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दक्षिण का सूखा (पार्ट-3): नागापट्टिनम् के सूखे खेत और पलायन करते मजदूर

तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले के किझावलुर तालुके के सैकड़ों खेतिहर मजदूरों बेरोजगार हो गए हैं.

Divya Karthikeyan Updated On: Apr 26, 2017 09:56 AM IST

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दक्षिण का सूखा (पार्ट-3): नागापट्टिनम् के सूखे खेत और पलायन करते मजदूर

(देश के दक्षिण राज्यों कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में पानी की भारी किल्लत के बीच तकरीबन आपदा की हालत आ पहुंची है.

इसके विभिन्न पहलुओं पर फ़र्स्टपोस्ट पर एक लेखमाला प्रकाशित हो रही है. लेखमाला की इस तीसरी किश्त में पढ़िए तमिलनाडु के नागापट्टिनम् के भूमिहीन दलितों के बारे में जो पानी की किल्लत के बीच पलायन को मजबूर हैं.)

मंदिर के तालाब की तरफ टकटकी बांधकर देखता मथीवानन कमर की उभरी हुई हड्डी के इर्द-गिर्द अपनी धोती की गिरह कसने की कोशिश में है. पत्नी दोपहर के खाने के लिए उसे पुकार रही है लेकिन वह इस पुकार की अनदेखी कर रहा है.

तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले के किझावलुर तालुके के सैकड़ों खेतिहर मजदूरों में एक है मथीवानन. उम्र होगी यही कोई साठ बरस के आस-पास. वह गर्मी से पसीज आये हाथ को मलते हुए कहते हैं, 'कोई काम करने के लिए नहीं मिल रहा लेकिन हमेशा लगता है कि बहुत सारा काम करने को बचा है. मंदिर के तालाब का पानी बहुत गंदला है, कीचड़ मिला होने के कारण पानी बहुत गाढ़ा और चिपचिपा हो रहा है.

नागापट्टिनम् उन चंद जिलों में है जहां मंदिरों के मालिकाने वाली जमीन की बहुतायत है. मंदिरों के मालिकाने वाली सबसे ज्यादा जमीन तंजावुर और तिरुनेल्वेली जिले में हैं.

पानी की कमी के कारण खेतिहर मजदूर दरवाजों की मरम्मत, मकानों की रंगाई-पुताई और जूतों की मरम्मती जैसे छोटे-मोटे कई काम करने में लगे हैं. लेकिन तमिलनाडु में सूखे की बढ़ती भयावहता के बीच उनके लिए ये काम भी कम होते जा रहे हैं.

स्थानीय कन्नापुर कोईल (मंदिर) नाडुगारिनादर देवस्थानम् की है. नाडुगारिनादर देवस्थानम् ने 40 साल पहले 100 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी. इस जमीन के वारिस पट्टेदारी का बोझ ढो रहे हैं. पट्टेदारी के बोझ के साथ उनके कंधे पर खेती की इस जमीन से जुड़े कर्जे का भी बोझ है.

तमिलनाडु में मंदिरों की राजनीति बड़ी जानी-पहचानी और जटिल है. सूखे की इस हालत में मंदिरों की जमीन से जुड़ी यह राजनीति आखिर इतनी अहम क्यों हो उठी है?

जमीन की मिल्कियत

बीमा का दावा करने के लिहाज से जमीन की मिल्कियत बहुत अहम है. सूखे के वक्त उपज बहुत कम हो जाती है. इसका असर जमीन के पट्टेदार और खेत मजदूर दोनों पर पड़ता है.

कावेरी फारमर्स एसोसिएशन के मुताबिक मंदिर की जमीन के तकरीबन 70 फीसद काश्तकार प्रभावशाली कल्लार जाति के हैं. केवल 30 फीसद दलितों के पास ही खेती की जमीन है.

ज्यादातर दलित खेतिहर मजदूर हैं. किझावलुर तालुके में खेती की 80 फीसद जमीन मंदिरों की है और इसके 60 फीसद हिस्से में खेती-बाड़ी का काम होता है.

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दक्षिण भारत में सूखा आपदा में बदल गई है

नागापट्टिनम् जिले में मंदिर की मिल्कियत वाली खेती की जमीन का मामला तनिक उलझा हुआ है. ऐसी जमीन पर मालिकाना तो मंदिर की प्रबंधक समिति का होता है लेकिन जमीन पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को दे दी जाती है.

