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घाटे की सरकारी कंपनियों से अपना पिंड क्यों नहीं छुड़ाती सरकार?

एनडीए सरकार के पास क्यों इस बारे में कोई मजबूत नीति नहीं है?

Updated On: Mar 17, 2017 04:23 PM IST

Sindhu Bhattacharya

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घाटे की सरकारी कंपनियों से अपना पिंड क्यों नहीं छुड़ाती सरकार?

भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम लगातार घाटे में डूब रहे हैं. इन उपक्रमों को बहुत से लोग समाजवादी विरासत के रत्न पुकारते हैं. फायदे में चलने वाले कुछ उपक्रमों ने भी अब गोता लगाना शुरू कर दिया और रेड लाइन के पार जा रहे हैं जबकि कई भारी घाटा दिखा रहे हैं.

एनडीए सरकार के पास क्यों इस बारे में कोई मजबूत नीति नहीं है? कारोबारी धंधों से निकलने के बारे में उसका क्या इरादा है, यह हममें से बहुत से लोगों के लिए साफ नहीं है. वह क्यों समाजवादी दौर की इन निशानियों को बनाए रखना चाहती है?

लोकसभा में दिए गए एक लिखित जवाब के अनुसार वित्त 2016 में एक साल पहले के मुकाबले सार्वजनिक क्षेत्र के 78 केंद्रीय उपक्रमों यानी सीपीएसई का कुल घाटा 55 प्रतिशत बढ़ा है. इसका मतलब है कि वित्त वर्ष 2014-15 में इन सरकारी कंपनियों का जो घाटा 18,756 करोड़ रुपए था, वह 12 महीनों के भीतर बढ़कर 28,756 करोड़ रुपए हो गया. इस तरह वित्त वर्ष 2016 में इन कंपनियों का हर दिन का शुद्ध घाटा 76 करोड़ रुपए रहा जबकि 2014-15 में यह घाटा प्रतिदिन 51 करोड़ था.

घाटे के सरताज

अगर चार सबसे ज्यादा घाटे वाली सरकारी कंपनियों की बात की जाए तो उनमें स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, बीएसएनएल, एयर इंडिया और हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स शामिल हैं. वित्त वर्ष 2015-16 में हुए घाटे का कुल 50 फीसदी हिस्सा इन्हीं चारों कंपनियों के खाते में जाता है.

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सरकार को क्यों स्टील बनाने वाली कंपनी चाहिए, क्यों टेलीफोन नेटवर्क कंपनी चाहिए? जबकि प्राइवेट कंपनियां बहुत पहले ही इन सब क्षेत्रों में एक ढर्रे पर चलने वाली नौकरशाही अक्षमता को पछाड़ चुकी हैं. खुद सरकार को इनकी वजह से परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं.

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अगर प्राइवेट एयरलाइंस (एक को छोड़कर) और निजी टेलीकॉम कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना मुश्किल हो रहा है तो फिर सरकारी अंदाज में चलने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से भला क्या उम्मीद की जा सकती है.

लेकिन सरकार ने पिछले हफ्ते ही साफ साफ कहा है कि एयर इंडिया के निजीकरण का उसका कोई इरादा नहीं है. वित्त वर्ष 2015-16 में पहली बार एयर इंडिया के ऑपरेशनल प्रॉफिट का मोदी सरकार ने खूब जोर-शोर से प्रचार किया था. देश के सर्वोच्च ऑडिटर ने भी इस पर सवाल नहीं उठाया था. लगता है कि टेलीकॉम, स्टील निर्माण और उड्डयन क्षेत्र से निकलने की सरकार को कोई जल्दी नहीं है.

ऑपरेशनल प्रॉफिट का यह मतलब नहीं है कि एयरलाइंस का कायापलट हो गया है. इन मुनाफे की वजह पिछले वित्त वर्ष में तेल के दामों में गिरावट थी. एयर इंडिया और बीएसएनएल लड़खड़ा रही हैं, हालांकि सरकार उनके वित्तीय आंकड़ों को पर्दे में ही रखती है.

घाटे के कारण

लिस्ट में बाकी जो अन्य तीन कंपनियां हैं उन्हें तो घाटे में रहने की आदत है, जबकि घाटे में रहने वाली कंपनियों के क्लब में सेल (SAIL) की पहली बार एंट्री हुई है. इस स्टील निर्माता कंपनी ने वित्त वर्ष 2015 में 2,092.68 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा दिखाया था, लेकिन इसके अगले ही साल वह 4,137.26 करोड़ रुपए के घाटे के साथ गहरा गोता लगाती नजर आई.

राष्ट्रीय इस्पात निगम भी सरकारी क्षेत्र की एक और स्टील निर्माण कंपनी है जो पिछले वित्त वर्ष में घाटे में चली गई. 62.38 करोड़ रुपए के शुद्ध मुनाफे से वह 1,420.64 करोड़ रुपए के शुद्ध घाटे में पहुंच गई है. मुनाफे में रहने वाली बीएचईएल का भी यही हाल है. पिछले वित्त वर्ष में उसने 913.42 करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा दिखाया जबकि इससे एक साल पहले वह 1,419.29 करोड़ रुपए के शुद्ध मुनाफे में थी.

