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नफ़रतों के दौर में उम्मीद की लौ जगातीं इंसानियत की कुछ बेमिसाल कहानियां...!

ये वो ताकतें हैं जो किसी भी देश को बनाने में, उसकी सामाजिक ताने-बाने को बुनने में और उसके लोगों के मानस-पटल पर छपी वो कुछ भावनाएं, सोच, समझदारी, इंसानियत और सहिष्णुता के छोटे-छोटे नुस्खे हैं

Swati Arjun Swati Arjun Updated On: Jun 03, 2018 03:34 PM IST

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नफ़रतों के दौर में उम्मीद की लौ जगातीं इंसानियत की कुछ बेमिसाल कहानियां...!

हम सब एक अजीब से समय में जी रहे हैं. जिसमें एक साथ कई ताकतें सिर उठा रही हैं, कभी लगता है कि कोई एक ताकत पूरे समाज और देश को अपनी चपेट में ले रही है तो कभी लगता है कि किसी दूसरी शक्ति ने पहली को मात दे दी है. ये शक्तियां असल में कोई मिसाइल या रॉकेट लॉन्चर नहीं है. न ही ये ताकत कोई बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति है. बल्कि ये वो ताकतें हैं जो किसी भी देश को बनाने में, उसकी सामाजिक ताने-बाने को बुनने में और उसके लोगों के मानस-पटल पर छपी वो कुछ भावनाएं, सोच, समझदारी, इंसानियत और सहिष्णुता के छोटे-छोटे नुस्खे हैं. जिसे हमें छोटी-छोटी पुड़ियों में बिना हमारी जानकारी के, किसी भी स्कूल-कॉलेज, मंदिर-मस्जिद में जाए बगैर पीढ़ी दर पीढ़ी हमें नेमत में दे दी गई है.

ये कुछ वैसा ही है- जैसे चांदनी चौक की वो डेढ़ सौ साल पुरानी जलेबी की दुकान, जिसकी मिठास इन गए सालों में ज़रा भी नहीं बदली, लेकिन खरीदार बदल गए हैं. पहले जहां के ग्राहक कोई सरदार सोहन सिंह हुआ करते थे- अब उनकी जगह उनके पोते मलकीत ने ले ली हो.

भारत या कोई भी देश एक व्यक्ति विशेष है

कुछेक साल हुए जब इन पंक्तियों की लेखिका एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस में काम करती थी, उस संस्थान में हर दूसरे दिन देश के कोने-कोने से उनके श्रोता, अपने प्रिय प्रसारकों से मिलने आया करते थे. मेरे लिए वो अभूतपूर्व था, जबकि.... इस इडंस्ट्री का हिस्सा हुए मुझे तब भी एक दशक तो हो ही चुके थे. एक दिन ऐसे ही एक किसी श्रोता से मिलकर बात करने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. मैं गेस्टरूम पहुंची तो वहां एक तक़रीबन 85 साल के बुज़ुर्ग, धोती-कुर्ता और सिर पर पगड़ी बांधे आए हुए थे, उनके साथ उनका 20-22 साल का पोता था. जो शहर में रहकर पढ़ाई कर रहा था. ये परिवार राजस्थान के जैसलमेर या बाड़मेर के इलाके से था जो बॉर्डर के पास है.

उस लड़के ने बताया कि उसके दादाजी पिछले 70 सालों से हमारे प्रसारण को नियम से सुन रहे हैं- कोई दिन नहीं बीतता जब वे हमारा प्रसारण नहीं सुनते, कभी सिग्नल खराब होती तो घर से बाहर चले जाते और किसी ऊंचे टीले पर बैठ जाते हैं, लेकिन प्रसारण ज़रूर सुनते हैं. उन्होंने ही हमें यानी लड़के के पिता और उसे इसकी आदत डाली जो आज तक जारी है. मैंने जब उस लड़के से पूछा कि तुम्हारे दादा जी को तो समझ में आता है, लेकिन जब तुम शहर में रहते हो, पढ़ाई कर रहे हो- सूचना के दसियों संसाधन तुम्हारे पास हैं तो तुम हमारे प्रसारण को क्यों सुनते हो.