ये किसान मंदिर के मालिकाने की अपने हिस्से में आई जमीन आगे किसी और किसान को खेती के लिए पट्टे पर दे देते हैं. कई चरणों में पट्टेदारी पर होने वाली इस खेती पर जाति-व्यवस्था का असर है और इसी कारण दलित खेतिहर मजदूर को नुकसान उठाना पड़ता है.

सूखे के वक्त फसल मारे जाने की हालत में बीमा का दावा करने के लिए पट्टेदार किसान को जमीन के असली मालिक (मंदिर की प्रबंधन समिति) से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र (नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) हासिल करना होता है.

मंदिर के मालिकाने की खेतिहर जमीन का शुरूआती पट्टेदार अमूमन कल्लार जाति का होता है. उसे पट्टेदारी पर खेती के लिए जमीन सीधे मंदिर प्रबंधन से मिली होती है.

मंदिर की प्रबंधन समिति की जमीन का पहला पट्टेदार इस जमीन को कुछ रकम या कुछ और चीज लेकर किसी और को खेती-बाड़ी के लिए दे देता है. ज्यादातर मामलों में यही देखने को मिलता है.

दूसरे चरण की इस पट्टेदारी में ज्यादातर जमीन दलित किसानों को मिलती है. दरअसल इलाके के दलित ही मंदिर के मालिकाने वाली जमीन पर पूरे समय खेती करते हैं वही खेती-बाड़ी करते और जमीन का ख्याल रखते हैं.

लेकिन यहां एक पेंच है. मंदिर की प्रबंधन समिति जब पट्टेदारी पर किसी काश्तकार को जमीन देती है तो इसका लिखित करार होता है लेकिन पट्टेदार जब आगे किसी और को यह जमीन खेती के लिए देता है तो इसका कोई लिखित करार नहीं होता. मालिकाने के लिहाज से यह बात बहुत मायने रखती है. लेकिन क्यों?

फसल खराब हुई तो किसान की जान अटकती है

तमिलनाडु के एग्रीकल्चरल लैंडस् एक्ट (1969) में पट्टेदारी के अधिकारों के बाबत कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसी कृषि-भूमि पर खेती कर रहा है जिसपर उसका मालिकाना नहीं है तो उसे जमीन की पट्टेदारी का अपना अधिकार तालुका ऑफिस में दर्ज कराना होगा.

अधिकार के पंजीकृत होने से पट्टेदारी सुनिश्चित हो जाती है. एक तो तय अवधि तक पट्टेदार किसान को कोई खेती की जमीन से मनमानी बेदखल नहीं कर सकता. दूसरा, पट्टेदारी के एवज में वसूली जाने वाली रकम भी तय हो जाती है. यही नहीं, अगर जमीन बिक्री के लिए उपलब्ध हो तो इसकी खरीद में पट्टेदार को वरीयता दी जा सकती है.

लेकिन मंदिर के प्रबंधन समिति से प्राथमिक तौर पर पट्टेदारी हासिल करने वाले ज्यादातर किसान आगे जब यह जमीन किसी और को पट्टे पर खेती के लिए देते हैं तो करार जबानी ही होता है या फिर कोई और तरीका अपनाया जाता है जैसे जमीन को रेहन पर देना या पेशगी के तौर पर कुछ रकम लेकर जमीन की पट्टेदारी का अधिकार बिना पंजीकरण के किसी और को दे देना.

ऐसे में पट्टेदारी का वास्तविक अधिकार तो मंदिर के प्रबंधन समिति से पट्टा हासिल करने वाले व्यक्ति या उसके वारिस के पास ही रहती है. पट्टेदारी के अधिकारों से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड का नवीकरण भी नियमित रुप से नहीं होता.

सूखे की स्थिति में फसल मारी जाय या किसी और कारण से उपज कम हो और ऐसे में जमीन के असली मालिक (मंदिर की प्रबंधन समिति) को पट्टेदारी का पावना ना चुकाया जा सके तो पट्टेदारी से बेदखल करने का नोटिस जारी होता है.

यह नोटिस मंदिर के प्रबंधन समिति से पट्टेदारी हासिल करने वाले पहले काश्तकार को मिलता है. हालांकि, जमीन पर खेती-बाड़ी कोई और कर रहा होता है. ऐसे में जमीन का पहला पट्टेदार भी जमीन के वास्तविक मालिक की दया के भरोसे होता है और दूसरा पट्टेदार भी.

