो बात दूर है. लिहाजा, यहां पर वो जिला प्रशासन के साथ सांठगांठ कर स्थानीय जमीन का इस्तेमाल इन अवैध गतिविधियों करने में सफल रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: हां, क्योंकि टीएनपीसीबी के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2004 में भी वेदांता द्वारा मंजूरी हासिल किए बिना एक और फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनाने की बात है, लेकिन अब भी उन्हें दोषी नहीं माना गया?

नित्यानंद जयरामन: यह सही है.

फ़र्स्टपोस्ट: और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आधिकारिक तौर पर दर्ज इन उल्लंघनों के काफी बाद आया?

नित्यानंद जयरामन: हां, काफी बाद में आया. हालांकि, आम तौर पर मुद्दा यह नहीं है कि स्टरलाइट के पास अब लाइसेंस है या नहीं. पहले लाइसेंस हासिल करना पड़ता है. हालांकि, स्टरलाइट के मामले में लाइसेंस से पहले नियमों का उल्लंघन हुआ है. इसका मतलब यह है कि वो पहले नियमों का उल्लंघन करेंगे और उसके बाद लाइसेंस के लिए इंतजार करेंगे. नतीजतन, तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जल्दबाजी में उन्हें लाइसेंस दे देता है.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या यह साफ तौर पर सजा से मुक्ति का मामला नहीं है?

नित्यानंद जयरामन: ज्यादातर बड़ी कंपनियां इसका लाभ उठाती हैं. विशेष तौर पर वेदांता के मामले में यह और खुल्लम-खुल्ला है, क्योंकि कॉपर स्मेल्टर दुनिया भर में काफी गंदी इंडस्ट्री है. मैं सिर्फ वेदांता का नाम नहीं ले सकता और यह नहीं कह सकता हूं कि उनका कॉपर स्मेल्टर प्रदूषणकारी है. उनका कॉपर स्मेल्टर कम या ज्यादा प्रदूषणकारी हो सकता है, जो विभिन्न चीजों पर निर्भर करता है. यहां मसला यह है कि इस तरह के बड़े कॉपर स्मेल्टर आम तौर पर शहरी इलाकों से दूर स्थित होते हैं, लेकिन यहां यह नगर निकाय की सीमाओं के अंदर मौजूद है. अगर कोई यह दलील पेश करता है कि 1996 में इस बारे में ज्यादा जागरूकता नहीं थी, तो यह ठीक है. हालांकि, अब केंद्र और राज्य सरकारों ने शहर की सीमाओं के भीतर इस प्लांट की क्षमता को दोगुना कर दिया है. यह संकट को बुलाने जैसा है, खास तौर पर जब हम पहले ही भोपाल गैस कांड जैसी त्रासदी को झेल चुके हैं.

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फ़र्स्टपोस्ट: प्रदर्शन और हालिया हत्याओं पर वेदांता के आधिकारिक जवाब को लेकर आप क्या सोचते हैं?

नित्यानंद जयरामन: स्टरलाइट के सीईओ पी रामनाथ यह कहते रहते हैं कि नहर-नाले प्रदूषित हो रहे हैं, न कि अन्य जल इकाइयां. ऐसा लगता है कि अनिल अग्रवाल ने कुछ ऐसी चीज को लेकर माफी मांगी है, जो बहुत अच्छी है और यह एक अभूतपूर्व कदम है. और वह आम तौर पर गलती या दुख नहीं महसूस करते. हालांकि, दो दिन पहले मैंने कंपनी की प्रेस विज्ञप्ति देखी, जिसमें जो मौते हुईं, उसका जिक्र तक नहीं है. यह बेहद असंवेदनशील प्रेस विज्ञप्ति है, जिसमें सिर्फ फैक्ट्री और उसके अहाते की बात की गई. इसमें कहा गया है कि स्टरलाइट अपनी फैक्ट्री और इसके आसपास रह रहे कथित समुदाय की सुरक्षा की उम्मीद करती है.

इस चेहराविहीन समुदाय की सुरक्षा को खतरा आंदोलनकारियों, बाहरी प्रदर्शनकारियों या पुलिस से नहीं बल्कि खुद स्टरलाइट से है. प्रदर्शनकारी भी यही बात कह रहे हैं. उनके मुताबिक, सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर नहीं बल्कि स्टरलाइट की तरफ से कार्रवाई की. स्टरलाइट जीरो कचरे की बात कर यह बता रही है कि उसकी इंडस्ट्री के कारण स्वास्थ्य पर किसी तरह का खराब प्रभाव नहीं है. कंपनी के जरिए यह भी बताया जा रहा है कि थुथूकुडी में दूसरी जगहों के मुकाबले कैंसर के मामलों का आंकड़ा काफी कम है. हमें अपनी कैंसर रजिस्ट्री की गुणवत्ता के बारे में पता है. भारत में विज्ञान की गुणवत्ता के बारे में भी हम जानते हैं. समस्या से निपटने के लिए केंद्र या राज्य सरकारें वैज्ञानिक तरीके से काम नहीं करती हैं. यहां तक कि आज की तारीख में भी अगर आप भोपाल जाकर साउंड टेक्टिोलॉजिकल रिपोर्ट की मांग करेंगे, तो आपको यह रिपोर्ट नहीं मिलेगी. दरअसल, भारत सरकार ने 1990 के दशक में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) को इस सिलसिले में सभी मेडिकल जांच और अध्ययन बंद करने को कहा था. आईसीएमआर द्वारा अंतर-पीढ़ी संबंधी दिक्कत समेत कई गंभीर समस्याओं के सबूत पाए जाने पर भारत सरकार ने इस बाबत स्टडी बंद करने का निर्देश जारी किया गया था. आम तौर पर भारत सरकार कह देती है कि कोई सबूत नहीं है, लेकिन वो प्रमाण इकट्ठा करने के लिए कुछ नहीं करेंगे. अब भी ऐसा ही किया जा रहा है.

