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2जी: राजस्व कमाने से ज्यादा जरूरी है सभी तक नेटवर्क पहुंचाना- मिलिंद देवड़ा का लेख

मिलिंद देवड़ा ने 2011 में बतौर दूरसंचार राज्यमंत्री कार्यभार संभाला था

Updated On: Dec 30, 2017 03:39 PM IST

Milind Deora Milind Deora

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2जी: राजस्व कमाने से ज्यादा जरूरी है सभी तक नेटवर्क पहुंचाना- मिलिंद देवड़ा का लेख

सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने जबरदस्त तरीके से सनसनीखेज बना दिए गए 2जी स्पेक्ट्रम केस पर 21 दिसंबर को अपना फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया. जाहिर तौर पर 1,552 पेज के फैसले में सबसे महत्वपूर्ण यह कथन था कि ‘घोटाला’ पूरी तरह गढ़ा हुआ था, जिसमें खालिस झूठ को तथ्य बनाकर पेश किया गया था.  स्पेशल कोर्ट के शब्दों में ‘हर किसी ने एक महा घोटाला देखा, जो कहीं था ही नहीं. कुछ लोगों ने बड़े शातिराना तरीके से कुछ चुनिंदा तथ्य इकट्ठा किए और चीजों को इस कदर बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया, कि उन्हें पहचान पाना भी कठिन हो जाए.’

मैं जुलाई 2011 में सरकार में दूरसंचार राज्यमंत्री के तौर पर शामिल हुआ था, यह ठीक वही समय था जब 2जी विवाद सामने आने के बाद सरगर्मियां चरम पर थीं. मैंने अपने मंत्रालय में काम शुरू किया तो, मेरे दिमाग में बिल्कुल साफ था कि मैं वस्तुपरक और पक्षपातहीन होकर अपने पूर्ववर्ती की नीति का अध्ययन करूंगा. वह ना तो मेरे मित्र थे, ना ही नजदीकी साथी- हम एक ही पार्टी से भी नहीं थे- इसलिए उनके द्वारा अपने मंत्रालय में किए गए निर्णयों का बचाव करने या गलत तरीके से समर्थन करने में मेरा कोई निहित स्वार्थ नहीं था.

मैं बस तथ्यों, जैसा कि पेश किए गए थे, को स्पष्ट करने और समझने को उत्सुक था, जिससे कि मैं खुद के लिए स्थिति का बेहतर तरीके से मूल्यांकन कर सकूं. मैंने अपने विश्लेषण को ए. राजा के नीतिगत फैसलों के गुण-दोष पर केंद्रित रखा. मंत्रालय में काम शुरू करने के बाद जल्द ही मैंने स्थिति का आकलन किया, और नतीजे पर पहुंचने की कोशिश की कि क्या सचमुच स्पेक्ट्रम की नीलामी समझदारी भरा फैसला था- एक ऐसी नीति जिसे हम कभी नहीं भूलेंगे कि यह यूपीए सरकार को वाजपेयी की एनडीए सरकार से विरासत में मिली थी- या यह एक नासमझी भरा फैसला था.

जो बात बिना किसी शक मेरे सामने साफ हो गई थी, वह यह थी कि सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता अधिकाधिक राजस्व कमाना नहीं था- इस मामले में निश्चित रूप से टेली डेंसिटी बढ़ाना मकसद था. ठीक उसी तरह जैसे बैंकिंग सेक्टर में प्राथमिकता वित्तीय समावेशन और लोगों तक वित्तीय सेवाओं की पहुंच होनी चाहिए.  टेलीकम्युनिकेशन के क्षेत्र में प्राथमिकता मोबाइल टेलीफोनी, ब्रॉडबैंड और हाई स्पीड इंटरनेट की उपलब्धता के लिए नेटवर्क मुहैया कराना होनी चाहिए.

पहली प्राथमिकता राजस्व नहीं

A Raja acquitted in 2G scam case

यह पूरा विचार कि एक सरकार के लिए पहली प्राथमिकता राजस्व कमाना होना चाहिए, झूठा और भ्रामक है. सरकार जहां एक तरफ स्पेक्ट्रम नीलामी से पैसा कमाती है, वहीं दूसरी तरफ टेलीकॉम कंपनियां सरकार को जिस पैसे की अदायगी करती हैं, वह तकरीबन पूरी तरह बैंकों से उधार लिया होता है. सरकार अगर नीलामी से राजस्व हासिल करती है तो ठीक इसी नीलामी के नतीजे में उसे कर्ज में डूबे बैंक को पूंजी की आपूर्ति के लिए अपनी दूसरे जेब से पैसे निकालने होते हैं.