जमीन अगर मंदिर की प्रबंधन समिति वापस ले लेती है तो काश्तकार और खेत मजदूर दोनों ही के हाथ से जीविका का साधन छिन जाता है. मद्रास यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर एस. शिवप्रकाशम ने मंदिर के मालिकाने वाली जमीन से जुड़ी राजनीति पर शोध किया है.

शिवप्रकाशम का कहना है, 'खेती की उपज कम होने के कारण जमीन साल दो साल परती छूट जाये या खेती-बाड़ी करने योग्य ना जान पड़े तो मंदिर की प्रबंधन समिति पट्टेदार से जमीन वापस ले लेती है. जमीन वापस लेने के वक्त प्रबंधन समिति इस बात का जरा भी विचार नहीं करती कि काश्तकार या खेत मजदूर पर इसका क्या असर होगा.'

मणिवानन के घर में चारपाई पर रंग खो चुका हरे रंग का एक शॉल बेतरतीब पसरा है. मणिवानन के नाम पर मंदिर के मालिकाने वाली पांच एकड़ की जमीन थी. इस जमीन की चर्चा छिड़ते ही वह दरवाजे पर कुंडी चढ़ा देता है और कहता है, 'जमीन का मालिक हमारी बात सुन सकता है.'

मणिवानन कल्लार जाति का है और मंदिर की प्रबंधन समिति से जमीन की पट्टेदारी उसे सीधे हासिल हुई थी. वह बड़े उत्साह से बता रहा है कि रेवेन्यू कोर्ट का बॉयकाट किया जाना चाहिए. इसी अदालत में भूस्वामी पट्टेदारों के खिलाफ मुकदमा दायर करते हैं.

वह पूछता है, 'उपज कम हो या सूखा पड़े तो कोई हमें जमीन से बेदखल करने का नोटिस कैसे भेज सकता है? फसल तो इतनी भर भी ना हुई कि जमीन के मालिक का पावना चुकाया जा सके. इन लोगों को किसानों का जरा भी ख्याल नहीं.'

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कल्लार जाति के मणिवानन एक किसान हैं जिनके पास कोई काम नहीं है

मणिवानन और 50 अन्य काश्तकारों पर एक मुकदमा दर्ज है. सभी को जमीन की पट्टेदारी मंदिर की प्रबंधन समिति से सीधे हासिल हुई है. इन्हीं काश्तकारों में एक है कनप्पन. वह मणिवानन के साथ रसना पीने बैठा है और बड़ी हड़बड़ी में उसके घूंट ले रहा है मानो उसे पकड़े जाने का डर हो.

दलित समुदाय का कनप्पन कहता है कि, 'हमलोग मजदूरों को समय पर मजदूरी देते हैं. मुश्किल बस यही है कि उपज बहुत कम हुई है. खेती के लिए जरा भी पानी नहीं तो हम क्या करें. मालिकों को चाहिए कि वे जमीन की मिल्कियत के नाम पर वसूला जाने वाला पावना माफ कर दें.'

कनप्पन को मंदिर की मिल्कियत वाली जमीन लौटानी होगी. एक शिवप्रकाश कहते हैं,  'मुश्किल यह है कि मंदिर वालों को कभी जमीनी सच्चाई नजर नहीं आती. मंदिरों को बाकी स्रोतों से पर्याप्त आमदनी हो जाती है. संभव है, पट्टेदार पर उनका पावना पिछले दो साल से बकाया हो लेकिन उन्हें सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ. पट्टेदार पर सीधे-सीधे मुकदमा ठोंक देने से क्या होने वाला है.'

मजबूरी में पलायन

पंद्रह साल की अलिमा अपने पिता से चिपटी हुई है. वह चाहती है उसका पिता घर छोड़कर ना जाये. चालीस साल का बाबू किझवलुर छोड़कर काम की तलाश में तिरूपुर जाने की सोच रहा है. उसे चिन्ता लगी है. उसके पड़ोसी जीवा और मणि काम की तलाश में ईरोड और त्रिच्ची जा चुके हैं.

