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सोमनाथ चटर्जी: भारत की बदलती राजनीति के 'असाधारण साक्षी' का जाना

चार दशकों के उनके लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव आए जो कि असाधारण थे लेकिन सोमनाथ चटर्जी भी तो कोई साधारण इंसान नहीं थे.

Updated On: Aug 13, 2018 05:09 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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सोमनाथ चटर्जी: भारत की बदलती राजनीति के 'असाधारण साक्षी' का जाना

सोमनाथ चटर्जी एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने अपने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे थे. भारतीय राजनीति में ऐसे बहुत कम ही राजनेता होंगे जिन्होंने चटर्जी जैसे अपनी जिंदगी में बहुत से बदलाव देखे होंगे. सोमनाथ चटर्जी ने अपनी जिंदगी कम्युनिस्ट पार्टी के नाम कर दी थी. लेकिन इसी कम्युनिस्ट पार्टी ने समय आने पर उन्हें अपने दल से अलग भी कर दिया था.

सोमनाथ चटर्जी का जन्म अखिल भारतीय हिंदू महासभा के नेता और सांसद रहे निर्मल चंद्र चटर्जी के घर हुआ था. उन्हें राजनीति विरासत में मिली थी लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के लिए कम्युनिज्म का चुनाव किया था. ऐसे में चटर्जी को दो अलग-अलग धाराओं की राजनीति को अपने जीवन काल में नजदीक से देखने और समझने का मौका मिला.

साठ के दशक में साम्यवादी राजनीति उभार पर थी और विश्व में कई देशों में इस विचारधारा की राजनीति अपनी जड़ें जमा रही थी. सोमनाथ के पिता निर्मल चंद्र चटर्जी का भी हिंदू महासभा की राजनीति और विचारधारा से मोहभंग हो चुका था. सोमनाथ चटर्जी भी उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए साम्यवाद की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाने का फैसला किया. सोमनाथ ने उस समय जो कम्युनिज्म का दामन थामा तो जीवनपर्यन्त उसकी पैरोकारी करते रहे. हालांकि 2008 में नई मार्क्सिज्म विचारधारा की परिभाषा गढ़ने में जुटे उनकी पार्टी के साथियों ने उन्हें ही पार्टी से बेदखल कर दिया था.

PM attends Somnath Chatterjee's book release

जिस पार्टी को उन्होंने अपना पूरा जीवन दे दिया था उसी पार्टी ने उन्हें 2008 में पार्टी से निकाल दिया. उस समय देश में यूपीए-1 का शासन चल रहा था और वो लोकसभा स्पीकर के महत्वपूर्ण पद पर थे. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उस समय अमेरिका के साथ होने वाले परमाणु समझौते का विरोध किया था. पार्टी के महासचिव प्रकाश करात की पहचान एक हार्डलाइनर नेता की रूप में होती थी. प्रकाश करात और उनकी पार्टी भारत-अमेरिकी परमाणु डील का विरोध कर रही थी.

उस समय सरकार को माकपा का समर्थन था लेकिन प्रकाश करात ने डील के विरोध में मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया. करात ने सरकार से समर्थन वापस लेने के साथ ही सोमनाथ चटर्जी से अनुरोध किया कि वो स्पीकर के पद से इस्तीफा दे दें. लेकिन चटर्जी ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर न केवल इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील का समर्थन किया बल्कि उन्होंने स्पीकर के पद से इस्तीफा देने से भी इंकार कर दिया. पार्टी ने इसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया हालांकि वो अपने पूरे कार्यकाल यानि 2009 तक लोकसभा अध्यक्ष बने रहे.

पार्टी से निकाले जाने पर चटर्जी को गहरी निराशा हुई थी. पार्टी से निकाले जाने के बाद उनका दर्द इस बयान में उभर का सामने आता है जिसमें उन्होंने कहा था, 'पार्टी से निकाले जाने के जख्म का निशान मेरे मरने तक मेरे साथ रहेगा.' निश्चित रूप से चटर्जी को भले ही पार्टी से निकाल दिया गया हो लेकिन इसके बावजूद उन्होंने आखिरी सांस तक मार्क्सवादी सिपाही बने रहना ही कुबूल किया. पार्टी से निकाले का अध्याय उनकी पार्टी के साथ-साथ उनके जीवन में काफी महत्व रखता था लेकिन उनके जाने के बाद ये अध्याय भी समाप्त हो गया.