2जी उलटफेर का एक असर यह भी है कि टेलीकॉम सेक्टर चार लाख करोड़ के कर्ज में डूब गया है, जिसमें एक हिस्सा नीलामी और लाइसेंस निरस्तीकरण का भी है. इसके साथ ही यह भी ध्यान में रखें कि अगर टेलीकॉम कंपनियां अच्छा कारोबार करती हैं तो राजस्व साझीदारी मॉडल के तहत उनकी कमाई या सीएजीआर (कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट) का 5-10 फीसद सरकार को मिलता है. इसके उलट अगर उनका कारोबार अच्छा नहीं होता है तो ना सिर्फ बैंक नुकसान उठाते हैं, बल्कि टेली डेंसिटी भी प्रभावित होती है और प्रतिकूल वित्तीय नतीजे का बोझ उपभोक्ता पर ही पड़ता है. इधर सरकार को राजस्व के नुकसान के साथ ही टेलीकॉम कंपनियों द्वारा भुगतान किए जाने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से भी हाथ धोना पड़ता है. मौजूदा समय में भारत का टेलीकॉम सेक्टर दुनिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला है.

सबसे जरूरी बात यह कि, एक फलता-फूलता टेलीकॉम सेक्टर, जिसकी पहचान टेली डेंसिटी और कनेक्टिविटी में लगातार बढ़ोत्तरी, उत्पादकता और रोजगार के मौके पैदा करने से होती है, अर्थव्यवस्था की सेहत को ताकत देता है. नीलामी के माध्यम से हासिल होने वाला ‘राष्ट्रीय’ लाभ उस प्रत्यक्ष भारी बोझ की तुलना में बहुत मामूली है, जिसका भार अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ता है. देश में टेलीकॉम सेक्टर की दशा और अर्थव्यस्था पर इसके खराब प्रदर्शन का असर खुद सारी कहानी कह देता है.

अदालत के फैसले से पहले खामोशी

2G Scam0

इस छह साल लंबे विनाश के दौरान- सरकार में मंत्री रहने के बावजूद- मैं विवादों की राजनीति तथा फैसले की वैधानिकता को लेकर अपने निर्णय पर खामोशी अख्तियार किए रहा. अदालत का फैसला आने के बाद मैं उसके इस नतीजे से सहमति जताता हूं कि सीएजी की रिपोर्ट ने हर एक (जिसमें - बीजेपी, आम आदमी पार्टी और इंडिया अगेंस्ट करप्शन भी शामिल है) के लिए खुराक और मौका मुहैया कराया, जिससे इन्होंने हालात को बुरी तरह सनसनीखेज सार्वजनिक तमाशे में तब्दील कर दिया और ₹ 1.76 लाख करोड़ रुपये का घोटाला बुन डाला.

एक कानफाड़ू, जहरीला माहौल बनाया गया और इतना कीचड़ पैदा कर दिया गया कि इस अफरातफरी में विपक्षी पार्टियों और राजनीतिक स्टार्टअप्स को फटाफट राजनीतिक लाभ बटोर लेने का मौका मिल गया. मैं सोचता हूं कि काश देश और अर्थव्यवस्था के वास्ते, संबंधित पार्टियों- मीडिया राजनीतिक दल, कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों ने सच सामने आने के लिए वैधानिक उपायों से उचित प्रक्रिया को चलने का मौका दिया होता. इस तमाशे को पैदा करने और झूठ का ईंधन झोंकने में तकरीबन हर कोई शामिल हो गया था, और अब अदालत ने पाया कि ‘घोटाला’ गढ़ा गया था. इसने ना सिर्फ कुछ लोगों को झूठे तरीके से जिम्मेदार बताया, बल्कि इसने भारत की प्रतिस्पर्धिता, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रणाली की विश्ववसनीयता को भी चोट पहुंचाई.

मेरे लिए इसका निजी सबक यह है, जिस पर मैं अपने साथियों और कांग्रेस के सदस्यों को भी ध्यान देने को कहूंगा, लगातार रणनीतिक और सक्रिय रूप से  झूठ का सामना करना बहुत जरूरी है. जैसा कि 2जी मामले से जाहिर है कि राजनीति के धंधे में ‘तथ्य’ गढ़ लेना तथा  छलावा देना बहुत आसान और जनता की सोच को बदलना बहुत मुश्किल.

जबकि सिद्धांत का दामन थामे रखना जरूरी है, खामोशी का नहीं- ऐसा करने से लंबे समय अंतराल में आप सही साबित हो सकते हैं, लेकिन छोटी अवधि में झूठ अपूर्णीय क्षति कर सकता है. ज्यादातर मामलों में अंत में सच की जीत होती है- हमारे देश का शक्तिशाली न्यायिक ढांचा यह सुनिश्चित करता है, लेकिन बीच की अवधि में इसकी अनुपस्थिति बहुत से लोगों का बहुत नुकसान कर चुकी होती है.

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