जीवा होटल में वेटर का काम कर रहा है और मणि निर्माण मजदूर के काम में लगा है. दोनों के बीवी-बच्चे किझवलुर में रह गये हैं. घर का काम-काज और पशुओं की देखभाव पत्नी के जिम्मे है. मणि की पत्नी जाना बुझे मन से बकरियों को चराने के लिए ले जा रही है. उसकी गोद में बच्चा है. रास्ते पर चलती हुई वह एक पल को ठहरकर कहती है, 'आज इन सब (बकरियों) को परती खेत में ही चरना पड़ेगा.'

इलाके में मनरेगा की योजना पर ठीक ढंग से अमल नहीं हो रहा. इस कारण महिलाओं को चिन्ता है कि वे अपने परिवार और पशुओं की देखभाल का जिम्मा किस तरह उठा पायेंगी. बकरियों को हांकती हुई जाना बोल पड़ती है, 'हमें पिछले साल के मनरेगा के तीन महीने के काम की मजदूरी नहीं मिली है. हमलोग अपने मर्द को काम करने के लिए कहीं और कैसे भेज सकते हैं जब घर चलाने लायक पैसा भी नहीं बचा है?'

जाना को पानी की किल्लत है ना बच्चों के लिए पानी है ना ही पशुओं के लिए. लेकिन सेल्वी का मिजाज कुछ और है. वह कहती है, 'मैं इस कोशिश में हूं कि मेरा पति काम खोजने के लिए कहीं और जाय. वह जाना नहीं चाहता. लेकिन मैं अपने दम पर घर चला सकती हूं दुखड़ा रोने से कहीं अच्छा है कि हम संघर्ष करें.'

नागापट्टिनम् तटीय इलाका है. जिन जिलों में रोजी-रोजगार के अवसर हैं उनसे यह इलाका एकदम कटा हुआ है. फिर एक बात और भी है. बिहार और ओडिशा से भी बड़ी संख्या में मजदूर पलायन करके रोजी-रोटी की तलाश में आये हैं. सो...नागापट्टिनम् के लोगों के लिए रोजी-रोजगार की और भी ज्यादा कमी हो गई है.

वेट्रीवल चेन्नई में कई महीनों तक काम खोजता रहा. कामयाबी ना मिली तो अब अपने तालुके में लौट आया है. वह सिर झुकाये हुए कहता है, 'मुझे लगता है अब घर बैठना और भूखों मरना होगा. इस इलाके के दलित परिवारों को इस बात की पर्याप्त जानकारी नहीं है कि किन जगहों पर काम मिल सकता है साथ ही स्थानीय स्तर पर काम के अवसर भी कम हैं.'

मंझोली जाति के लोग काम के अवसरों के मामले में कहीं बेहतर हालत में हैं. वे तनिक खुले विचारों के हैं और हालात के हिसाब से अपने को ढाल लेने में भी उन्हें सहूलियत है. दलित समुदाय के लोगों के मन में शहर को लेकर डर बैठा हुआ है. बाबू का कहना है, 'हम नहीं जानते कि वह दुनिया कैसी होगी. हम यहां रहकर पहले ही बहुत दुख उठा चुके हैं. दूसरी जगह जाकर दुख उठाने से बेहतर है यहीं का दुख झेलें. हमलोग बस खेती करना जानते हैं.'

शहर ना जाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इन लोगों के नाम से कुछ ना कुछ जमीन है. कविता के पास 2 एकड़ जमीन है जबकि बाबू के पास 3 एकड़ खेती की जमीन है. इलाके के कम से कम 60 फीसद दलितों के पास कुछ ना कुछ जमीन है और वे किसी और काम की तलाश करने की जगह खेती करना बेहतर समझते हैं.

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यहां के खेत बारिश के बगैर सूखे की चपेट में है

कावेरी फारमर्स एसोसिएशन के जी रामदास बताते हैं कि, 'इस सबको 100 दिन के गारंटीशुदा काम देने की योजना मनरेगा पर भरोसा है. उन्हें लगता है कि मनरेगा का काम उन्हें मिल ही जायेगा...साथ ही वे जमीन पर भी पकड़ बनाये रखना चाहते हैं. उन्हें डर है कि कहीं और जाने की सूरत में अगड़ी जाति के लोग जमीन पर कब्जा जमा लेंगे क्योंकि जमीन पुरुषों के नाम पर है..पत्नियों के नाम पर नहीं.'