सोमनाथ की विचारधारा भले ही मार्क्सवादी रही हो लेकिन उनकी अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों से भी दोस्ती थी. सांसद के रूप में सोमनाथ की इज्जत अपने दल के अलावा अन्य दलों में भी काफी थी. शानदार सांसद रहे सोमनाथ ऐसे नेताओं में शामिल थे जिनका सम्मान अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर और पी.वी. नरसिम्हा राव जैसे बेहद शालीन और बड़े नेता भी करते थे. 90 के दशक में एक बार संसद में सोमनाथ चटर्जी पर अटल बिहारी वाजपेयी बहुत नाराज हो गए और उन्होंने जमकर चटर्जी को खरी खोटी सुनाई. लेकिन इस घटना के अगले ही दिन वाजपेयी ने संसद में सोमनाथ से बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि उनका अपने मित्र ‘सोमनाथ दादा’ को अपमानित करने का कोई इरादा नहीं था.

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चौदहवीं लोकसभा का एक और वाकया है जब अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी संसद में भिड़ंत हो गई थी. उस समय सोमनाथ लोकसभा अध्यक्ष हुआ करते थे. संसद में सरकार और विपक्ष के बीच कई दिनों से गतिरोध चल रहा था और इसके जल्द ही खत्म होने की कोई गुंजाईश नजर भी नहीं आ रही थी. उस समय सदन में कांग्रेस के लीडर ऑफ दी हाउस प्रणब मुखर्जी ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी न केवल संसदीय परंपराओं का पालन नहीं कर रही है बल्कि वो स्पीकर के प्रति भी असम्मान का प्रदर्शन कर रही है.

उस समय सोमनाथ चटर्जी के स्टैंड से बीजेपी खुश नहीं थी. संसद के इसी हंगामे की बीच वाजपेयी ने चटर्जी के ऊपर तीखा हमला बोलते हुए कहा, 'सम्मान मांगा नहीं जाता बल्कि अर्जित किया जाता है.' वाजपेयी के इस तीखे जवाब वाले पत्र का मतलब साफ था कि सोमनाथ चटर्जी का लोकसभा अध्यक्ष के रूप में रोल निष्पक्ष न होकर भेदभावपूर्ण था.

इस पत्र को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच काफी बवाल हुआ. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बीजेपी स्पीकर पद की गरिमा को कम करने का प्रयास कर रही है. हालांकि चटर्जी ने इस बात को तूल न देते हुए बुद्धिमतापूर्वक अपनी बात रखते हुए कहा, 'मैं इस बात को लेकर निश्चिंत हूं कि वाजपेयी जी मुझे पसंद करते हैं और उन्होंने ये पत्र दूसरों के बहकावे में आकर लिखा है.'

उनका इशारा आडवाणी जी की ओर था. सोमनाथ का अनुमान बिल्कुल सही था. उस पत्र का ड्राफ्ट सही में आडवाणी के दफ्तर में ही तैयार किया गया था. हालांकि बाद में सोमनाथ चटर्जी ने ये कहते हुए बात को समाप्त कर दिया कि वो वाजपेयी जी को उच्च सम्मान की नजर से देखते हैं.

चुनाव लड़ने के लिए अपने पिता की पश्चिम बंगाल की बर्धमान सीट का चयन करने के बाद से सोमनाथ 2009 तक लगातार उस सीट से पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे. संसद में उनके द्वारा सौम्य और स्पष्ट स्वर में मजबूती से अपनी बात रखे जाने की विशेषता की वजह से संसद की बहसों को वो अपनी बातों और तर्कों से और समृद्ध बना देते थे. अपनी बेहतरीन वाकपटुता की बदौलत संसद में वो अपने पिता की हिंदू महासभा की विरासत और खुद की विचारधारा में चतुराई के साथ सामंजस्य बैठा लेते थे. संसद में उनका वो हंसता, मुस्कुराता चेहरा सब को याद है जब वो मुस्कुराते हुए अलग-अलग दलों से जुड़े लोगों को वो अपना मित्र बना लेते थे.

लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उनकी मौत एक ऐसे निराश राजनेता के रूप में हुई जिन्होंने एक ऐसी विचारधारा वाली पार्टी के लिए जीवनभर निष्ठापूर्वक काम करने का दावा किया जिसने समय आने पर उन्हें भी नहीं बख्शा. जब वो लोकसभा अध्यक्ष बने तो उनपर पक्षपात के गंभीर आरोप लगे. ये शायद उनके सांसद जीवन पर लगा सबसे गहरा दाग था. नहीं तो एक ऐसे सदन को चलाना जिसके अंदर मनमोहन सिंह सरकार के द्वारा इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील के समय विश्वासमत प्राप्त करने के दौरान सांसदों को अपनी ओर करने की मुहिम में भी उन पर किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगा.

हालांकि सच्चाई ये है कि कैश फॉर वोट कांड में उनकी भूमिका संदेहास्पद रही थी और वो जानबूझ कर सरकार के सहयोगी बने रहे थे. ये सोमनाथ चटर्जी के राजनीतिक जीवन पर लगा सबसे बड़ा दाग था जो अंत तक उनके साथ बना रहा. चार दशकों के उनके लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव आए जो कि असाधारण थे लेकिन सोमनाथ चटर्जी भी तो कोई साधारण इंसान नहीं थे.

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