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सीवीसी के फैसले से राकेश अस्थाना को मिली कितनी ताकत?

सीवीसी के फैसले से सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच की जंग एक नए मोड़ पर पहुंच गई है. फैसले से राकेश अस्थाना थोड़े और मजबूत दिखाई दे रहे हैं.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jul 24, 2018 11:03 PM IST

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सीवीसी के फैसले से राकेश अस्थाना को मिली कितनी ताकत?

सीबीआई के अंदर चल रही अधिकारियों की लड़ाई में महकमे के दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी की टीम को केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) की तरफ से बड़ी राहत मिली है. सीवीसी प्रमुख केवी चौधरी ने तमाम अटकलों और आशंकाओं को दरकिनार करते हुए सीबीआई में नंबर- 2 की हैसियत रखने वाले स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की टीम के कुछ अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ा दिया है.

सीबीआई के वर्तमान निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की अदावत की खबरें पिछले दिनों खुल कर मीडिया में सामने आई थीं. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने पांच आईपीएस अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाया है. ज्वाइंट डायरेक्टर लेवल के तीन और दो डीआईजी लेवल के अधिकारी हैं. एवाईवी कृष्णा, एस. मनोहर अरामने और मनीष किशोर सिन्हा ज्वाइंट डायरेक्टर हैं, दो आईपीएस अधिकारी अनीष प्रसाद और अभिषेक शांडिल्य का भी कार्यकाल बढ़ाया गया है.

सीवीसी प्रमुख केवी चौधरी की अध्यक्षता वाली पैनल ने जिन आईपीएस अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला किया है उनमें एक डीआईजी लेवल के भी अधिकारी हैं, जिन्हें हाल ही में उनके होम कैडर वापस भेज दिया गया था. ऐसा कहा जा रहा है कि राकेश अस्थाना के दखल देने के बाद उस अधिकारी को वापस एक बार फिर से बुला लिया गया.

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पिछले दिनों ही इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने दावा किया था कि सीबीआई के भीतर ही दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अोहदे की लड़ाई छिड़ गई है. मामला इतना आगे बढ़ गया है कि एजेंसी यह तय नहीं कर पा रही है कि उसका असली बॉस कौन है?

सीबीआई के भीतर चल रही है इस लड़ाई में दूसरे अधिकारियों ने सीवीसी को पत्र लिख कर स्पष्ट करने को कहा था कि उसका असली बॉस कौन है. सीबीआई के इन अधिकारियों ने सीवीसी को पत्र में यह भी कहा था कि कई अधिकारी हैं, जिन्हें एजेंसी लाना चाह रही है लेकिन उनके खिलाफ कई विभागीय आरोप लगे हुए हैं. वैसे अधिकारियों के खिलाफ अब भी जांच भी चल रही है.

सीवीसी को लिखे पत्र में अधिकारियों ने कहा था सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ भी कई आपराधिक मामलों की जांच चल रही है. ऐसे में संस्था की ईमानदारी बरकरार रखने के लिए निदेशक की गैरमौजूदगी में राकेश अस्थाना अधिकारियों की भर्ती नहीं कर सकते.

राकेश अस्थाना पर लगे इन तमाम आरोपों को सीवीसी ने फिलहाल खारिज कर दिया है. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या वाकई में राकेश अस्थाना ही इस समय सीबीआई के सुप्रीमो हैं?

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राकेश अस्थाना

सीबीआई के कुछ अधिकारियों ने जो पिछले दिनों सीवीसी को लेटर लिखा था उसमें यह भी कहा गया था कि राकेश अस्थाना सीबीआई के डायरेक्टर बनने के लायक नहीं है. इस बात के सामने आने के बाद ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह पत्र सीबीआई के किसी वरिष्ठ अधिकारी कहने पर ही कुछ अधिकारियों ने लिखा है. इस पत्र के सामने आने के बाद सीबीआई में खेमेबाजी की बात खुलकर सामने आ गई.

दरअसल यह जंग आलोक वर्मा के डायरेक्टर बनते ही शुरू हो गई थी. आलोक वर्मा ने सीबीआई निदेशक बनते ही अपने कुछ करीबी अधिकारियों को सीबीआई में लाने की जुगत लगाई थी. वर्मा के डायरेक्टर बनने से पहले गुजरात कैडर के आईपीएस ऑफिसर राकेश अस्थाना पूर्णकालिक एक्टिंग डायरेक्टर के रूप में सीबीआई का काम देख रहे थे. उन्होंने नए अधिकारियों को सीबीआई में रखे जाने का विरोध किया और ध्यान दिलाया कि उन अधिकारियों पिछला रिकॉर्ड शक के घेरे में है.

