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लिंगायत मुद्दा : सिद्धारमैया के एक 'बाउंसर' से अचकचाई 'राष्ट्रवादी' बीजेपी

नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी जहां सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल पड़े हैं, वहीं कर्नाटक की कांग्रेस सरकार इसके उलट कुछ करने में जुटी है.

Updated On: Mar 21, 2018 05:52 PM IST

K Nageshwar

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लिंगायत मुद्दा : सिद्धारमैया के एक 'बाउंसर' से अचकचाई 'राष्ट्रवादी' बीजेपी

नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी जहां सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल पड़े हैं, वहीं कर्नाटक की कांग्रेस सरकार इसके उलट कुछ करने में जुटी है. कर्नाटक सरकार ने लिंगायत समुदाय को हिंदुओं से अलग धर्म के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है.

राज्य में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने के लिए सिद्धारमैया देसी उपायों का विकल्प तलाश रहे हैं. बीजेपी अब हिंदू राष्ट्रवाद के अपने सिद्धांत और लिंगायत समुदाय के 'हिंदुत्व मंजूर नहीं' की घोषणा के बीच फंसी है. राज्य की कुल आबादी में लिंगायत समुदाय की हिस्सेदारी 17 फीसदी है और यह बीजेपी के समर्थन का अहम आधार है. पार्टी के कद्दावर नेता येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से आते हैं.

गुजरात में जहां कांग्रेस ने मुख्य तौर पर मोदी-विरोधी प्रचार अभियान पर फोकस किया, वहीं इसके उलट कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बीजेपी के आक्रामक चुनाव अभियान का मुकाबला करने के लिए नई राजनीतिक तरकीब ढूंढी है.

कांग्रेस आक्रामक क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद के जरिए बीजेपी के आक्रामक राष्ट्रवाद का मुकाबला करती है. राज्य का झंडा, नदी विवाद आदि इसकी मिसाल हैं. इसी तरह, कांग्रेस लिंगायत समुदाय की पहचान की राजनीति के जरिए बीजेपी की धार्मिक राजनीति को चुनौती दे रही है.

सिद्धारमैया की अगुवाई वाली कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने बीते सोमवार को लिंगायत समुदाय के लिए अलग धार्मिक दर्जे को मंजूरी दी है, जिसके व्यापक राजनीतिक मायने हो सकते हैं. कांग्रेस की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने राज्य अल्पसंख्यक आयोग कानून की धारा 2डी के तहत नागमोहन कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया. इस प्रस्ताव को राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिलने के साथ ही अब यह अंतिम मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास जाएगा.

लिहाजा, यह मामला मोदी सरकार के लिए कठिन परीक्षा की तरह हो गया है. कांग्रेस के मुख्यमंत्री अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी बीजेपी को उसकी भाषा में ही जवाब दे रहे हैं. भावनात्मक धार्मिक मुद्दे हमेशा से बीजेपी के चुनावी एजेंडे में अहम रहे हैं. बीजेपी के राजनीतिक-धार्मिक मुद्दे का मुकाबला करना उसके प्रतिद्वंद्वियों के लिए हमेशा से मुश्किल रहा है. हालांकि, कर्नाटक में कांग्रेस के इस क्षत्रप ने भगवा कुनबे को आयडिया और रणनीति की तलाश करने के लिए छटपटाने पर मजबूर कर दिया.

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कांग्रेस लिंगायतवाद को अलग धर्म के तौर पर मान्यता देने की मांग का समर्थन करती रही है. इस तरह की मांग बीजेपी के लिए पूरी तरह से असहज है, क्योंकि भगवा पार्टी हिंदू राष्ट्रवाद के दायरे में राजनीति का ताना-बाना बुनती है.

हिंदू धर्म ऐसी धारा है, जो असंख्या विचारों और मतों को अपने में समाहित कर लेती है. हालांकि, इस तरह की व्याख्या उन लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकती है, जो मानते हैं कि उनका संप्रदाय अपने आप में एक धर्म है.

