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सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस: जानिए, क्या था 2005 का पूरा मामला

यह मामला साल 2005 का है, जिसमें 22 लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था

Updated On: Dec 21, 2018 01:17 PM IST

FP Staff

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सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस: जानिए, क्या था 2005 का पूरा मामला

सोहराबुद्दीन शेख-तुलसीराम प्रजापति कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया है. फैसले में कहा गया है कि जांच एजेंसियां इस केस में आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर पाईं.

कोर्ट ने कहा कि तुलसीराम प्रजापति की हत्या साजिश के तहत की गई थी, ये बात सच साबित नहीं हुई है. कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी आरोप साबित करने में नाकाम रही है. सोहराबुद्दीन की मौत गोली लगने से हुई थी.

क्या था मामला?

सीबीआई के मुताबिक, आतंकवादियों से संबंध रखने वाला कथित गैंगेस्टर सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और उसके सहयोगी प्रजापति को गुजरात पुलिस ने एक बस से उस वक्त अगवा कर लिया था जब वे लोग 22 और 23 नवंबर 2005 की दरम्यिानी रात हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे.

सीबीआई के मुताबिक, शेख की 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद के पास कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी. उसकी पत्नी को तीन दिन बाद मार डाला गया और उसके शव को ठिकाने लगा दिया गया.

साल भर बाद 27 दिसंबर 2006 को प्रजापति की गुजरात और राजस्थान पुलिस ने गुजरात-राजस्थान सीमा के पास चापरी में कथित फर्जी मुठभेड़ में गोली मार कर हत्या कर दी. अभियोजन ने इस मामले में 210 गवाहों से पूछताछ की जिनमें से 92 मुकर गए.

इस बीच अभियोजन पक्ष के दो गवाहों ने अदालत से दरख्वास्त की कि उनसे फिर से पूछताछ की जाए. इनमें से एक का नाम आजम खान है, जो सोहराबुद्दीन का सहयोगी था. उसने अपनी याचिका में दावा किया है कि शेख पर कथित तौर पर गोली चलाने वाले आरोपी और पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर अब्दुल रहमान ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने मुंह खोला तो उसे झूठे मामले में फंसा दिया जाएगा. एक अन्य गवाह एक पेट्रोल पंप का मालिक महेंद्र जाला है.

यह मामला साल 2005 का है, जिसमें 22 लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था. इनमें ज्यादातर पुलिसकर्मी शामिल थे. ज्यादातर आरोपी गुजरात और राजस्थान के जूनियर लेवल के पुलिस अधिकारी हैं. वहीं मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के करीब 92 गवाह मुकर गए, जिसके बाद अदालत ने सीबीआई के आरोपपत्र में नामजद 38 लोगों में 16 को सबूत के अभाव में पहले ही आरोपमुक्त कर दिया था.

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