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दक्षिण का सूखा (पार्ट-1): खतरा जो नहीं दिख रहा, लेकिन आपके सिर पर खड़ा है

फ़र्स्टपोस्ट दक्षिण भारत के हर राज्य में गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत से पैदा हुई स्थिति के बारे में अपनी लेखमाला में आपको बताता रहेगा

Imran Qureshi Updated On: Apr 22, 2017 10:53 AM IST

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दक्षिण का सूखा (पार्ट-1): खतरा जो नहीं दिख रहा, लेकिन आपके सिर पर खड़ा है

संपादकीय नोट: दक्षिण भारत में जारी पानी के संकट पर केंद्रित आठ लेखों की श्रृंखला की यह शुरुआती कड़ी है. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में पानी की भारी किल्लत के बीच तकरीबन आपदा की हालत आन पहुंची है. इसके अलग-अलग पहलू पर अगले आठ दिनों में फ़र्स्टपोस्ट हिंदी पर लेखमाला प्रकाशित होगी.

दक्षिण भारत प्यास से बेहाल है- केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में भारी सूखा है और आंध्रप्रदेश व तेलंगाना सूखे के कगार पर खड़े हैं. फिलहाल लू की बड़ी गर्म लहर चल रही है, पानी के बच रहे संसाधनों पर लू की इस लहर का असर पड़ेगा.

एक तरफ केरल और तमिलनाडु अप्रत्याशित सूखे का सामना कर रहे हैं- विशेषज्ञों के मुताबिक बीते सौ सालों में इतना भयंकर सूखा इन राज्यों में नहीं पड़ा था, तो दूसरी तरफ कर्नाटक के उत्तरी जिलों में लगातार तीसरे साल पानी की किल्लत बरकरार है.

बारिश में 4 फीसदी की कमी के कारण 2016 के अक्तूबर महीने में आंध्रप्रदेश ने अपने 245 मंडलों को सूखा-प्रभावित घोषित किया. तेलंगाना साल दर साल पानी की कमी झेलता है और यह सूबा अपने तेलुगुभाषी पड़ोसी राज्य से कृष्णा और कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर लड़ाई में उलझा है.

तमिलनाडु में बद्तर हो रहे हैं हालात

देश के इस सबसे दक्षिणवर्ती राज्य में हालत बड़ी गंभीर है. तमिलनाडु में पानी का मुख्य जरिया उत्तरपूर्वी मॉनसून की बारिश है.

पिछले साल उत्तरपूर्वी मानसून की बारिश 62 फीसदी कम रही. मॉनसूनी बारिश के कम होने के बावजूद 2016 का साल सूबे में बगैर खास असर के गुजर गया क्योंकि 2015 के दिसंबर महीने में बाढ़ आई थी.

सूबे के ताल-तलैया, जलागार और भूगर्भीय जल लबालब भर गये थे. भूगर्भीय जलस्तर 2-3 मीटर ऊंचा उठ आया था.

इस साल गर्मी का कहर ज्यादा

लेकिन इस बार गर्मी का मौसम पूरी शिद्दत के साथ आया है. अभी तक चेन्नई तीन दिन लू की लहर के चपेट झेल चुका है.

तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर जा चुका है. साल के इस मौसम में तापमान इससे 3 डिग्री सेल्सियस कम रहता है.

विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में गर्मी इससे भी ज्यादा तेज पड़ेगी, तापमान अगले महीनों में 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच सकता है.

पड़ोसी राज्यों में भी सूखे की स्थिति है. लिहाजा तमिलनाडु के अधिकारियों को समझ नहीं आ रहा है कि पानी की कमी को कैसे दूर करें.

तमिलनाडु ने कावेरी नदी के पानी के बंटवारे के लिए लड़ाई ठानी लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा क्योंकि कावेरी नदी में इतना पानी ही नहीं है कि कर्नाटक उसे तमिलनाडु के लिए छोड़े.

मुश्किल से पसीजा दिल

water conservatrion

इस साल फरवरी महीने में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम ने पानी के लिए गुहार लगायी तो आंध्रप्रदेश का दिल पसीजा.

2 टीएमसी (थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट) पानी आंध्रप्रदेश ने तमिलनाडु के लिए छोड़ा.

लेकिन इतने भर से क्या होने वाला था, इतना पानी तो चेन्नई की जरुरत पूरा करने के लिए भी कम है.