जिसपर उस लड़के ने कहा, आपके कार्यक्रम को हम वैसे ही सुनते हैं- जैसे सुबह शाम हमारे घर में दीया जलता है, जैसे घर में सबसे पहले खाना बुज़ुर्गों को दिया जाता है और ये कि मैं आज जो कुछ भी हूं, जो भी कर पा रहा हूं उसमें माता-पिता, दादा-दादी, घर-परिवार के अलावा इस प्रसारण से मिले संस्कार और शिक्षा शामिल है. मैं अवाक थी... लेकिन अभिभूत भी.

बोलचाल की भाषा में हम अक्सर अपने देश के लिए भारत-माता के शब्द इस्तेमाल करते हैं. तो इसी आधार पर सहूलियत के लिए हम ये कह सकते हैं कि भारत या कोई भी देश एक व्यक्ति विशेष है.. जिसके शरीर में दो हाथ, दो पांव, दो कान, दो आंख, एक नाक, बीस उंगलियां, अनगिनत बाल और कई सौ हड्डियां हैं. जिनमें से किसी एक के साथ कभी भी किसी भी वजह से, कोई भी दिक्कत आ सकती है, कोई बीमारी पकड़ सकती है, कोई दुर्घटना घट सकती है या किसी में इंफेक्शन भी हो सकता है. हो सकता है कि उस अंग विशेष को काटना भी पड़ जाए या खुद से अलग भी करना पड़ जाए पर क्या ऐसा करने या होने से उस व्यक्ति विशेष का शरीर इंसान का शरीर न होकर किसी अन्य जीव का हो जाएगा? शायद कभी नहीं इसलिए हमारा हो या कोई और हो- किसी देश की जो पहचान होती है, जो उसकी मिट्टी, संरचना और सामाजिक ताना-बाना होता है- उसे इतनी आसानी से मिटाया या तोड़ा नहीं जा सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तराखंड के सिख पुलिस अफसर को कौन भूल सकता है?

हाल के दिनों में ऐसी ही कुछ घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा. ये वो घटनाएं थीं जिन्हें कथित तौर पर देश की पक्षपाती मेन-स्ट्रीम और सोशल मीडिया भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई. पहली घटना उत्तराखंड की हिल स्टेशन नैनीताल के पास बसे रामनगर की है. जहां करीब एक हफ्ते पहले एक प्रेमी युगल साथ बैठे थे. लड़का मुसलमान था और लड़की हिंदू. किसी तरह से इसकी जानकारी कुछ उपद्रवियों को हुई और वे लव-जिहाद के नाम पर उस लड़के को घेरने पहुंच गए. बड़ी संख्या में पहुंचे ये लोग इतने गुस्से में थे कि लड़के को सबक सिखाने के नाम पर उसकी जान लेने पर उतारू थे, लेकिन तभी वहां पास में ही ड्यूटी पर तैनात सब-इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह पहुंचे और उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उस मुसलमान लड़के की जान बचाई.

सोशल मीडिया में वायरल गगनदीप का ये वीडियो जहां एक तरफ हमें उसका शुक्रगुज़ार बनाता है, उन्हें हीरो बनाता है वहीं दूसरी तरफ वो हमें कुछ याद भी दिलाता है- याद दिलाता है कि गगनदीप लाख कहें कि वे ड्यूटी कर रहे थे, लेकिन उन्होंने वो किया जो उनकी खाक़ी वर्दी से परे की ट्रेनिंग थी, वो ट्रेनिंग जो उन्हें अपने घर और समाज से मिली. गगनदीप हमें याद दिलाते हैं कि असल में हम यही हैं और यही हमारी पहचान है, जिसे हमने भुला दिया है. जो गगनदीप ने किया वो अगर अकेले नहीं तो दस लोग साथ मिलकर तो कर ही सकते हैं. इस घटना के तीन मुख्य पात्र थे - हिंदू लड़की, मुस्लिम लड़का और सिख पुलिसकर्मी. चौथी उपद्रवी भीड़ थी..जिसके धर्म की पहचान कर पाना थोड़ा मुश्किल है.