लिंगायतवाद के विकास क्रम में इस समुदाय की शख्सियत विभाजित रही है. एक तरफ यह हिंदू धर्म की कुछ पंरपराओं को स्वीकार करता है, जबकि दूसरी तरफ इसके पास जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की भी समृद्ध विरासत है. गौरतलब है कि जाति व्यवस्था के कारण हिंदू धर्म में कई गड़बड़ियां सामने आईं.

कई साल से लिंगायत समुदाय मुख्य तौर पर बीजेपी के पीछे एकजुट रहा है. पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी. एस. येदियुरप्पा इस समुदाय के ताकतवर नेता माने जाते हैं. हालांकि, उनका नाम घोटाले में भी उछला है.

लिंगायत समुदाय अलग धर्म की मान्यता के मुद्दे पर एकजुट नहीं है. हालांकि, इससे जुड़ी खबरों की मानें तो जो लोग अलग धार्मिक पहचान की मांग करते हैं, वे इस समुदाय का प्रमुख हिस्सा हैं और इसके मांग के लिए समर्थन और बढ़ रहा है.

बीजेपी की हिंदी-हिंदू छवि अब भी विंध्य से दक्षिण में पार्टी की संभावनाओं में बड़ी बाधा है. पार्टी के लिए कर्नाटक इस बाधा को पार करने वाला दक्षिण का पहला राज्य था. हालांकि, एक के बाद एक सामने आए घोटालों के कारण पार्टी की मुश्किलें बढ़ गईं. द्रविड़ आंदोलन ने कर्नाटक के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को बीजेपी की राजनीति के लिए अभेद्य क्षेत्र बना दिया. अब अलग धार्मिक पहचान के लिए चल रहे लिंगायत समुदाय के आंदोलन में बीजेपी की रणनीतियों और मंसूबों को नाकाम करने की संभावना है.

सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ संभावित माहौल का फायदा उठाकर वापसी करने को संकल्पित बीजेपी को लिंगायतवाद से निपटना मुश्किल लग रहा है.अलग धार्मिक पहचान चाहने वाले लिंगायत समुदाय ने अपने रुख को सही बताने के लिए अपने आदर्श बसावा के उपदेशों का हवाला दिया है.

12वीं सदी के दार्शनिक और समाज सुधारक बसावा ने ब्राह्मणवादी हिंदू व्यवस्था और उसकी जाति प्रथा को खारिज कर दिया था. इसके अलावा, उन्होंने वैदिक परंपराओं से भी असहमित जताई थी, जो हिंदू धर्म की बुनियाद हैं. बसावा ने कहा था, 'दैवी जन्म की कहानियां झूठी हैं. ऊंचे स्तर का आदमी वह है, जो खुद को जानता है.'

इस समाज सुधारक ने धार्मिक परंपराओं की शुद्धता की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा था, 'अछूत की झोपड़ी और देवताओं के मंदिर, चाहे परंपराओं के पालन की बात हो या इसे साफ करने का मामला, सब कुछ एक ही पानी से होता है न?'

हिंदू धर्म के अंदर जाति व्यवस्था की आलोचना करते हुए बसावा का कहना था, 'क्या दुनिया में कोई कान के जरिए पैदा हुआ है? अछूत और चांडाल की तरह ब्राह्मण भी इंसान के गर्भ से पैदा हुए.'

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बीजेपी को अब तक भारत में कहीं भी दूसरी जगह कांग्रेस से इस तरह के जटिल सामाजिक सवालों और चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा है. दरअसल, कांग्रेस ने दलितों, पिछड़ों और पटेलों की सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश कर बीजेपी को और घबरा दिया है. इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस को चुनावी फायदा हुआ है, हालांकि वह सत्ता हासिल नहीं कर सकी. कर्नाटक के चुनाव में बीजेपी को बड़ी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो राज्य के सामाजिक सवालों से उभर रही हैं.

लिंगायत मामले के अलावा सिद्धारमैया बीजेपी के आक्रामक राष्ट्रवाद के ब्रांड से मुकाबले के लिए राज्य के अलग झंडे के तौर पर क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. लिहाजा, कर्नाटक का राजनीतिक मुहावरा पहले से बदला हुआ नजर आ रहा है और मुकाबले ज्यादा कड़ा और कड़वा हो गया है.

( इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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