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माना जाता है कि आईपीएस लॉबी में राकेश अस्थाना की एक साफ-सुथरी छवि है. लालू प्रसाद यादव से जुड़े चारा घोटाले की जांच हो चाहे अगस्ता वेस्टलैंड डील हो या फिर विजय माल्या बैंक फ्रॉड केस. राकेश अस्थाना इस सरकार के ही नहीं पिछली सरकारों में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के पसंदीदा अधिकारी रहे हैं. चाहे वह यूएन विश्वास हों या फिर कोई और अधिकारी.

गुजरात कैडर से आने के कारण राकेश अस्थाना को इस समय मोदी सरकार का करीबी माना जाता है. यही वजह है कि विभाग में बैठे अधिकारी और विपक्षी पार्टियां भी राकेश अस्थाना पर समय-समय पर निशाना साधती रहती हैं. हाल ही में कुछ रहस्यमय दस्तावेज और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जब्त की डायरी को आधार बनाकर उनके खिलाफ शिकायतों का अंबार लगाया जा रहा है.

यहां तक कि पिछले दिनों ही ईडी प्रमुख करनेल सिंह ने भी राकेश अस्थाना के खिलाफ अप्रत्यक्ष तौर से मोर्चा खोल दिया था.

राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा की अदावत को समझने के लिए घड़ी की सुई को एक साल पीछे लेकर चलते हैं. 2 दिसंबर 2016 से सीबीआई निदेशक का पद खाली चल रहा था. मोदी सरकार ने 1984 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को स्थाई निदेशक की नियुक्ति होने तक बतौर इंचार्ज डायरेक्टर बनाया था. उस समय मीडिया में निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर किसी का नहीं होना एक बड़ा मुद्दा बन गया था. विपक्ष और प्रशांत भूषण जैसे वकील इंचार्ज डायरेक्टर राकेश अस्थाना को लेकर बवाल काट रहे थे.

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मोदी सरकार ने आखिरकार जनवरी में आलोक वर्मा के नाम पर मुहर लगा दी. एक फरवरी 2017 को आलोक वर्मा सीबीआई के नए डायरेक्टर बन गए. माना जाता है कि मोदी सरकार की बहुत कोशिशों के बाद ही डायरेक्टर का चयन करने वाली कोलेजियम ने आलोक वर्मा के नाम पर मुहर लगाई थी. आलोक वर्मा का नाम डायरेक्टर की रेस में पहले से चल तो रहा था, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वर्मा का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में था.

वरिष्ठता क्रम में सबसे सीनियर आईपीएस आलोक वर्मा थे. आलोक वर्मा का दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के तौर पर कार्यकाल अच्छा था. इसलिए मोदी सरकार को लगा कि सीबीआई के डायरेक्टर के लिए आलोक वर्मा ही सही उम्मीदवार साबित होंगे.

दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बनने से पहले आलोक वर्मा तिहाड़ जेल के डीजी भी रह चुके थे. मिजोरम के भी पुलिस कमिश्नर रह चुके थे. हालांकि, इससे पहले आलोक वर्मा ने कभी सीबीआई में काम नहीं किया था. मोदी सरकार को लगा था कि राकेश आस्थाना जैसे अधिकारी पहले से ही सीबीआई में बैठे हैं जो काफी सुलझे हैं और आलोक वर्मा के आने से टीम और मजबूती होगी, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट.

केंद्र सरकार का यह निर्णय उस समय समझ से परे था. कहा जाता है कि नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी आलोक वर्मा के नाम पर असहमति जताई थी. क्योंकि उस समय के वर्तमान न्यायाधीश टीएस ठाकुर के रहते निदेशक की नियुक्ति करने वाली कोलेजियम की एक भी बैठक नहीं बुलाई गई थी.

सीबीआई को करीब से समझने वाले कुछ लोग यह भी कहते हैं कि सरकार उस समय जानबूझ कर कोलेजियम की मीटिंग टालना चाहती थी, ताकि किसी मनपसंद अधिकारी को निदेशक पद पर ला सके. टीएस ठाकुर के रिटायर होते ही कोलेजियम की बैठक में आलोक वर्मा का नाम तय कर लिया गया.

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