दूसरी घटना, बिहार के गोपालगंज की है, जहां एक हिंदू परिवार में बच्ची का जन्म हुआ लेकिन जिसकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी, जिसके लिए उसे खून देने की ज़रूरत हुई. बच्ची का ब्लड ग्रुप ओ-नेगेटिव था जो काफी रेयर होता है, घरवालों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली और थोड़ी देर में आलम जावेद नाम का शख़्स बच्ची की जान बचाने के लिए अस्पताल पहुंचता है, लेकिन उसके रोज़ा में होने के कारण डॉक्टर खून लेने से मना कर देते हैं, जिसके बाद आलम रोज़ा तोड़ने का फैसला करते हैं और बच्ची को खून देकर उसकी जान बचाते हैं. आलम कहते हैं कि - रोज़ा तो दोबारा या बाद में भी रखा जा सकता है लेकिन बच्ची की जान तो अभी ही बचायी जा सकती थी. कुछ ऐसा ही देहरादून के आरिफ़ ने भी किया- उन्होंने भी एक ज़रूरतमंद को खून देने के लिए अपना रोज़ा तोड़ दिया.

Sikh Cop Save Muslim Boy gagandeep singh

दिल्ली में हुई अंकित की हत्या

तीसरे व्यक्ति दिल्ली के यशपाल सक्सेना हैं, जिनके बेटे अंकित की करीब छह महीने पहले दिल्ली की सड़क उस वक्त गला रेतकर हत्या कर दी गई थी जब वे अपनी प्रेमिका से मिलकर लौट रहे थे. अंकित की प्रेमिका मुस्लिम थी, जो उसके घरवालों को गवारा नहीं था और इसका ख़ामियाज़ा एक खूबसूरत से नौजवान की बर्बर हत्या से ली गई. अंकित के पिता यशपाल ने उस समय भी उनके बेटे की दर्दनाक मौत को राजनीतिक रंग देने की राजनीतिक पार्टियों की कोशिश पर पानी फेर दिया था और उन्हें ऐसा न करने की अपील की थी. अब एक बार फिर उन्होंने रमज़ान के मौक़े पर अपने इलाके के मुसलमान परिवारों के लिए इफ़्तार का आयोजन कर नफरत के पैरोकारों को करारा जवाब दिया है. नफरत और प्यार की इन कहानियों के कई रंग हैं- जिसमें से एक रंग कानपुर के गोपाल गुप्ता की भी है, जिन्होंने अपने तीन महीने की पत्नी की शादी उसके पूर्व प्रेमी से करवाई. गोपाल के मुताबिक उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि उनकी पत्नी खुशहाल ज़िंदगी जी सके और खुद को किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए.

अंकित सक्सेना (Photo: Facebook)

अंकित सक्सेना (Photo: Facebook)

ये सारी घटनाएं वो छोटी-छोटी तस्वीरें हैं जो आज के समय में न सिर्फ दुर्लभ बल्कि बेहद कीमती हैं. ये तस्वीरें हमें बार-बार ये याद दिला रहीं है कि यही हमारी एक समाज के तौर पर असली पहचान है. ये तस्वीरें हमें मुस्कुराने की वजह देती हैं, हमारी अंदर दबी मानवीय भावनाओं को जगाती है, हमारे विवेक और समझदारी को झकझोरती हैं, हमें प्रेरणा और हिम्मत देती हैं- हमारे भीतर उत्साह जगाती है, हमारे सामने उम्मीद की किरण जगाती है.

हम एक देश के तौर पर संक्रमण काल से गुज़र रहे हैं, लेकिन परिवर्तन की आहटें भी अक्सर इन्हीं बेचैन करने वाले दौर में सुनाई पड़ती है. जिस तरह से खूबसूरत इबारतें, बुराई से लड़ते वक्त़ लिखी जाती हैं, प्रेम पर सबसे सुंदर कविता..प्रेम में हारने के बाद लिखी जाती है वैसे हीं इंसानित की सबसे ऊंची लौ-आंधी-तूफानों के बीच भी रौशन रहती है. इस देश की हवा...पानी और मिट्टी में वो ताक़त है जो ऐसे हर तूफान को झेल सकती है. ये वक़्त उसी उम्मीद की लौ की नुमाइंदगी कर रहा है.

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