तमिलनाडु के जलागारों में जलस्तर उनकी कुल संधारण-क्षमता का 5 फीसद है. चेम्बारम्बकम् और चोलावरम् जलागार से चेन्नई को पानी मिलता है, ये दोनों जलागार एकदम ही सूख चुके हैं.

मुश्किल हो रहा है जीवन

सूबे में अब खान-खदान में जमा पानी उपयोग में लाया जा रहा है. न्येवेली थर्मल पावर प्लांट (ताप विद्युत संयंत्र) और डिसेलिनेशन प्लांट ( पानी को लवणमुक्त करने के संयंत्र) के पानी से किसी तरह प्यास से बेहाल लोगों की जरुरतें पूरी की जा रही है.

भूजल का दोहन खतरनाक तेजी से हो रहा है, इस काम में स्थानीय शासन की संस्थाएं और नागरिक भी लगे हैं और अवैध पानी टैंकर चलाने वाले लोग भी.

इस वजह से भूजल-स्तर तेजी से घटा है. पूरे राज्य में भूमिगत जलस्तर 5-10 फीट नीचे चला गया है. जलापूर्ति में कटौती करनी पड़ी है.

तमिलनाडु पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड अधिकारी एस तिरुनावुक्करसु को फिलहाल सूबे के तमाम जलागार, झील और नदी के रख-रखाव का प्रभार सौंपा गया है.

वे बताते हैं कि ऐसा सूखा तो पिछले 110 साल से नहीं पड़ा. मौसम का मिजाज बार-बार सख्त हो रहा है और मौसम के मिजाज में हो रहे इस तेज बदलाव का रिश्ता जलवायु-परिवर्तन से है.

2015 जैसी बाढ़ अगले साल फिर आ सकती है या 2016 जैसी बारिश एक बार फिर देखने को मिल सकती है. हमें मौसम का अब ठीक-ठीक पता नहीं चलता. लेकिन अपनी तरफ से तैयारी पूरी रहनी चाहिए.”

पानी के लिए तरस रहा है केरल

केरल देवताओं का अपना देश कहलाता है और इसी देश से इंद्रदेव ने आंखें फेर ली हैं. केरल में पिछले 115 साल का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है. सूबे के निवासी बड़ी चिन्ता में हैं.

दक्षिण-पूर्वी मॉनसून (जुलाई से सितंबर) की बारिश सामान्य से 33.7 फीसद कम रही और उत्तर-पूर्वी मॉनसून (अक्तूबर से दिसंबर) की बारिश 61 फीसद कम हुई. ऐसे में सूबे में पानी की भारी किल्लत है.

केरल ज्यादातर जलविद्युत यानी पानी से पैदा की जाने वाली बिजली पर निर्भर है. सूखे की मार के कारण सूबे में पानी की आपूर्ति भी बाधित हुई है.

केरल में सबसे ज्यादा पनबिजली इडुकी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से पैदा होती है लेकिन इस परियोजना के पास अपनी कुल उत्पादन-क्षमता का 40 फीसदी पनबिजली पैदा कर सकने लायक पानी बचा है.

केरल को साल में 24 हजार मिलियन यूनिट्स (एमयू) बिजली की जरुरत होती है. इसमें केवल 7100 मिलियन यूनिट्स ही सूबे में तैयार होता है, शेष बिजली बाहर से मंगायी जाती है.

बुरी खबर यह है कि कम बारिश के कारण जल-भंडारण में कमी आई है. इस कमी के कारण केरल में 5200 मिलियन यूनिट्स ही बिजली तैयार हो पायेगी.

इसका मतलब हुआ कि 2000 मिलियन यूनिट्स बिजली बाहर से मंगानी होगी. केरल में बिजली-उत्पादन के सभी संयंत्रों का जायजा लेने पर पता चलता है 22 दिसंबर 2016 तक केवल 1988 एमयू बिजली तैयार हुई.

जबकि 2015 में इसी अवधि में 2754 एमयू और 2014 में 3246 एमयू बिजली तैयार हुई थी.

कर्नाटक के लिए मुश्किल है यह साल

पानी की किल्लत के लिहाज से यह साल कहीं ज्यादा सख्त साबित होने वाला है. कर्नाटक में कावेरी नदी की बेसिन के जिलों में सूखे की हालत इतनी गंभीर है कि जून महीने से शुरु होने वाला दक्षिण-पूर्वी मॉनसून चौथी बार भी लगातार नाकाम हुआ तो स्थिति भयंकर रुप ले सकती है.

पानी की कमी और बेरोजगारी की वजह से सैकड़ों की तादाद में ग्रामीण नगरों और कस्बों का रुख कर रहे हैं.