घाटे में चलने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रम लगातार डूबते ही जा रहे हैं और घाटे वाली कंपनियों की फेहरिस्त को बढ़ा रहे हैं.

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भारी उद्योग और सार्वजनिक उपक्रम राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने लोकसभा में दिए एक जवाब में कहा कि 'सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रमों में घाटे के कारण हर उपक्रम के लिए अलग-अलग हैं. लेकिन जो साझा कारण सभी जगह हैं उनमें पुराने और खटारा प्लांट और मशीनरी, पुरानी पड़ चुकी टेक्नोलॉजी, क्षमता का कम उपयोग, जरूरत से ज्यादा कर्मचारी, कमजोर मार्केटिंग रणनीतियां, गलाकाट प्रतियोगिता, भारी ब्याज का बोझ, ऊंची इनपुट लागत, संसाधनों की कमी आदि शामिल हैं.'

मोदी का वादा

सुप्रियो ने न तो प्रत्येक उद्योग में घाटे में चल रही इकाइयों में घाटे के विशेष कारण बताए और न ही ऐसा कोई इशारा दिया कि घाटे में चल रहे उपक्रमों से निकलने के लिए सरकार के पास कोई दीर्घकालीन या लघुकालीन योजना है.

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लेकिन सरकार के अपने ही थिंक टैंक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) ने इस साल अपने एक पेपर में हमें याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग दो साल पहले अमेरिकी निवेशकों से एक वादा किया था और फिर यही वादा उन्होंने हाल में जर्मन निवेशकों के सामने भी दोहराया. वादा था कि सरकार का कारोबार से कोई लेना देना नहीं होगा. तो फिर भारत सरकार ने अब तक ये 235 सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रम क्यों रखे हुए हैं?

एनआईपीएफपी के पेपर में कहा गया है कि एयर इंडिया, एमटीएनल और बीएसएनएल के साथ-साथ अन्य कई तरह की सेवाएं देने वाले सरकारी क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों का प्रदर्शन खनन और मैन्युफैक्चरिंग के उपक्रमों के मुकाबले खासा लचर है.

इसके मुताबिक, 'सेवा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों में सर्विस ओरिएंटेशन की कमी को देखते हुए इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए. सर्विस सेक्टर के सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन न सिर्फ बदतर है, बल्कि उनकी मौजूदगी का बुरा असर उन क्षेत्रों में काम कर रही निजी कंपनियों के प्रदर्शन पर भी हो सकता है... उड्डयन क्षेत्र में सिविल एविएशन के महानिदेशक ने सबको बराबर अवसर देने के लिए काम नहीं किया और एयर इंडिया का पक्ष लिया है. इससे जाने अनजाने निजी क्षेत्र की एयरलाइंस कंपनियों के प्रदर्शन पर असर पड़ता है.'

ठोस कदमों की कमी

दरअसल, एनआईपीएफपी ने वही कहा है जो कोई भी समझदार भारतीय कहेगा: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कम से कम 50 प्रतिशत पूंजी के विनिवेश के लिए 10 साल की एक योजना चाहिए. सरकार का काम सार्वजनिक बुनियादी ढांचा देना है, न कि सरकारी कंपनियां चलाना.

पेपर के अनुसार, '2015 की सबसे बड़ी निराशाओं में से एक यह रही कि सार्वजिनक क्षेत्र के उपक्रमों की अनुमानित 30 लाख करोड़ रुपए की पूंजी में से 69 हजार करोड़ रुपए के विनिवेश के सामान्य से लक्ष्य की तरफ कोई कदम नहीं बढाए गए. इसमें सरकारी बैंक शामिल नहीं हैं, जिन्होंने सार्वजनिक पूंजी का एक बड़ा हिंसा रोक कर रखा हुआ है.'

हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय ने पहले ही नीति आयोग से कह दिया है कि वह बीमार सरकारी कंपनियों की जांच पड़ताल करे कि उन्हें चलाते रहने चाहिए या नहीं. नीति आयोग ने भी बीमार और घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की दो सूचियां मूल्यांकन के लिए सौंपी हैं.

इन सफेद हाथियों पर अभी तक सरकार की तरफ से कोई भी अंतिम फैसला नहीं आया है. नीति आयोग ने घाटे में चल रही उन सरकारी कंपनियों की पहचान की है जिन्हें बंद किया जा सकता है. उसने एक सूची और बनाई है जिनमें वे कंपनियां हैं जिनका रणनीति बिक्री के जरिए निजीकरण होना चाहिए.

एयर इंडिया जैसी घाटे में चलने वाली कंपनियों को बेचे जाने की खबरें समय समय पर आती रही हैं, लेकिन ऐसे किसी प्रस्ताव पर कोई ठोस कदम आगे बढ़ते नहीं दिखते.

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