कैंसर को लेकर शिकायत 14 साल पहले 2004 में शुरू हुई. उस वक्त तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्टरलाइट को व्यापक स्वास्थ्य अध्ययन कराने को कहा. लोगों और तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दबाव के कारण 4 साल बाद स्टरलाइट ने आखिरकार 2008 में स्वास्थ्य संबंधी अपना अध्ययन पेश किया. स्वास्थ्य संबंधी यह अध्ययन तिरूनेलवेली के सरकारी मेडिकल कॉलेज द्वारा किया गया था. इसमें सांस संबंधी, मांसपेशी-ढांचा संबंधी और माहवारी से जुड़ी गड़बड़ियां पाई गईं और इनका संबंध इलाके में मौजूद उद्योगों से बताया गया. स्टरलाइट इस इलाके की सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. सामान्य तौर पर जब आपके पास इतना अहम संभावित सबूत होता है, तो यह किसी तरह की समस्या की मौजूदगी की तरफ इशारा करता है. मैं अहम सबूत की बात इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि तमिलनाडु के बाकी हिस्सों के मुकाबले थूथुकुडी में सांस संबंधी दिक्कतों के मामले ज्यादा हैं. संभावित इसलिए कि समस्याओं की ठीक-ठीक प्रकृति के बारे में अब तक पक्के तौर कुछ सामने नहीं आया है. इसके बाद वैज्ञानिक सोच वाले किसी भी समाज के लिए सामान्य बात यह होती कि वह इस बारे में और गहरा अध्ययन करता. हालांकि, 2008 से अब तक 10 साल बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने इस मामले को देखने के लिए अब तक एक भी अध्ययन की इजाजत नहीं दी है. यह चीजें हमें बताती हैं कि चूंकि स्टरलाइट ने सरकार पर काफी पैसा खर्च किया है, लिहाजा सरकार भी यह नहीं पता लगाना चाहती कि जनता के साथ क्या हो रहा है. फर्ज कीजिए कि आपके परिवार में कोई शख्स किसी बीमारी से जूझ रहा है और 10 साल तक आप उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जाते. या आप यह पता लगाने की कोशिश नहीं करते कि उन्हें क्या हुआ. थूथुकुडी में कुछ इसी तरह की स्थिति है.

वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल (फोटो: रॉयटर)

वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल (फोटो: रॉयटर)

फ़र्स्टपोस्ट: अनिल अग्रवाल लगातार जोरदार तरीके से यह कहते रहे हैं कि किस तरह से कंपनी भारत की आयात पर निर्भरता कम से कम करने के लिए हरमुमकिन कोशिश कर रही है और रोजगार सृजन के लिए भी उन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए- चाहे इस केस की बात हो या भारत में दूसरी परियोजनाओं का मामला?

नित्यानंद जयरामन: जनता के हित के लिए कोई कंपनी नहीं बनाई जाती है. कंपनी अधिनियम के तहत कानूनी इकाई के तौर पर इसका गठन होता है, जिसका मकसद अपने शेयरधारकों को ज्यादा से ज्यादा रिटर्न देना है. यह कंपनी या कॉरपोरेशन का धर्म है और उन्हें इस काम को कानूनी तरीके से अंजाम देना होता है. कानून भी यही चाहता है. शौचालय बनाने, स्वच्छ भारत को प्रायोजित करने या थूथुकुडी पुलिस के लिए सीसीटीवी कैमरा खरीदने की खातिर कंपनी की जरूरत नहीं होती है. यह कंपनी का काम नहीं है. अगर कंपनी ऐसा काम कर रही है, तो मुमकिन है कि यह उसके बिजनेस से जुड़ा हो. शायद उसके बिजनेस के लिए यह जरूरी हो, क्योंकि ऐसे में पुलिस को वैसा करने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि उसने कुछ दिन पहले किया. लिहाजा, जिस तरह की सुरक्षा उन्हें (कंपनी) मिलती है, उसके लिए थूथुकुडी पुलिस की खातिर सीसीटीवी कैमरा खरीदना काफी छोटी कीमत है.

स्टरलाइट का काम तांबा तैयार करना है. स्टरलाइट की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि उसके शेयरधारकों के साथ धोखा या गलत व्यवहार नहीं हो. इस मामले में स्टरलाइट ने इस तरह की जिम्मेदारी नहीं निभाई है और वो अपने शेयरधारकों के साथ भी वफादार नहीं रहे हैं.

अगर वेदांता की दिलचस्पी भारत और इस देश के विकास में है, तो उसका ठिकाना लंदन क्यों है? इसके संस्थापक बिहार से हैं, उन्होंने कंपनी का मुख्यालय वहां क्यों रखा है? जीडीपी का बड़ा हिस्सा यहां क्यों नहीं दिखता है? इसे ब्रिटेन के जीडीपी के अंदर क्यों रखना या शामिल करना पड़ा?

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