यही हालत पड़ोसी राज्यों में भी है. कावेरी नदी के पानी पर निर्भर जलागार सूख चुके हैं और बंगलुरु जैसों शहर प्यास से बेहाल हैं.

इसकी एक वजह है कि कर्नाटक के उत्तरी हिस्से में लू चल रही है और लगातार तीन सालों से यहां सूखे की स्थिति है.

पश्चिमी घाट से निकलने वाली कई नदियों का जलग्रहण क्षेत्र मालन्द इलाके में है और इस इलाके में मॉनसूनी बारिश 35 फीसद कम हुई है, सो सूबे की नदियों में भी पर्याप्त पानी नहीं है.

विशेषज्ञों की नजर से सोचें तो सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि पूरे दक्षिण भारत में किसी भी राज्य की सरकार दूरंदेशी से काम नहीं ले रही, सूखे की स्थिति से निबटने की इन राज्यों के पास कोई दीर्घकालिक नीति या योजना नहीं है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, बंगुलुरु के प्रोफेसर नरेन्द्र पाणि का कहते हैं कि किसी को पलायन की चिन्ता नहीं है, सरकार हड़बड़ी में किए जाने वाले समाधान तलाश रही है.

जरुरत किसानों के लिए बाजार कायम करने की है और साथ ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि चीजों की सामिलाती तौर पर एक जगह गणना की जा सके.

जरुरत लोगों को एक जगह लाने की है और शायद रेशम-उत्पादन के काम में गुणवत्ता बहाल रखने के लिए छांव-छप्पर की भी व्यवस्था करने की जरुरत है. दुर्भाग्य कहिए कि जिन उपायों पर चीन में अमल हो चुका है, हम उन उपायों को भी लागू करने में असफल हैं.”

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना का बुरा हाल  

आंध्रप्रदेश में पिछले साल बारिश सामान्य से 23 फीसदी कम हुई और यहां जलस्तर 14.34 मीटर नीचे चला गया है.

सरकारी सिफारिश के मुताबिक आदर्श स्थिति तो यही है कि जलस्तर 3 से 8 मीटर तक रहे.

राज्य में भूजल का खाली होता भंडार भरने के लिए एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘नीति संरक्षण उद्यमम्’ नाम से शुरु किया गया है.

रायलसीमा के अनंतपुर और कडप्पा जिले हमेशा सूखाग्रस्त रहते हैं. ऐसे इलाकों में सूखे की हालत पहले की तुलना में ज्यादा गंभीर नजर आ रही है. फसलें मारी जा रही हैं. आंध्रप्रदेश को केंद्र से 2816 करोड़ रुपये का एक राहत-पैकेज मिला है.

तेलंगाना में 2016 में औसत से ज्यादा बारिश हुई लेकिन यह सूबा अपने पड़ोसी आंध्रप्रदेश से कृष्णा और गोदावरी नदी के पानी में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ाई लड़ रहा है.

फिलहाल तेलंगाना में पानी की स्थिति नियंत्रण में है लेकिन तेलुगुभाषी दोनों ही राज्यों के लू की चपेट में आने के पूर्वानुमान हैं और दोनों ही सूबे की सरकार गर्मी की महीनों में मचने वाली पानी की किल्लत से निबटने की तैयारी में लगी हैं.

इन सूबाई सरकारों ने हालत से निबटने के लिए ढुलमुल रवैया अपनाया है और विशेषज्ञ इस रवैये की आलोचना कर रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि जल-संरक्षण के ठोस उपाय होने चाहिए. चेन्नई निवासी अर्थशास्त्री व्यंक्टेश अत्रेय कहते हैं कि जल-संरक्षण के टिकाऊ उपाय किए जाने चाहिए और सिंचाई की जरुरत को पूरा करने के लिए भी नये तरीके खोजने होंगे.

बेशक टैंकरों को गादमुक्त करने के सामुदायिक प्रयास किए जा रहे हैं और यह सराहनीय है लेकिन लेकिन इससे राज्य अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो जाता. काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए और बड़े पैमाने पर काम केवल सरकार के बूते की बात है.”

दक्षिण भारत में सूखे का कहर

पानी की किल्लत झेल रहे दक्षिण भारत में सामाजिक पूर्वाग्रह स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ रहे हैं.

मिसाल के लिए कावेरी डेल्टा इलाके में रहने वाली सामाजिक रुप से पिछड़ी और निरक्षर आबादी को लिया जा सकता है.