पच्चीस साल की आनंदी हाथ में एक मोटी किताब लिए दरवाजों के पीछे से झांकती है. उसके चेहरे पर हल्दी की परत है और किताब के पन्नों से भी पीलापन झांक रहा है. वह कुछ इस तेजी के साथ अपनी पढ़ाई के बारे में बताती है कि उसका पिता दंग रह जाता है.

आनंदी बताती है, 'मैंने तिरुवीका कॉलेज से इकॉनॉमिक्स में बीए किया, अन्नामलाई यूनिवर्सिटी से इकॉनॉमिक्स में एमए और अन्नामलाई यूनिवर्सिटी से ही मैंने लाइब्रेरी साइंस में बैचलर की डिग्री हासिल की है. अब मैं टीचर ट्रेनिंग कोर्स के लिए पढ़ाई कर रही हूं.' आनंदी अपने पिता की छोटी सी दुकान संभालती है और बड़े संकोच के साथ बताती है कि, 'मेरा सपना है कि चेन्नई जाऊं और वहां लाइब्रेरियन का काम करुं.'

आनंदी के पिता के मुंह से तुरंत ही निकलता है, 'औरत ऐसा नहीं कर सकतीं, कितने शर्म की बात होगी कि औरत काम करने के लिए बाहर चली जाय और मर्द यहां बैठे रहें.'

लेकिन पिता की बात पर आनंदी की सहेली भामा ने बीच ही में टोक दिया. भामा ने तिरुवीका कॉलेज से जूलॉजी में बीए और एमए किया है. उसकी भी हालत आनंदी जैसी ही है. वह चुनौती के स्वर में कहती है, 'हमलोग इस गांव के मर्दों से ज्यादा कमा सकते हैं. आपको क्या परेशानी है?'

'कभी-कभी तो मेरा मन करता है कि भाग जाऊं...चेन्नई जाने वाली ट्रेन पर सवार हो जाऊं.' भामा का लहजा इस बार मजाकिया हो उठता है.

'पानी के लिए चिल्लाते रहो. खेती खत्म हो चुकी है अप्पा (पिता) अब आगे की सोचो.' वह तनिक रुखाई से कहती है और पास की अपनी झोपड़ी में जाने के लिए तेजी से कदम बढ़ा देती है.

महिलाएं घर से निकलकर कहीं बाहर काम करने के लिए जायें तो वे घर पर रुपया-पैसा भी भेज सकती है. दरअसल, काम के लिए बाहर निकलकर जाने का मामला उनके लिए महत्वाकांक्षा का सवाल है साथ ही उन परंपरागत बेड़ियों की जकड़न तोड़ने का भी जिनमें तालुका के किसान परिवार बंधे हुए हैं.

परिवार आस लगाये हुए है कि आनंदी काम करने के लिए बाहर जायेगी तो घर पर कुछ रुपये पैसे भेजेगी लेकिन आनंदी सिर्फ पैसे नहीं कमाना चाहती वह बाहर की दुनिया भी देखना चाहती है.

Farmer Unyoked Gagged Oxen Countryside Karnataka

किसान गांव छोड़कर शहर भी जाना नहीं चाहते हैं

मद्रास इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर पी. शिवसुब्रम्णयम कहते हैं,  'देखिए, खेतिहर मजदूरी उनके लिए बहुत अहम है. मशीनीकरण और सेवा-क्षेत्र के बढ़वार के विचार को लेकर वे अब भी सहज नहीं हैं. ये लोग उन जगहों पर जायेंगे जहां हाथ का काम मिलेगा लेकिन उनके पास खेती-बाड़ी की कुछ जमीन भी है. खेती की जमीन ने उनके पैर में बेड़ी डाल रखी है.'

जय चिनप्पन की देह पर बनियान तार-तार हो रही है. लकड़ी की एक छड़ी घुमाते हुए वह कविता के घर के सामने रुकता है और एक प्याली पानी मांगता है. पानी मिट्टी पर बिखर जाता है वह फटी आंखों से बिखरे हुए पानी को देखता है, पास खड़ी महिलाएं उसको ताना दे रही हैं और कई महिलाएं उसे भला-बुरा कह रही हैं.

चिनप्पन तकरीबन अचंभित होकर पानी की तरफ ताक रहा है. वह अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर प्रार्थना की मुद्रा में ले आता है और महिलाओं से माफी मांगता है.

अभी इस इलाके में पानी की बूंदो से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं है.

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