इस इलाके में दलित महिला के हाथ एकदम ही खाली हैं क्योंकि इलाके का भूस्वामी वर्ग इस स्थिति को बखूबी समझता है कि तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर लड़ाई चल रही है.

शहरों में भी स्थिति खास बेहतर नहीं है. गांव से रोजगार की तलाश में शहर पहुंचे लोगों को उम्मीद है कि नगर में आये हैं तो कम से कम यहां पानी जैसी बुनियादी जरुरत की सुविधा तो हासिल हो ही जायेगी.

लेकिन ऐसे लोगों के लिए गर्मी के महीने में शहर में जिंदगी गुजारना बहुत मुश्किल हो रहा है. चेन्नई में ऐसे कई लोगों से पानी की एक मटकी के लिए आम शहरवासी की तुलना में दस गुना ज्यादा दाम वसूले जा रहे हैं.

पानी पर भी राशनिंग!

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पानी की किल्लत इस हद तक पहुंच चुकी है कि नंदन नीलकेणी ने भी ना सोचा होगा कि पानी की राशनिंग करनी पड़ेगी और इस काम में आधार-कार्ड का इस्तेमाल होगा.

आंध्रप्रदेश के एक जिले में आधार-कार्ड की बिनाह पर लोगों को वाटर-कार्ड दिए गए ताकि वे इस कार्ड के जरिए एक मटकी पानी हासिल कर सकें.

लेकिन वाटर-कार्ड हासिल करने के बाद भी पानी के लिए कीमत तो चुकानी ही पड़ रही है. निजी तौर पर पानी की आपूर्ति के कारोबार में लगे लोग एक मटकी पानी के लिए पांच रुपया वसूल रहे हैं.

लेकिन पानी की किल्लत या सूखे की कहानी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है कि लोगों को पानी के लिए कीमत चुकानी पड़ रही है.

इस कहानी में यह भी शामिल है कि पानी बेशकीमती है और इसके अभाव का सामाजिक जीवन के हर पहलू पर असर पड़ना है, साथ ही भावी विकास के लिहाज से भी इस असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

जलवायु-परिवर्तन से निबटने के प्रयासों की हालत यह है कि किसी भी राज्य ने गर्मी के महीने के लिए कोई ठोस तैयारी नहीं की है जबकि हर गुजरते साल के साथ हालत बद से बदतर होती जा रही है.

तमिलनाडु का सबसे बुरा हाल

मिसाल के लिए तमिलनाडु जैसे राज्य में सरकार ने यह सोचा ही नहीं कि भारत के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा लंबा तटीय इलाका तमिलनाडु में ही है और इस कारण सूबे में स्थिति और राज्यों की तुलना में ज्यादा गंभीर हो सकती है.

चेन्नई में 2015 के दिसंबर महीने में बाढ़ आयी थी लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सालों में बाढ़ ज्यादा भयावह रुप ले सकती है.

जान पड़ता है कि तमिलनाडु की सरकार को कुछ सूझ ही नहीं रहा कि आंख के आगे आन खड़े जलवायु-परिवर्तन के असर से बचने की क्या काट निकाली जाय. उसे अभी तक यह समझ नहीं आया कि समुद्र के सूरते-हाल बदलते हैं तो असर मैदानी जीवन पर भी पड़ता है.

लेकिन यह बात कहना भी गलत है कि हर सूबे की सरकार भविष्य की स्थिति के प्रति लापरवाही और उपेक्षा का बरताव कर रही है.

केरल में सूख चुकी झील, नहर, तालाब और पानी के अन्य संसाधनों को फिर से जगाने-जिलाने का काम मिशनरी भाव से किया जा रहा है. बेशक काम शुरुआती अवस्था में है लेकिन कम से कम एक राज्य ने पानी की किल्लत दूर करने के लिए मिशनरी भाव से काम करना चालू कर दिया है.

फ़र्स्टपोस्ट दक्षिण भारत के हर राज्य में गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत से पैदा हुई स्थिति के बारे में अपनी लेखमाला में आपको बताता रहेगा. संयोग देखिए कि पश्चिमी और दक्षिण भारत के ही इलाके देश में सबसे ज्यादा विकसित माने जाते हैं.

पानी की किल्लत के बीच उपजे हालात से अवगत कराने के पीछे हमारा मकसद आगाह करना है ताकि सरकार और नागरिक संगठन मिशनरी भाव से समस्या के समाधान के उपाय करें और गर्मी की मार झेल रहे लोगों का दुख कम हो सके.

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